Jharkhand Culture : झारखंड की सांस्कृतिक विरासत अपनी जड़ों से कितनी गहरी जुड़ी है, इसकी जीवंत बानगी हाल ही में नावाडीह प्रखंड के खरपीटो गांव में देखने को मिली। अवसर था ‘भोक्ता परब’ (चड़क पूजा) का, जहाँ डुमरी विधायक जयराम महतो ने न केवल शिरकत की, बल्कि स्वयं 30 फीट ऊंचे चड़क पोल पर झूलकर इस प्राचीन परंपरा का निर्वहन किया।
क्या है भोक्ता परब? अटूट विश्वास और कठिन साधना
भोक्ता परब, जिसे ‘चड़क पूजा’ भी कहा जाता है, मुख्य रूप से भगवान शिव की आराधना का पर्व है। यह पर्व चैत्र मास की विदाई और नए वर्ष के आगमन का प्रतीक है। इसमें ‘भोक्ता’ (श्रद्धालु) कठोर नियमों का पालन करते हैं और उपवास रखते हैं।
परंपरा का निर्वहन
* देह-साधना: इस पूजा में श्रद्धालु अपने शरीर को कष्ट देकर ईश्वर के प्रति समर्पण व्यक्त करते हैं।
* चड़क पोल: उत्सव का मुख्य आकर्षण 30 फीट ऊंचा लकड़ी का स्तंभ (खूंटा) होता है। इसके शीर्ष पर बंधकर श्रद्धालु हवा में झूलते और परिक्रमा करते हैं।
* अटूट मान्यता: माना जाता है कि इस कठिन अनुष्ठान से महादेव प्रसन्न होते हैं और गांव पर आने वाली सभी विपदाएं टल जाती हैं।
टाइगर जयराम महतो का संदेश: “विरासत ही हमारी पहचान”
झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) के विधायक जयराम महतो ने इस साहसी अनुष्ठान के माध्यम से युवाओं को एक कड़ा संदेश दिया। चड़क पोल पर झूलने के बाद उन्होंने कहा…
”चड़क पूजा सिर्फ एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि हमारी लोक परंपरा और गौरवशाली सांस्कृतिक धरोहर का अहम हिस्सा है। आधुनिकता की दौड़ में हमें अपनी जड़ों को नहीं भूलना चाहिए। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपनी इन अनूठी परंपराओं को सहेजें और आने वाली पीढ़ी को सौंपें।”
झारखंड की पहचान और सुरक्षा का संतुलन
यह परंपरा झारखंड, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में सदियों से चली आ रही है। हालांकि, आधुनिक समय में सुरक्षा और स्वास्थ्य को लेकर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन ग्रामीणों के लिए यह पहचान, विश्वास और सामुदायिक एकजुटता का महापर्व है।
भोक्ता परब झारखंड की उस जिजीविषा को दर्शाता है जहाँ मनुष्य अपनी आस्था के लिए शारीरिक सीमाओं को लांघ जाता है। जयराम महतो जैसे जनप्रतिनिधियों की भागीदारी ने इस सांस्कृतिक धरोहर को और अधिक मजबूती प्रदान की है, जिससे यह संदेश गया है कि झारखंड की पहचान उसकी माटी की महक और पुरानी परंपराओं में ही बसती है।