Jharkhand : शर्मसार झारखंड… सुरक्षा घेरे में ही लूटी गई अस्मत

Bindash Bol

कलंक: चतरा के ‘शिक्षा के मंदिर’ में मासूमियत का सौदा, झारखंड फिर हुआ शर्मसार!

Jharkhand : क्या हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहाँ बेटियाँ अपनी किताबों के बोझ से ज्यादा व्यवस्था के पाप का बोझ ढोने को मजबूर हैं? झारखंड के चतरा जिले से आई यह खबर किसी के भी रोंगटे खड़े करने और खून खौलाने के लिए काफी है। एक सरकारी आवासीय विद्यालय, जिसे सरकार ‘सुरक्षित भविष्य’ का नाम देती है, वहीं एक 13 साल की मासूम का बचपन रौंद दिया गया।

व्यवस्था के चेहरे पर सात महीने का काला दाग

​अनुसूचित जाति की यह मासूम बच्ची, जो अभी जीवन के ककहरे सीख रही थी, वह सात महीने की गर्भवती पाई गई। सोचिए, उस बच्ची पर क्या गुजरी होगी जिसने महीनों तक इस खौफनाक सच को अपने भीतर छिपाए रखा? जब वह छुट्टी में घर लौटी, तब उसके शरीर में हुए बदलावों ने इस घिनौने राज से पर्दा उठाया।

रक्षक ही बना भक्षक?

​आरोप सीधे उस शख्स पर हैं जिसे समाज ‘गुरु’ और ‘अभिभावक’ कहता है। विद्यालय के प्रधानाध्यापक पर इस जघन्य अपराध का आरोप लगा है। ग्रामीणों का आक्रोश सातवें आसमान पर है और सवाल उठना लाजिमी है— क्या अब स्कूल की चारदीवारी भी बेटियों के लिए कत्लगाह बन चुकी है? आरोपी हिरासत में है, जाँच कमेटियाँ बन रही हैं, लेकिन उस बच्ची के टूटे हुए आत्मसम्मान और छिन चुके बचपन का हिसाब कौन देगा?

सत्ता और प्रशासन से कुछ कड़वे सवाल…

* निगरानी कहाँ थी? सात महीने तक एक आवासीय विद्यालय में बच्ची गर्भवती रही और वार्डन, रसोइया या अन्य शिक्षकों को भनक तक नहीं लगी? क्या यह सामूहिक लापरवाही नहीं है?

* कैसी है सुरक्षा? अगर सरकारी हॉस्टल में बेटियाँ सुरक्षित नहीं हैं, तो गरीब माँ-बाप अपनी बच्चियों को पढ़ने कहाँ भेजें?

* जाँच का दिखावा या न्याय? क्या यह मामला भी फाइलों में दब जाएगा या फिर ऐसी मिसाल पेश की जाएगी कि दोबारा कोई ‘नरपिशाच’ किसी मासूम की तरफ आँख उठाकर देखने की हिम्मत न करे?

झारखंड शर्मिंदा है!

उपायुक्त ने 5 सदस्यीय टीम गठित की है, पीड़िता को मेडिकल के लिए भेजा गया है। कागजी कार्रवाई अपनी रफ्तार से चलेगी, लेकिन चतरा की इस घटना ने पूरे झारखंड को शर्मसार कर दिया है। यह हमला सिर्फ एक बच्ची पर नहीं, बल्कि राज्य की शिक्षा व्यवस्था और नारी सुरक्षा के दावों पर हुआ है।

​वक्त आ गया है कि मोमबत्तियाँ जलाकर दुख जताने के बजाय, व्यवस्था में बैठे उन सफेदपोशों की जवाबदेही तय की जाए जिनकी नाक के नीचे यह घिनौना खेल महीनों तक चलता रहा।

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