India US Deal : वैश्विक राजनीति और व्यापार का रिश्ता आज पहले से कहीं अधिक गहरा हो चुका है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ केवल सामानों का आदान–प्रदान नहीं कर रहीं, बल्कि अपने दीर्घकालिक हितों को सुरक्षित करने के लिए रणनीतिक समझौते भी कर रही हैं। ऐसे समय में अमेरिका और भारत के बीच उभरती ट्रेड डील ने आर्थिक और राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। इस डील में सामने आया 18% टैरिफ कई लोगों को शुरुआत में चुनौती जैसा लग सकता है, लेकिन जब इसके व्यापक संदर्भ को समझा जाए, तो यह भारत की रणनीतिक मजबूती का संकेत भी माना जा सकता है।
सबसे बड़ी बात यह है कि भारत ने अपनी संवेदनशील सेक्टर—कृषि, डेयरी और मछली पालन—को इस डील से बाहर रखने में सफलता हासिल की है। ये सेक्टर न केवल देश की खाद्य सुरक्षा से जुड़े हैं, बल्कि करोड़ों किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी हैं। अमेरिका जैसे बड़े व्यापारिक साझेदार से बातचीत के दौरान इन क्षेत्रों को सुरक्षित रखना भारत की कूटनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है। इससे यह संदेश जाता है कि भारत अब केवल बाजार नहीं, बल्कि अपने हितों की रक्षा करने वाला मजबूत खिलाड़ी बन चुका है।
डिफेंस और सेंसिटिव टेक्नोलॉजी पर भी भारत ने कोई समझौता नहीं किया। आज जब तकनीकी प्रभुत्व वैश्विक शक्ति संतुलन को तय करता है, तब ऐसी शर्तों पर दृढ़ रहना भारत की रणनीतिक सोच को दर्शाता है। सेमीकंडक्टर, एआई, डिफेंस टेक्नोलॉजी और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता भारत के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है। यही वजह है कि ट्रेड डील के बावजूद भारत ने अपने दीर्घकालिक तकनीकी हितों को प्राथमिकता दी।
इस समझौते का एक बड़ा पहलू अमेरिका द्वारा भारत पर लगे टैरिफ को 50% से घटाकर 18% करना भी है। यह बदलाव केवल प्रतिशत का खेल नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन का संकेत है। दुनिया के कई देशों पर अमेरिका ने भारी टैरिफ लगाए हैं, लेकिन भारत के साथ दरों में इतनी कमी यह दर्शाती है कि भारत अब बातचीत की मेज पर बराबरी की स्थिति में है। बदले में भारत कुछ हाई-एंड अमेरिकी प्रोडक्ट्स पर ज़ीरो टैरिफ लगाने को तैयार हुआ है, जो यह दिखाता है कि समझौता संतुलित है—एकतरफा नहीं।
ऊर्जा क्षेत्र में भी भारत ने संतुलन की नीति अपनाई है। रूस से तेल खरीदना पूरी तरह बंद करने के बजाय उसे कम करना और अमेरिका तथा वेनेजुएला से प्रतिस्पर्धी कीमतों पर तेल लेना, भारत की मल्टी-अलाइनमेंट रणनीति को दर्शाता है। यह नीति भारत को ऊर्जा सुरक्षा भी देती है और वैश्विक दबावों के बीच संतुलन बनाए रखने का अवसर भी।
इस डील का दीर्घकालिक लक्ष्य अगले छह वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को 500 बिलियन डॉलर तक पहुंचाना है। यह लक्ष्य केवल व्यापारिक आंकड़ा नहीं, बल्कि सप्लाई चेन रियलाइन्मेंट और निवेश प्रवाह का संकेत भी है। चीन-प्लस-वन रणनीति के दौर में अमेरिका भारत को एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में देख रहा है, जिससे भारत के मैन्युफैक्चरिंग और टेक सेक्टर को नई गति मिल सकती है।
18% टैरिफ को अगर व्यापक नजरिए से देखा जाए, तो यह भारतीय उद्योगों के लिए गुणवत्ता सुधार और वैल्यू एडिशन की दिशा में एक अवसर भी बन सकता है। अब प्रतिस्पर्धा केवल कीमत पर नहीं, बल्कि इनोवेशन, ब्रांडिंग और टेक्नोलॉजी पर आधारित होगी। इससे भारतीय कंपनियां वैश्विक मानकों के अनुरूप खुद को ढालने के लिए प्रेरित होंगी।
कुल मिलाकर, अमेरिका–भारत ट्रेड डील एक जटिल लेकिन संतुलित कदम के रूप में सामने आई है। यह न तो पूरी जीत है और न ही हार, बल्कि एक रणनीतिक पड़ाव है जहाँ दोनों देश अपने हितों को सुरक्षित रखते हुए आगे बढ़ना चाहते हैं। भारत के लिए यह संकेत है कि वह अब वैश्विक व्यापार में नियमों को केवल मानने वाला देश नहीं, बल्कि उन्हें प्रभावित करने वाला खिलाड़ी बन चुका है।
