कौशल किशोर शुक्ला
Humayun Kabir : जी हां, बंगाल में मुस्लिम वोट बैंक पर सियासी महाभारत की पटकथा तैयार हो चुकी है, टीएमसी के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के शिलान्यास के बाद जनता उन्नयन पार्टी का गठन कर लिया है और वह एआइएमआइएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी व इंडिया सेक्युलर फ्रंट के सुप्रीमो पीरजादा अब्बास सिद्दीकी से गठबंधन को लेकर संपर्क में हैं, बताते हैं कि गठबंधन को लेकर ओवैसी का रुख सकारात्मक है।
फर्क क्या पड़ेगा यदि इसको समझाना है तो ज्यादा दूर नहीं, अभी बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम को देख सकते हैं, यहां मुस्लिम राजनीति का एक नया रुझान सामने आया, महज नरेन्द्र मोदी और भाजपा विरोध के नाम पर धर्मनिरपेक्ष दलों का समर्थन करने वाले मुसलमान का विधानसभा और लोकसभा में प्रतिनिधित्व घट गया था, इसी बात को ओवैसी ने मुसलमान के बीच रखा और समझाया कि मुसलमानों का प्रतिनिधित्व जरूरी है और उन्होंने अपनी जीत का आंकड़ा बरकरार रखा, असर पूरे बिहार में दिखा और बदल गया परिणाम, राजद का क्या हश्र हुआ, यह अब क्या कहने की बात है…!
बंगाल में भी वही खेल शुरू हो चुका है, बंगाल में मुसलमान की आबादी करीब 30 प्रतिशत है, 100 सीटों पर इसका व्यापक प्रभाव है और मुस्लिम वोट राज्य की सत्ता की दिशा और दशा बदलती रहती है, 70-80 के दशक में मुसलमानों का कांग्रेस से मोहभंग होने के बाद वाम दलों की सरकार बनी, बाद में वाम दलों से जब मुसलमानों का मोह भंग हुआ तो तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई, अब खेल इस वोट बैंक को तृणमूल से दूर करने का है।
सियासी खेल बस इतना है कि ओवैसी सीमांचल से लगते बंगाल के जिलों मालदा, उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर में प्रभावशाली भूमिका निभा सकते हैं, अब्बास की पार्टी का दक्षिण बंगाल में व्यापक प्रभाव है, जिसे तृणमूल कांग्रेस का गढ़ माना जाता है, दो वर्ष पहले अब्बास की पार्टी ने दक्षिण बंगाल में ही 450 सीटों पर कब्जा किया था और हुमायूं मुर्शिदाबाद जिले से हैं, जिस जिले के आसपास के जिलों में बाबरी मस्जिद के शिलान्यास का व्यापक असर दिखा था…!
भाजपा बरसों से यह कहिए कि दशकों से बंगाल में सत्ता हासिल करने को तड़प रही है और मजबूत मुस्लिम वोट बैंक के विरोध में एक तरफा ध्रुवीकरण के कारण उसे सफलता नहीं मिल रही है, पिछले लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के मतों का अंतर करीब सात फीसद और विधानसभा चुनाव में करीब 10 फीसद था।
सोचिए, अगर हुमायूं,अब्बास और ओवैसी एक साथ आए तो टीएमसी का क्या होगा, वोट छिटकेगा, खेल डिफरेंस का हिट होगा और फायदा किसको होगा, सोचिएगा…!
सियासत का खेल है, जो हमलावर हो चुकी है, आम जनता का क्या होगा, यह भी सोचिएगा, फिर एसआइआर है, घुसपैठ है, घुसपैठियों को रोकने की जिद है, उन्हें बाहर करने का इरादा है…!
क्या कहा, किसी खतरे की बात है?
ना ना, बस सोचने की बात है…!
सोचिए, फिर मिलते हैं।
