Islamabad Talks : मध्य पूर्व में शांति का ‘पोस्टर बॉय’ बनने का पाकिस्तान का सपना चकनाचूर हो गया है। जिस इस्लामाबाद को 11 अप्रैल की ऐतिहासिक अमेरिका-ईरान वार्ता का मंच बताया जा रहा था, वहां अब सन्नाटा और कूटनीतिक शर्मिंदगी पसरी है। ईरान ने वार्ता में शामिल होने से साफ इनकार करते हुए मेज़बान पाकिस्तान और ट्रंप प्रशासन, दोनों को करारा झटका दिया है।
1. दांव उल्टा पड़ा: रेड कार्पेट बिछा रह गया पाकिस्तान
पाकिस्तान ने इस वार्ता के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। मुनीर की फौज ने इस्लामाबाद को छावनी में तब्दील कर दिया था—स्कूल, दफ्तर, बाजार सब बंद थे ताकि ‘हाई-प्रोफाइल’ मेहमानों को परिंदा भी पर न मार सके। अफवाहें थीं कि ईरानी दल पहुंच चुका है और अमेरिकी C-130 विमान लैंड कर रहे हैं। लेकिन हकीकत तब सामने आई जब ईरानी राजदूत ने अपनी वह ‘X’ पोस्ट डिलीट कर दी, जिसमें दल के आने की पुष्टि की गई थी।
2. तस्नीम और प्रेस टीवी का ‘ठेंगा’: अफवाहों पर फिरा पानी
ईरान की आधिकारिक न्यूज़ एजेंसियों, तस्नीम और प्रेस टीवी ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट कर दिया कि कोई भी ईरानी दल इस्लामाबाद नहीं गया है। ईरान ने साफ कर दिया कि वह पाकिस्तान के ‘डाकिये’ वाले रोल को घास डालने के मूड में नहीं है।
3. ट्रंप की ‘ट्रिनिटी’ और जेडी वेंस की गैरमौजूदगी
नूरखान एयरबेस पर सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम थे क्योंकि अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के आने की चर्चा थी। लेकिन विमान से वेंस नहीं, बल्कि ट्रंप के तीन खास सिपहसालार निकले…
स्टीव विटकॉफ: ट्रंप के पुराने मित्र और रियल एस्टेट टाइकून (कूटनीति का शून्य अनुभव)।
जेरेड कुश्नर: ट्रंप के दामाद और इजरायल के कट्टर समर्थक।
एडमिरल ब्रैड कूपर: मिडिल ईस्ट में अमेरिकी नौसेना के कमांडर।
ट्रंप ने जेडी वेंस को सुरक्षा कारणों और ईरान के अनिश्चित रुख को देखते हुए आखिरी वक्त पर रोक लिया। इन तीन चेहरों को भेजने का मकसद ईरान को यह जताना था कि मेज पर ‘पैसा’ (विटकॉफ-कुश्नर) और ‘पावर’ (कूपर) दोनों मौजूद हैं।
4. ईरान की ‘डेडलाइन’ और लेबनान का रोड़ा
वार्ता टूटने की सबसे बड़ी वजह लेबनान और इजरायल बने। ईरान ने अमेरिका की 15 शर्तों (परमाणु और मिसाइल कैप) को कूड़ेदान में फेंकते हुए अपनी 5 नई शर्तें रख दी हैं…
लेबनान में तुरंत युद्धविराम: इजरायल को हमले रोकने होंगे।
ब्लड मनी: मारे गए ईरानी कमांडरों और नागरिकों का मुआवजा।
युद्ध हर्जाना: सैन्य और बुनियादी ढांचे के नुकसान की भरपाई।
होर्मुज जलडमरूमध्य: इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर ईरान का पूर्ण संप्रभु अधिकार।
हिजबुल्लाह का समर्थन: ईरान ने डंके की चोट पर कहा कि वह हिजबुल्लाह का साथ नहीं छोड़ेगा।
पाकिस्तान की ‘डाकिए’ वाली नौकरी खतरे में
पाकिस्तान को उम्मीद थी कि इस मध्यस्थता से उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इज्जत और शायद कुछ आर्थिक मदद मिलेगी। लेकिन ईरान के सख्त रुख और अमेरिका की ‘इजरायल-प्रथम’ नीति ने पाकिस्तान को कहीं का नहीं छोड़ा। शाहेद ड्रोनों के साये और कूटनीतिक गतिरोध के बीच, इस्लामाबाद की सड़कें अब केवल अधूरे ख्वाबों और खाली सुरक्षा घेरों की गवाह बनी हुई हैं।
ट्रंप की ‘प्रेशर टैक्टिक्स’ ईरान के ‘लेबनान कार्ड’ के आगे फिलहाल फेल होती दिख रही है।