Karwa Chauth : चांद को अर्घ्य से पहले जानें, कैसे शुरू हुआ करवा चौथ का व्रत?

Bindash Bol

Karwa Chauth : करवा चौथ का त्योहार भारतीय संस्कृति में सुहागिनों के लिए सबसे महत्वपूर्ण पर्वों में से एक है. कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाने वाला यह व्रत पति की लंबी आयु, स्वास्थ्य और सौभाग्य के लिए रखा जाता है. महिलाएं इस दिन निर्जला उपवास रखती हैं और रात को चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोलती हैं. लेकिन इस पावन पर्व को मनाने की शुरुआत कैसे हुई? करवा चौथ की परंपरा सदियों पुरानी है और इसके पीछे कई दिलचस्प पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं.

करवा चौथ की शुरुआत: देवताओं और दानवों के युद्ध की कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार देवताओं और दानवों के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया. युद्ध इतना भयानक था कि देवताओं की पराजय होने लगी. सभी देवता चिंतित होकर ब्रह्मदेव के पास सहायता के लिए पहुंचे. ब्रह्मदेव ने देवताओं की पत्नियों को यह संकट दूर करने का उपाय बताया. उन्होंने कहा कि सभी देव पत्नियां कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन अपने पतियों की विजय और सुरक्षा के लिए कठोर उपवास रखें और सच्चे मन से प्रार्थना करें.

ब्रह्मदेव के कहे अनुसार, सभी देव पत्नियों ने इस व्रत का पालन किया. उनके अखंड सौभाग्य और सच्ची आस्था के प्रभाव से युद्ध में देवताओं की जीत हुई. जब देवताओं की विजय का समाचार मिला, तो देव पत्नियों ने अपना व्रत खोला. उस समय आकाश में चंद्रमा भी निकल आया था. माना जाता है कि तभी से सुहागिन महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी आयु और मंगल कामना के लिए इस व्रत को रखने की परंपरा शुरू हो गई. यही कारण है कि इस दिन चंद्रमा को देखकर व्रत खोला जाता है.

साहसी करवा की कथा

करवा चौथ के नाम के पीछे एक अन्य पौराणिक कथा साहसी करवा नामक स्त्री की है, जिसने अपने पतिव्रता धर्म के बल पर यमराज से अपने पति के प्राण वापस ले लिए थे. कथा के अनुसार, करवा अपने पति से बहुत प्रेम करती थी. एक बार उसका पति नदी में स्नान कर रहा था, तभी एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया. करवा ने अपने पतिव्रता बल से मगरमच्छ को एक कच्चे धागे से बांध दिया और मृत्यु के देवता यमराज से प्रार्थना की. करवा ने यमराज से कहा कि वह मगरमच्छ को दंड दें और उसके पति को जीवनदान दें. जब यमराज ने मना किया, तो करवा ने उन्हें श्राप देने की चेतावनी दी.

करवा के अटूट प्रेम, साहस और सतीत्व को देखकर यमराज भयभीत हो गए. यमराज ने मगरमच्छ को यमलोक भेज दिया और करवा के पति को दीर्घायु होने का वरदान दिया. माना जाता है कि इस घटना के बाद से ही करवा के नाम पर इस व्रत का नाम करवा चौथ पड़ा और यह व्रत पति की रक्षा का प्रतीक बन गया.

वीरवती की कथा

एक और कथा वीरावती नामक रानी की है, जिसे करवा चौथ का व्रत खंडित करने का भारी परिणाम भुगतना पड़ा था. वीरावती अपने सात भाइयों की इकलौती लाड़ली बहन थी. शादी के बाद जब उसने पहली बार करवा चौथ का व्रत रखा, तो भूख-प्यास से वह बहुत व्याकुल हो गई. भाइयों ने बहन का कष्ट देखा नहीं गया औरउन्होंने छल से पहाड़ी पर दीपक जलाकर उसे चांद जैसा दिखा दिया. वीरावती ने उसे चाँद समझकर अर्घ्य देकर व्रत खोल लिया. व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण उसके पति की मृत्यु हो गई. इस घटना से वीरावती अत्यंत दुखी हुई.

जब वीरावती को सच्चाई पता चली, तो उसने पूरे साल की चतुर्थी का व्रत करते हुए अगले करवा चौथ पर विधिवत व्रत का पालन किया. उसके प्रेम और निष्ठा से चौथ माता प्रसन्न हुईं और उसके पति को पुनः जीवनदान मिला. मान्यता है कि तभी से छलनी से चांद को देखने की परंपरा चली आ रही है ताकि किसी भी तरह के भ्रम या छल से बचा जा सके.

Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और पौराणिक कथाओं पर आधारित है. बिंदास बोल न्यूज़ इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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