INDIA  Alliance : महागठबंधन में बढ़ती दरार! असम में JMM और केरल में RJD ने कांग्रेस के खिलाफ खोला मोर्चा

Bindash Bol

* क्या लालू–राहुल का असर कम हुआ या गठबंधन में ही बढ़ गया अंतर्विरोध?

INDIA  Alliance : देश की विपक्षी राजनीति का बड़ा चेहरा बने महागठबंधन (INDIA गठबंधन) के भीतर अब मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं कि सहयोगी दल ही एक-दूसरे की राजनीतिक जमीन कमजोर करने में जुट गए हैं। असम और केरल की चुनावी राजनीति ने गठबंधन की एकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि नेतृत्व, विस्तार और प्रभाव क्षेत्र की नई जंग है।

असम: कांग्रेस बनाम झामुमो — सहयोगी से सीधे मुकाबले तक

असम विधानसभा चुनाव में सबसे चौंकाने वाला घटनाक्रम तब सामने आया जब झारखंड की सत्ता में कांग्रेस की सहयोगी झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने उसी कांग्रेस के खिलाफ उम्मीदवार उतार दिए।

झामुमो ने राज्य की 21 सीटों पर प्रत्याशी खड़े कर चुनावी समीकरण को पूरी तरह बदल दिया है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इससे विपक्षी वोट बैंक — खासकर मुस्लिम, ईसाई और आदिवासी मतों — का विभाजन तय माना जा रहा है।
असम में लगभग 1.07 करोड़ मुस्लिम मतदाता चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं, जबकि ईसाई आबादी भी निर्णायक भूमिका निभाती है। ऐसे में विपक्षी वोटों का बंटवारा अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा को फायदा पहुंचा सकता है।

विश्लेषकों का मानना है कि झामुमो झारखंड मॉडल को असम में आजमाना चाहती है, लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान कांग्रेस को उठाना पड़ सकता है।

केरल: कांग्रेस और राजद आमने-सामने

केरल विधानसभा चुनाव में महागठबंधन की अंदरूनी खींचतान और स्पष्ट दिख रही है। यहां राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने कांग्रेस के खिलाफ ही चुनावी मैदान में उतरकर राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है।

राजद ने तीन सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं—

वडाकारा — एम.के. भास्करन
कुत्थुपरंबा — पी.के. प्रवीण
कालपेट्टा — पी.के. अनिल

खास बात यह है कि कालपेट्टा सीट प्रियंका गांधी वाड्रा के लोकसभा क्षेत्र वायनाड के अंतर्गत आती है, जिससे मुकाबले का राजनीतिक संदेश और मजबूत हो गया है।

एलडीएफ के साथ राजद की नई रणनीति

राजद नेता तेजस्वी यादव ने साफ किया है कि केरल में चुनाव लड़ने का उद्देश्य पार्टी विस्तार और “सेक्युलर फ्रंट” को मजबूत करना है।

केरल में राजद, लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) के साथ चुनावी तालमेल में है, जिसका नेतृत्व भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) (सीपीएम) करती है।
राजद नेताओं का दावा है कि बिहार और झारखंड में कांग्रेस सहयोगी रहेगी, लेकिन केरल में राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए वहां क्षेत्रीय समीकरण के आधार पर रणनीति बनाई गई है।

बड़ा सवाल: कमजोर नेतृत्व या गठबंधन की मजबूरी?

असम और केरल की घटनाएं कई बड़े राजनीतिक संकेत देती हैं—

* क्या राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी नेतृत्व कमजोर पड़ रहा है?

* क्या क्षेत्रीय दल अब स्वतंत्र विस्तार की रणनीति अपना रहे हैं?

* या फिर महागठबंधन केवल चुनावी समझौता बनकर रह गया है?
साफ है कि विपक्षी एकता की तस्वीर जितनी दिल्ली में मजबूत दिखती है, जमीन पर उतनी ही उलझी हुई नजर आ रही है।

महागठबंधन के भीतर बढ़ते अंतर्विरोध अब छिपे नहीं रह गए हैं। सहयोगी दलों का एक-दूसरे के खिलाफ मैदान में उतरना बताता है कि राजनीतिक महत्वाकांक्षा और क्षेत्रीय विस्तार की लड़ाई गठबंधन की एकता पर भारी पड़ रही है। आने वाले चुनाव तय करेंगे — यह रणनीतिक विस्तार है या विपक्षी कमजोरी की शुरुआत।

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