- जेल, विद्रोह, विरासत और समझौते—इन्हीं से गढ़ी जा रही है नई झामुमो
- गठबंधन की राजनीति ने झामुमो को मजबूरी नहीं, रणनीति सिखाई
JMM : भातीय राजनीति का मौजूदा दौर “एकला चलो” का नहीं, बल्कि गठबंधन, समझौते और सामंजस्य का दौर है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) भी इस सच्चाई को अब केवल स्वीकार ही नहीं कर रहा, बल्कि उसे अपने संगठनात्मक ढांचे और राजनीतिक व्यवहार में आत्मसात करता दिख रहा है।
झामुमो का इतिहास आंदोलन, आदिवासी अस्मिता और संघर्ष से जुड़ा रहा है। लेकिन समय के साथ राजनीति की भाषा बदली है। आज सत्ता में बने रहने के लिए सिर्फ वैचारिक शुद्धता नहीं, बल्कि राजनीतिक लचीलापन भी जरूरी है। यही कारण है कि हाल के वर्षों में JMM अपने भीतर कई ऐसे प्रयोग करता दिख रहा है, जो पहले उसकी राजनीतिक संस्कृति से मेल नहीं खाते थे।
विद्रोहियों को साथ लेना: टूट से बचने की रणनीति
विधानसभा चुनाव के दौरान और उसके बाद झामुमो ने जिस तरह पार्टी से नाराज़ या विद्रोही नेताओं को न सिर्फ वापस जगह दी, बल्कि उन्हें सत्ता और मंत्रालय तक में शामिल किया—वह एक बड़ा संकेत है।
चमरा लिंडा इसका सबसे सटीक उदाहरण हैं। जिन नेताओं को कभी पार्टी के लिए जोखिम माना जाता था, आज वही “राजनीतिक निवेश” बन चुके हैं। संदेश साफ है—
- पार्टी अब बाहर करने से ज़्यादा, भीतर साधने की नीति पर चल रही है।
यह रणनीति आदर्शवादी कम और व्यावहारिक ज्यादा है, लेकिन गठबंधन युग में यही राजनीति का नया व्याकरण है।
कोडरमा प्रयोग और शालिनी गुप्ता की एंट्री
कोडरमा जैसी सीट पर शालिनी गुप्ता को पार्टी में शामिल करना केवल एक जॉइनिंग नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संकेत है।
यह संकेत है कि झामुमो अब सिर्फ अपने परंपरागत सामाजिक आधार तक सीमित नहीं रहना चाहता। गठबंधन की बारीकियां समझते हुए पार्टी यह मान चुकी है कि—
- हर सीट पर “कोर वोटर” से चुनाव नहीं जीता जा सकता
- कुछ क्षेत्रों में सामाजिक विस्तार और स्थानीय प्रभाव ज़्यादा अहम है
कोडरमा प्रयोग यह बताता है कि JMM अब “आइडियोलॉजिकल कम्फर्ट ज़ोन” से बाहर निकलकर इलेक्टोरल रियलिटी को समझ रही है।
जेल, संकट और नेतृत्व का नया चेहरा
झामुमो के आत्मपरिवर्तन की कहानी अचानक शुरू नहीं हुई। इसकी नींव उसी समय पड़ गई थी जब हेमंत सोरेन को अपने पिछले कार्यकाल में जेल जाना पड़ा। यह झामुमो के लिए सिर्फ कानूनी या राजनीतिक संकट नहीं था, बल्कि लीडरशिप क्राइसिस भी था।
ऐसे समय में कल्पना सोरेन का राजनीति में उतरना और राज्य से बाहर जाकर सक्रिय भूमिका निभाना—झामुमो की पारंपरिक राजनीति से बिल्कुल अलग कदम था।
यह कदम बताता है कि पार्टी अब—
- प्रतीकात्मक राजनीति से आगे बढ़कर
- संकट प्रबंधन और पावर ट्रांसफर की राजनीति सीख रही है
शिबू सोरेन का जाना और विरासत की परीक्षा
शिबू सोरेन का देहांत झामुमो के लिए भावनात्मक ही नहीं, वैचारिक झटका भी था। “गुरुजी” सिर्फ एक नेता नहीं थे, बल्कि पार्टी की आत्मा थे। उनके बाद सवाल साफ था—
- क्या झामुमो विरासत के भरोसे चलेगी या भविष्य की तैयारी करेगी?
लगता है पार्टी ने दूसरा रास्ता चुना है। विरासत का सम्मान रखते हुए, संगठन को नए दौर के हिसाब से ढालने की कोशिश तेज़ हुई है।
बिहार चुनाव और गठबंधन की सख़्त ट्रेनिंग
बिहार चुनाव में गठबंधन के भीतर नफा-नुकसान, सीट शेयरिंग और दबाव की राजनीति से झामुमो को बड़ा सबक मिला।
यहां पार्टी ने सीखा कि—
- गठबंधन में भावनाएं नहीं, आंकड़े चलते हैं
- सहयोगी दोस्त नहीं, रणनीतिक साझेदार होते हैं
इस अनुभव ने झामुमो को राजनीतिक रूप से ज्यादा परिपक्व बनाया।
अंदरूनी बदलाव की कुलबुलाहट
आज झामुमो के भीतर बदलाव की जो कुलबुलाहट दिख रही है, वह अस्थिरता नहीं बल्कि संक्रमण (Transition) का संकेत है।
पार्टी अब—
- टूट से डरकर फैसले नहीं ले रही
- बल्कि टूट को रोकने के लिए प्रयोग कर रही है
यह प्रयोग कभी सफल होंगे, कभी विवादास्पद—लेकिन ठहराव से बेहतर हैं।
राज्य के लिए भी शुभ संकेत
झामुमो का यह परिवर्तन सिर्फ पार्टी के लिए नहीं, बल्कि झारखंड की राजनीति के लिए भी सकारात्मक संकेत है।
जब क्षेत्रीय दल गठबंधन की भाषा समझने लगते हैं, तो राजनीति ज़्यादा स्थिर और परिपक्व होती है।
