Jagdeep Dhankhar : असहमति, असंतुलन और मतभेद के बाद इस्तीफा!

Siddarth Saurabh

Jagdeep Dhankhar : उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के आकस्मिक इस्तीफे ने राजनीतिक गलियारों में भूचाल ला दिया है। स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया गया है, लेकिन बीजेपी के शीर्ष नेताओं की चुप्पी और जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार करने जैसे घटनाक्रम संदेह पैदा करते हैं। धनखड़ के हालिया रुख का बीजेपी की रणनीति से तालमेल न होना भी एक वजह माना जा रहा है।
जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर सरकार उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की अतिसक्रियता से असहज तो थी, पर बात इस्तीफे तक पहुंच जाएगी, इसकी भनक नहीं थी। राज्यसभा में जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ सोमवार को धनखड़ ने जिस तरह बिना किसी चर्चा के विपक्ष का नोटिस स्वीकार किया, उससे सरकार बेहद नाराज थी। इसी नाराजगी के चलते, सदन के नेता जेपी नड्डा और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू सोमवार को दूसरी बार बुलाई गई कार्य मंत्रणा समिति (बीएसी) की बैठक से दूर रहे।

सूत्रों ने बताया कि खराब स्वास्थ्य के कारण धनखड़ बीते कुछ महीने से पद छोड़ने का मन बना रहे थे। इसी बीच, न्यायपालिका पर उनके लगातार हमले और संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी व धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़े जाने के मामले में तीखा मोर्चा खोलने से भी सरकार असहज थी। किसानों के मुद्दे पर कई मौकों पर उनके तीखे बोल से भी सरकार सहमत नहीं थी, पर उसकी ओर से पद छोड़ने के लिए नहीं कहा गया था। सूत्रों के मुताबिक, धनखड़ को पता था कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार मामले में कड़ा संदेश देने के लिए सरकार अपनी ओर से लोकसभा में जस्टिस वर्मा के खिलाफ प्रस्ताव पेश करने वाली है। सरकार की पहल पर सोमवार को लोकसभा अध्यक्ष को 152 सांसदों के हस्ताक्षर वाला नोटिस भी दिया गया था। इसी बीच, राज्यसभा में विपक्ष की ओर से नोटिस दिया जाना और सभापति धनखड़ का उसे बिना किसी पूर्व चर्चा के स्वीकार करने के निर्णय ने सरकार को बेचैन व नाराज कर दिया था।

क्या महाभियोग नोटिस बना कारण?

सूत्र बताते हैं कि जगदीप धनखड़ ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग नोटिस को राज्यसभा में लेने से पहले सत्ता पक्ष में किसी से बातचीत नहीं की। उन्होंने न प्रधानमंत्री कार्यालय से बात की, न संसदीय कार्य मंत्रालय से और न ही सदन के नेता जेपी नड्डा को कोई पूर्व सूचना दी। इस कदम ने न सिर्फ बीजेपी को असहज किया बल्कि उच्च सदन की गरिमा और उसकी प्रक्रिया को लेकर भीतर ही भीतर विवाद की स्थिति भी पैदा की। केंद्र सरकार से बिना मशविरा ही 63 विपक्षी सांसदों का प्रस्ताव राज्यसभा के सभापति जगदीप धनकड़ को विपक्ष ने सौंप दिया और संसदीय कार्य मंत्रालय और नेता सदन को इसकी भनक तक नहीं लगी। सरकार कठघरे में खड़ी थी और स्तब्ध थी।

सूत्रों के मुताबिक केंद्र सरकार राज्यसभा में जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव नहीं लाना चाहती थी इसके पीछे एक बड़ा कारण था कि राज्यसभा में जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाते ही इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यादव के खिलाफ पहले से ही लंबित महाभियोग प्रस्ताव विपक्ष उठाना चाहता था।

बैठक से क्यों दूर रहे नड्डा-रिजिजू

सोमवार को बीएसी की दो बैठकें हुई। पहली बैठक में किसी विषय पर कोई फैसला नहीं होने पर दूसरी बैठक 4:30 पर बुलाने का फैसला हुआ। हालांकि, इससे पहले करीब चार बजे धनखड़ ने सदन में जस्टिस वर्मा के खिलाफ विपक्ष की ओर से दिए गए नोटिस को स्वीकार करने की घोषणा कर दी। सरकार के सूत्र का कहना है कि चूंकि इस बारे में कोई चर्चा नहीं की गई, ऐसे में बीएसी की दूसरी बैठक में जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता था। दूसरी ओर, सूत्रों का कहना था कि बीएसी की दूसरी बैठक में जब नड्डा और रिजिजू नहीं दिखे, तो धनखड़ ने सवाल उठाया। इस पर, भाजपा सांसद एल मुरुगन ने उन्हें उनकी व्यस्तता की जानकारी दी। इससे धनखड़ नाराज हुए और सवाल उठाया कि उन्हें इस आशय की सूचना क्यों नहीं दी गई?

कई टिप्पणियों को गैर-जरूरी और अति-आक्रामक माना गया

सूत्रों के मुताबिक बीते कुछ महीनों से उपराष्ट्रपति धनखड़ के रवैये से सरकार असहज थी। धनखड़ द्वारा जजों और न्यायपालिका पर की गई कई टिप्पणियों को गैर-जरूरी और अति-आक्रामक माना गया। विपक्ष के प्रति अचानक ‘नरमी’ और उनके सुझावों को महत्व देने का रुझान। सदन की कार्यवाही में चेयर की भूमिका निभाते हुए धनखड़ की अतिसक्रियता, बिना सलाह के फैसले लेना, ये सब सरकार को खटकने लगे थे।

महाभियोग पर लोकसभा में शुरू हो सकती है प्रक्रिया

सूत्रों के मुताबिक, अब कार्यवाहक सभापति हरिवंश राज्यसभा में महाभियोग के नोटिस पर फैसला लेंगे। चूंकि लोकसभा में सभी पक्षों के 152 सांसदों ने इसी आशय का नोटिस दिया है। ऐसे में सरकार निम्न सदन में महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकती है। हालांकि, अब विपक्ष का क्या रुख होगा, यह देखना दिलचस्प होगा। अगर प्रक्रिया राज्यसभा में शुरू हुई, तो इस मामले में सारा श्रेय विपक्ष ले लेगा।

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