India US Deal : भारत और अमेरिका के बीच हुई हालिया ट्रेड डील सिर्फ एक आर्थिक समझौता नहीं, बल्कि कूटनीति की उस नई शैली का उदाहरण बनकर सामने आई है, जिसमें भारत ने साफ संकेत दिया कि वह अब दबाव या धमकी की राजनीति से प्रभावित होने वाला देश नहीं है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस समझौते को अमेरिकी किसानों और उद्योगों की बड़ी जीत बताकर घरेलू राजनीति में भुना रहे हैं, लेकिन सामने आई रिपोर्ट्स यह कहानी कुछ अलग ही बयां करती हैं। इन रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत ने बातचीत के दौरान अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए बेहद सख्त और स्पष्ट रुख अपनाया, जिसने अंततः समझौते की दिशा तय की।
बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एससीओ शिखर सम्मेलन के बाद भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने अमेरिका का दौरा किया। सितंबर 2025 में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ उनकी एक निजी बैठक हुई, जो इस पूरे घटनाक्रम का अहम मोड़ साबित हुई। इसी बैठक में भारत ने दो टूक शब्दों में यह संदेश दिया कि सार्वजनिक मंचों से भारत को निशाना बनाना या धमकी भरी भाषा इस्तेमाल करना दोनों देशों के रिश्तों के लिए सही नहीं है। डोभाल ने साफ कहा कि भारत किसी भी तरह की ‘बुलिंग’ स्वीकार नहीं करेगा और अगर सम्मानजनक शर्तें नहीं मिलीं, तो भारत ट्रंप के कार्यकाल खत्म होने तक भी इंतजार करने को तैयार है।
उस समय माहौल काफी तनावपूर्ण था। भारत-पाकिस्तान तनाव के बाद ट्रंप प्रशासन ने सीजफायर को लेकर कई बयान दिए, जिन्हें भारत ने सार्वजनिक रूप से खारिज कर दिया। इसके बाद अमेरिकी प्रशासन के कुछ करीबी सहयोगियों ने प्रधानमंत्री मोदी पर व्यक्तिगत हमले किए और रूसी तेल खरीद को लेकर तीखी टिप्पणियां कीं। इसी दौरान अमेरिका ने भारतीय निर्यात पर 50 प्रतिशत तक का भारी टैरिफ लगा दिया, जिसे कई विशेषज्ञों ने दबाव बनाने की रणनीति माना। लेकिन भारत ने जवाब में संयम और रणनीतिक धैर्य दिखाते हुए बातचीत का रास्ता खुला रखा।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, डोभाल ने रुबियो से साफ कहा कि रिश्तों को सामान्य करने के लिए सबसे पहले सार्वजनिक बयानबाजी और आलोचना बंद करनी होगी। भारत का मानना था कि जब तक भाषा और व्यवहार में सम्मान नहीं होगा, तब तक किसी भी आर्थिक समझौते का मजबूत आधार नहीं बन सकता। यह संदेश केवल कूटनीतिक नहीं था, बल्कि भारत की बदलती वैश्विक स्थिति का संकेत भी था — एक ऐसा देश जो अब बराबरी के आधार पर बातचीत चाहता है।
दिलचस्प बात यह रही कि इस कड़े रुख के बाद ट्रंप के रवैये में कुछ नरमी देखने को मिली। सितंबर के अंत में प्रधानमंत्री मोदी को जन्मदिन की बधाई देने के लिए ट्रंप का फोन कॉल इसी बदलाव का संकेत माना गया। इसके बाद दोनों देशों के बीच बातचीत तेज हुई और आखिरकार ट्रेड डील पर सहमति बनी। हालांकि, भारत ने हमेशा की तरह कृषि और डेयरी सेक्टर को अपनी ‘रेड लाइन’ बनाए रखा, जो घरेलू राजनीति और किसानों के हितों से जुड़ा अहम मुद्दा है।
ट्रंप ने इस समझौते का ऐलान ‘ट्रुथ सोशल’ पर करते हुए इसे बड़ी उपलब्धि बताया, लेकिन भारत की ओर से आधिकारिक बयान काफी संतुलित और संयमित रहा। प्रधानमंत्री मोदी और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने डील की पुष्टि तो की, लेकिन उसकी शर्तों पर ज्यादा खुलासा नहीं किया। यह रणनीति भी भारत की कूटनीतिक शैली को दर्शाती है, जहां बयानबाजी से ज्यादा ध्यान वास्तविक शर्तों और परिणामों पर रहता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी दिखाया कि भारत अब वैश्विक मंच पर एक आत्मविश्वासी खिलाड़ी के रूप में उभर रहा है। चाहे रूस से तेल खरीद का मुद्दा हो या_toggleरिफ वार्ता, भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने की कोशिश की है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस डील की असली तस्वीर तभी साफ होगी जब इसकी शर्तें सार्वजनिक होंगी, लेकिन इतना जरूर तय है कि यह समझौता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और कूटनीतिक संदेश भी देता है।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह समझौता दोनों देशों के रिश्तों को नई मजबूती देगा या फिर घरेलू राजनीति के कारण नए विवाद सामने आएंगे। फिलहाल, भारत का यह संदेश स्पष्ट है — वह वैश्विक मंच पर साझेदारी चाहता है, लेकिन बराबरी और सम्मान के साथ। इस ट्रेड डील ने यह साबित करने की कोशिश की है कि बदलते वैश्विक समीकरणों में भारत अपनी शर्तों पर बातचीत करने की क्षमता रखता है और जरूरत पड़ने पर धैर्य के साथ इंतजार भी कर सकता है।
