India USA : अमेरिका ने भारत पर टैरिफ 50% से घटाकर 18% क्यों किया? वजह और क्या हुआ बाजार पर असर

Bindash Bol
  • 50% से सीधे 18%… इतना बड़ा यू-टर्न क्यों?
  • मोदी–ट्रंप डील का मार्केट पर धमाकेदार असर

India USA : अमेरिका का द्वारा भारत पर लगाए गए टैरिफ को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करना केवल एक आर्थिक फैसला नहीं, बल्कि एक बड़ी कूटनीतिक और रणनीतिक चाल है। यह फैसला उस समय आया जब वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी, सप्लाई चेन संकट और चीन पर बढ़ती निर्भरता से जूझ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई फोन बातचीत के बाद इस “बड़ी ट्रेड डील” की घोषणा ने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया।

अमेरिका को टैरिफ घटाने की जरूरत क्यों पड़ी?

पहली और सबसे बड़ी वजह है चीन फैक्टर। अमेरिका लंबे समय से चीन पर निर्भरता कम करना चाहता है। ऐसे में भारत, एक भरोसेमंद, लोकतांत्रिक और तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था के रूप में अमेरिका का सबसे मजबूत विकल्प बनकर उभरा है। अगर अमेरिका भारत पर ज्यादा टैरिफ लगाए रखता, तो अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत में निवेश और आयात दोनों महंगे पड़ते।

दूसरी वजह है अमेरिकी घरेलू बाजार का दबाव। अमेरिकी उद्योग, खासकर टेक्नोलॉजी, फार्मा, ऑटो पार्ट्स और रिटेल सेक्टर, भारत से सस्ते और गुणवत्तापूर्ण उत्पादों पर निर्भर हैं। ज्यादा टैरिफ का सीधा असर अमेरिकी उपभोक्ताओं पर महंगाई के रूप में पड़ रहा था, जो ट्रंप प्रशासन के लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदायक था।

तीसरी वजह है भारत का मजबूत मोलभाव (Bargaining Power)। भारत ने हाल के वर्षों में आत्मनिर्भर भारत, मैन्युफैक्चरिंग बूस्ट, डिजिटल इकोनॉमी और स्टार्टअप इकोसिस्टम के जरिए खुद को एक अहम वैश्विक खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया है। अमेरिका जानता है कि भारत को नजरअंदाज करना अब संभव नहीं।

भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

भारत के लिए यह फैसला बड़ी आर्थिक जीत माना जा रहा है। 50% टैरिफ का मतलब था कि भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में बेहद महंगे हो जाते। अब 18% टैरिफ से भारतीय निर्यातकों को सीधी राहत मिलेगी।

  • टेक्सटाइल
  • फार्मास्यूटिकल्स
  • ऑटो कंपोनेंट्स
  • आईटी हार्डवेयर
  • केमिकल और स्टील

जैसे सेक्टर्स को अमेरिकी बाजार में दोबारा प्रतिस्पर्धी बढ़त मिलेगी। इससे न सिर्फ निर्यात बढ़ेगा, बल्कि भारत में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।

क्या भारत को भी कोई रियायत देनी पड़ी?

हर बड़ी ट्रेड डील “Give and Take” पर आधारित होती है। माना जा रहा है कि भारत ने भी कुछ अमेरिकी उत्पादों, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, डिफेंस डील्स और निवेश के रास्ते खोलने पर सहमति जताई है। हालांकि, भारत ने अपने कोर सेक्टर्स और किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं किया—यही इस डील की सबसे बड़ी खासियत है।

शेयर बाजार पर क्या असर पड़ा?

इस फैसले का असर शेयर बाजार पर तुरंत देखने को मिला।
निफ्टी और सेंसेक्स में मजबूती
एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड कंपनियों के शेयरों में उछाल
आईटी, फार्मा और मेटल स्टॉक्स में खरीदारी
निवेशकों ने इस फैसले को भारत के लिए “Long-Term Positive Signal” माना। विदेशी निवेशकों (FII) का भरोसा भी बढ़ा, क्योंकि यह संकेत मिला कि भारत अब ग्लोबल ट्रेड पॉलिटिक्स में मजबूत स्थिति में है।

रुपये और निवेश पर प्रभाव

टैरिफ घटने से भारत का ट्रेड बैलेंस सुधरने की संभावना है। निर्यात बढ़ने से डॉलर इनफ्लो बढ़ेगा, जिससे रुपये को मजबूती मिल सकती है। साथ ही, अमेरिका से डायरेक्ट फॉरेन इन्वेस्टमेंट (FDI) के रास्ते भी आसान होंगे।

9 देशों ने जताया भरोसा

भारत-यूरोपीय यूनियन, भारत और यूएई, भारत और मॉरीशस, भारत और ऑस्ट्रेलिया, भारत और यूके, भारत और न्यूजीलैंड, भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील हुए हैं। साधारण उपलब्धि नहीं है। विश्वभर नें भारत की पहचान बनी है, कद बढ़ा है कि उसी का नतीजा है कि इतने देशों ने विश्वास करके ट्रेड डील भारत के साथ किया।

वैश्विक राजनीति में इसका संदेश

यह फैसला साफ संदेश देता है कि भारत अब केवल “Developing Economy” नहीं, बल्कि एक Strategic Global Partner है। अमेरिका ने यह मान लिया है कि भारत के साथ बराबरी के आधार पर डील करनी होगी।

क्या यह स्थायी राहत है?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह राहत फिलहाल स्थायी दिखती है, लेकिन भविष्य में यह दोनों देशों के रिश्तों, चुनावी राजनीति और वैश्विक हालात पर निर्भर करेगी। हालांकि, मौजूदा संकेत भारत के पक्ष में हैं।

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