Iran Ceasefire 2026 : पाकिस्तान की विदेश नीति का इतिहास अमेरिका के साथ एक असमान साझेदारी का गवाह है। 1981 से लेकर आज तक बार-बार यही कहानी दोहराई गई है—अमेरिका ने पाकिस्तान को अपने रणनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल किया, और जब काम पूरा हुआ तो इस्लामाबाद को अकेला छोड़ दिया। अब 2026 के ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध में भी यही पैटर्न दोहराया गया। पाकिस्तान ने खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश किया, लेकिन आखिरकार सीजफायर के मंच पर ‘जोकर’ बनकर रह गया।
1981 से शुरू हुई ‘इस्तेमाल’ की कहानी
सोवियत-अफगान युद्ध (1979-1989) के दौरान अमेरिका ने पाकिस्तान को अपना मुख्य आधार बनाया। CIA की ‘ऑपरेशन साइक्लोन’ के तहत पाकिस्तान के ISI के जरिए मुजाहिदीनों को हथियार, प्रशिक्षण और फंडिंग दी गई। पाकिस्तान ने अपने भू-रणनीतिक महत्व (सोवियत सीमा से सटे होने) का फायदा उठाने की कोशिश की, लेकिन अंत में उसे ही सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा—अफगान शरणार्थी, हथियारों का अवैध कारोबार, मादक पदार्थों का प्रसार और बाद में तालिबान का उदय।
2001 के बाद ‘वार ऑन टेरर’ में फिर वही खेल दोहराया गया। पाकिस्तान ने अमेरिका को लॉजिस्टिक सपोर्ट, एयर बेस और खुफिया जानकारी दी। बदले में अरबों डॉलर की सैन्य सहायता मिली, लेकिन जब ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में ही पकड़े गए तो अमेरिका ने पाकिस्तान पर ही उंगली उठाई। ट्रंप प्रशासन के समय ‘डू मोर’ का नारा और सहायता कटौती—यह सिलसिला पुराना है। पाकिस्तान हर बार ‘फ्रंटलाइन स्टेट’ बना, लेकिन रणनीतिक गहराई कभी हासिल नहीं कर सका।

2026: ईरान युद्ध में फिर ‘भरपूर इस्तेमाल’?
फरवरी 2026 में अमेरिका-इजरायल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले शुरू किए। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने का खतरा, तेल की कीमतों में उछाल और क्षेत्रीय अस्थिरता—पूरी दुनिया चिंतित थी। इस बीच पाकिस्तान ने खुद को मध्यस्थ के रूप में आगे बढ़ाया। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने बैकचैनल बातचीत शुरू की। पाकिस्तान ने दो-चरणीय सीजफायर प्रस्ताव दिया—तुरंत युद्धविराम और 15-20 दिनों में होर्मुज खोलने का रोडमैप।
ट्रंप ने पाकिस्तानी प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। 8 अप्रैल 2026 को दो हफ्ते का सीजफायर घोषित हुआ। अमेरिका-ईरान-इजरायल तीनों पक्षों के बीच पाकिस्तान ही एकमात्र संवाद चैनल बना। ईरानी विदेश मंत्री ने पाकिस्तान का शुक्रिया अदा किया। लेकिन असली सच्चाई यह है कि अमेरिका ने पाकिस्तान को सिर्फ मैसेज डिलीवरी बॉय की तरह इस्तेमाल किया।
* अमेरिका को ईरान तक अपना 15-पॉइंट प्लान भेजना था।
* पाकिस्तान ने वह प्लान पहुंचाया।
* जब ट्रंप का डेडलाइन करीब आया, पाकिस्तान ने ‘दो हफ्ते का ब्रेक’ का फॉर्मूला दिया।
पाकिस्तान ने इसे अपनी कूटनीतिक जीत बताया, लेकिन आलोचक इसे ‘अमेरिकी प्रॉक्सी’ कह रहे हैं।
सीजफायर में ‘जोकर’ बन गया पाकिस्तान
सीजफायर घोषणा के तुरंत बाद विवाद खड़ा हो गया। पाकिस्तान ने दावा किया कि सीजफायर लेबनान तक लागू है, लेकिन इजरायल ने साफ इनकार कर दिया। शरीफ के एक ट्वीट का ‘ड्राफ्ट’ वर्जन वायरल हुआ, जिसमें शब्दावली पर सवाल उठे। भारतीय पूर्व राजदूत दीपक वोहरा जैसे आलोचक खुलेआम कह रहे हैं—“पाकिस्तान द जोकर है”।
पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाकर अपनी ‘महत्वपूर्णता’ साबित करने की कोशिश की, लेकिन परिणाम यह हुआ कि…
* अमेरिका ने अपना मकसद हासिल कर लिया (ईरान पर दबाव और बातचीत का रास्ता)।
* ईरान ने सांस ली (होर्मुज खुलने का समय मिला)।
* इजरायल ने अपना रुख नहीं बदला।
* पाकिस्तान फिर बीच में फंस गया—न तो कोई ठोस गारंटी मिली, न ही क्षेत्रीय ताकत के रूप में पहचान।
इस्लामाबाद में 10 अप्रैल को होने वाली बातचीत अब सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई है। पाकिस्तान ने अपनी सैन्य-कूटनीतिक क्षमता का प्रदर्शन तो किया, लेकिन बड़े खिलाड़ियों के बीच वह फिर ‘यूटिलिटी प्लेयर’ साबित हुआ।

दोहराई गई गलती या नई शुरुआत?
1981 से लेकर 2026 तक पाकिस्तान की कहानी एक ही है—अमेरिका जब चाहता है, पाकिस्तान को इस्तेमाल करता है। अफगानिस्तान हो, आतंकवाद हो या अब ईरान युद्ध—पाकिस्तान हर बार ‘स्ट्रैटेजिक एसेट’ बनता है, लेकिन कभी ‘स्ट्रैटेजिक पार्टनर’ नहीं।
इस बार पाकिस्तान ने खुद को मध्यस्थ बनाकर कुछ कूटनीतिक अंक जरूर बटोरे, लेकिन आलोचकों के अनुसार वह फिर ‘जोकर’ बनकर रह गया। सवाल यह है—क्या पाकिस्तान कभी इस चक्र से बाहर निकलेगा? या फिर अगली बार कोई नया संकट आएगा तो फिर वही पुरानी स्क्रिप्ट दोहराई जाएगी?
पाकिस्तान का इस्तेमाल हो गया।
फिर।
और शायद हमेशा के लिए।
मध्य-पूर्व संकट ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है:
क्या पाकिस्तान वैश्विक राजनीति में स्वतंत्र खिलाड़ी है, या अब भी बड़ी शक्तियों की रणनीतिक शतरंज का मोहरा?