Jharkhand : झारखंड में सूचना आयुक्त नियुक्ति  का मामला…राजनीतिक चेहरों की फाइल बिना स्वीकृति लौटाई, RTI कानून और सुप्रीम कोर्ट का सख्त हवाला!

Bindash Bol

Jharkhand : झारखंड में पिछले काफी समय से राज्य मुख्य सूचना आयुक्त (CIC) और सूचना आयुक्तों (IC) के पद खाली पड़े हैं। इन पदों को भरने के लिए राज्य सरकार ने चयन प्रक्रिया पूरी कर राज्यपाल के पास फाइल भेजी थी, जिसे राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने बिना स्वीकृति के वापस लौटा दिया है।
राज्यपाल ने फाइल पर हस्ताक्षर करने के बजाय सरकार को कुछ गंभीर संवैधानिक और कानूनी पहलुओं पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया है।
राज्यपाल ने सूचना आयुक्तों की नियुक्ति वाली फाइल बिना किसी स्वीकृति के राज्य सरकार को लौटा दी और साफ-साफ लिखा—“सरकार पहले RTI Act, 2005 और सुप्रीम कोर्ट के अंजलि भारद्वाज मामले के फैसलों को दोबारा देख ले।
यह कोई साधारण फाइल वापसी नहीं है। यह 6 साल से पूरी तरह ठप पड़े झारखंड राज्य सूचना आयोग (SIC) को बचाने का संवैधानिक प्रयास है।

मामला क्या है?

झारखंड में मई 2020 से राज्य सूचना आयोग बिल्कुल बंद पड़ा है। मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के सभी पद खाली। हजारों RTI अपील और शिकायतें लंबित हैं। आम नागरिक को सूचना मांगने का अधिकार तो है, लेकिन दूसरी अपील कहां करे? कोई मंच नहीं। सुप्रीम कोर्ट और झारखंड हाई कोर्ट ने बार-बार सरकार को फटकार लगाई, समय-सीमा दी। आखिरकार मार्च 2026 में चयन समिति (CM हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में, मंत्री हाफिजुल हसन और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी शामिल) ने 25 मार्च को बैठक की और 5 नाम फाइनल कर लोकभवन भेज दिए।
सरकार ने जिन 5 नामों की अनुशंसा की थी (सूचना आयुक्त पद के लिए)…

अनुज सिन्हा (पत्रकार)
धर्मवीर सिन्हा (पत्रकार)
अमूल्य नीरज खलखो (कांग्रेस महासचिव)
तनुज खत्री (झामुमो आईटी सेल प्रभारी)
शिवपूजन पाठक (भाजपा मीडिया प्रभारी)
मुख्य सूचना आयुक्त पद के लिए अभी कोई नाम नहीं भेजा गया था।

राज्यपाल ने किस आधार पर फाइल लौटाई?

राज्यपाल ने फाइल लौटाते हुए RTI Act की धारा 15(6) का सीधा हवाला दिया। इसमें साफ लिखा है कि सूचना आयुक्त..
किसी राजनीतिक दल से जुड़ा नहीं होना चाहिए,
कोई लाभ का पद नहीं रखना चाहिए,
संसद/विधानसभा का सदस्य नहीं होना चाहिए।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के अंजलि भारद्वाज बनाम भारत संघ मामले का भी जिक्र किया, जिसमें कोर्ट ने बार-बार कहा है कि सूचना आयोग को पूरी तरह स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी रखना जरूरी है। राजनीतिक चेहरों की नियुक्ति से आयोग की विश्वसनीयता खतरे में पड़ जाती है। RTI कार्यकर्ता सुनील कुमार महतो समेत कई संगठनों ने राज्यपाल को लिखित शिकायत दी थी। राज्यपाल ने कानूनी सलाह ली, CM हेमंत सोरेन से मुलाकात भी की, लेकिन आखिरकार फाइल बिना मंजूरी के वापस कर दी।

क्यों है यह कदम ‘दमदार’ और ऐतिहासिक?

RTI का बचाव: 6 साल से आयोग बंद होने से RTI कानून मृतप्राय हो चुका था। राजनीतिक दलों के लोग आयुक्त बन गए तो अपीलकर्ता कैसे उम्मीद रखें कि निष्पक्ष फैसला मिलेगा?

संवैधानिक संतुलन: राज्यपाल ने साबित किया कि वे सिर्फ रबर स्टैंप नहीं, बल्कि संविधान के रक्षक हैं।

सभी दलों पर एक समान: ध्यान दें—नामों में कांग्रेस, झामुमो और भाजपा, तीनों के लोग शामिल थे। यानी “घोड़े-बाजारी” का आरोप लगने लगा था। राज्यपाल ने सभी पर एक साथ ब्रेक लगाया।

कोर्ट की नजर: 13 अप्रैल को हाई कोर्ट में सुनवाई है। सुप्रीम कोर्ट भी इस महीने मामले पर सुनवाई कर रहा है। राज्यपाल का यह कदम सरकार के लिए कोर्ट में भी मुश्किल खड़ी कर सकता है।

अब आगे क्या?

सरकार को अब नामों पर पुनर्विचार करना होगा। RTI कार्यकर्ता मांग कर रहे हैं कि प्रसिद्ध RTI एक्टिविस्ट, सामाजिक कार्यकर्ता, रिटायर्ड जज/IAS जैसे निष्पक्ष लोग ही चुने जाएं। राजनीतिक चेहरे हटाए जाएं।
यह घटना सिर्फ झारखंड की नहीं, पूरे देश के लिए मिसाल है। जब RTI आयोगों में राजनीतिक घुसपैठ होती है, तो आम आदमी का सूचना का हक छिन जाता है। राज्यपाल गंगवार ने जो किया, वह लोकतंत्र की जीत है—RTI Act और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को सर्वोच्च माना गया, न कि सत्ता की सिफारिश को।
अब देखना होगा—सरकार फाइल वापस लाकर क्या करती है? क्या निष्पक्ष नाम भेजेगी या फिर विवाद बढ़ाएगी? झारखंड की जनता और RTI योद्धा बारीकी से नजर रखे हुए हैं।

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