डॉ प्रशान्त्त करण
(आईपीएस) रांची
Ishwar Allah Tere Naam : तीस जनवरी और दो अक्टूबर , दोनों दिन राष्ट्र में रामधुन बजते हैं . जिसकी अंतिम पंक्ति होती है – सबको सन्मति दे भगवान ! इसकी पहली पंक्ति में गाया जाता है , ईश्वर अल्लाह तेरो नाम . रामलाल की आपत्ति है कि जब ईश्वर , अल्लाह तेरो नाम हो गया तो सन्मति देने का भार ईश्वर पर ही क्यों ? सन्मति देने के फेरे में सम्भवतः मामला साम्प्रदायिक न हो , इसीलिए सारा भार ईश्वर पर छोड़कर विशेष राजनीतिक दल निश्चिन्त हो गए . अब ईश्वर वाले जानें और उनका काम जाने .दूसरे पक्ष को सन्मति हो , न हो , उनसे वे मुँह मोड़ लिया करते थे . तो मामला सांप्रदायिक करने – कराने की पहल किसने की ? क्या इससे उनको लाभ हुआ ? क्या जिसे सन्मति न हो को क्या लाभ हुआ ? इतिहास साक्षी है , पर इस साक्षी को मौन क्यों किया गया ? मैंने उन्हें समझाया – देखो , मामला महात्मा गाँधी के नाम के नैपथ्य में खुला खेल राजनीति का है . मैं राजनीति से दूर ही रहता हूँ . इसलिये मुझे कुछ नहीं कहना है .
मैं यही कहकर कटने लगा तभी रवि बाबू आ धमके . चिर परिचित मुस्कुराहट के साथ रामलाल से बोले – और गुरु , का होवत हौए ? रामलाल ने वही बात रवि बाबू से दुहराई . मैं तनिक ठहर गया कि सुनूँ कि रवि बाबू के क्या विचार हैं .
रवि बाबू ने कहा – यह तो अच्छी बात है . सबको सन्मति मिलनी चाहिए . आज सन्मति आवश्यक है . विषय युद्ध के बीच असंजस में खड़ा है .व्यक्तिगत अहम और वर्चस्व के पीछे हम भागने में लगे हैं .
रामलाल ने उन्हें बीच में टोक दिया और बोले – विषय पर बोलिए . गोल – गोल बात को मत घुमाइए .
रवि बाबू ने कहा – सरकार जनता से कहलवाती रही – सबको सन्मति दे भगवान . स्वयं सरकार ने यह नहीं कहा . सरकार चाहती थी कि भले हम कुमति से सरकार चलावें , लेकिन जनता में सुमति हो , सन्मति हो और वह चुप रहे , मौन रहे , अपना मुँह न खोले . उनका कोई परिजन मुँह खोले तो धन – पद देकर उनका मुँह बंद कर दो . शक्ति और सामर्थ प्राप्त कर उसमें सरलता से कुमति का वास होगा और सन्मति दूर भागेगी . स्वतन्त्रता आंदोलन में थकी – हारी सरकार ने उसी समय यह अंगेजों और विदेशी आक्रांताओं से सीख लिया था कि सरकार चलानी है , कुर्सी पर बने और दशकों तक उस पर टिके रहना है तो स्वयं कुमति रखो और जनता से ही सबको सन्मति दे भगवान रटवाओ . पद और धन आवश्यक है . शक्ति और सामर्थ एक साथ किसी प्रकार मिल जाएँ तो दुनिया को मारो ठोकर . कौन क्या बिगाड़ लेगा . यह गौरवशाली परम्परा दशकों तक चली . फिर सरकार चलाने वालों के पास कुमति की मात्रा इतनी बढ़ गयी कि शक्ति और सामर्थ पर अहंकार की मोटी परत जम गयी . फिर क्या था ? अवसर मिलते ही सबको सन्मति दे भगवान जपने वाले और जप कर उसे साधने वालों ने उन्हें धक्का देकर कुर्सी से उतार दिया . इतिहास से सीखकर वे स्वयं ही सबको सन्मति दे भगवान साधने लगे हैं . अब देखना है कि उनकी सन्मति कब तक रहती है .
अब सप्ताह भर से रामलाल घूम – घूमकर यही कहते – उनको सन्मति दे भगवान !
