Krishna Janmashtami 2025 : भगवान कृष्ण, एक संपूर्ण गुरु

Bindash Bol

Krishna Janmashtami 2025 : भगवान कृष्ण के चंद उद्गारों में से एक ऐसा भी है जब उन्होंने इस बात पर शोक प्रकट करते हुए कहा कि कैसे उनके प्रिय भक्त कई बार ऐसे ‘संकल्प’ ले लेंगे जिनका फलित होना असंभव होगा किंतु फिर भी उन्हें उनको पूरा करवाने के लिए आकाश-पाताल एक करना पड़ेगा, क्योंकि वे तो भक्तों के भक्त हैं। ऐसा एक संयोग तब बना जब युद्ध में अर्जुन पुत्र, अभिमन्यु का वध कर दिया गया। चक्रव्यूह के रूप में एक सामरिक चाल चल कर कौरवों के खेमे के सभी मुख्य योद्धाओं ने मिल अभिमन्यु का वध कर दिया था। इस कूट चाल की योजना एक सौ कौरवों की इकलौती बहन “दुशाला” के पति जयद्रथ द्वारा सुझाई गई थी।

अभिमन्यु की मृत्यु के उपरान्त अर्जुन ने अगले दिन का सूर्यास्त होने से पहले जयद्रथ का वध करने, और ऐसा न कर पाने की स्थिति में स्वयं का आत्मदाह करने की शपथ ले ली। उस रात कौरव बहुत प्रसन्न हो के जश्न मना रहे थे क्योंकि उन्हें विश्वास हो चला था कि उन्होंने युद्ध जीत लिया है। वे सब मिल कर अगले दिन जयद्रथ को अपनी सेना के बीच में छिपाने की योजना बनाने लगे ताकि अर्जुन उन तक पहुँच ही न सके। और यह भी कि यदि किसी प्रकार अर्जुन जयद्रथ को मारने में सफल हो भी जाते हैं तो उनके पास एक और सर्वश्रेष्ठ युक्ति थी। जयद्रथ के पिता एक संत पुरुष थे और उन्होंने अपने पुत्र को वरदान दिया था कि जो कोई भी जयद्रथ को मारेगा, उसके स्वयं के हज़ारों टुकड़े होकर जमीन पर बिखर जाएँगे। इसलिए कौरव आश्वस्त थे कि इधर अथवा उधर, दोनों दशाओं में अर्जुन की मृत्यु निश्चित थी।

इस प्रकार अगले दिन भी महाभारत का घमासान जारी रहा, जिसमें अर्जुन अपने तथा जयद्रथ के बीच में दीवार की तरह खड़े किए गए सैनिकों को मार कर जयद्रथ तक पहुँचने के लिए भरसक प्रयत्न कर रहे थे। उस दिन उन्होंने हजारों सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया किंतु फिर भी जयद्रथ तक नहीं पहुँच पाए। जब संध्या की बेला निकट आ रही थी तब भगवान श्रीकृष्ण ने, जो हमेशा सत्य के ही पक्षधर थे, अपने सुदर्शन चक्र का उपयोग कर सूर्य देव को कुछ देर के लिए छिपा दिया। उधर सूर्य को डूबते हुए देख कर कौरवों ने यह सोचा कि अब युद्ध विराम का समय हो गया है क्योंकि सूर्यास्त हो चुका है, उत्सव मनाना आरंभ कर दिया। उस समय जयद्रथ भी अपने ठिकाने से बाहर निकल आया और प्रसन्नचित्त हो कर अर्जुन के सामने खड़ा हो गया।

उस समय भगवान कृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र वापिस ले लिया, जिससे सूर्य देव फिर से प्रकट हो गए। यह जान कर कि अभी सूर्यास्त नहीं हुआ था और उस दिन का युद्ध विराम नहीं हुआ था, जयद्रथ भयभीत हो कर अपने शिविर की ओर वापिस भागने लगा। अर्जुन उसी समय अपना धनुष-बाण निकाल कर जयद्रथ को मारने ही वाला था कि भगवान श्रीकृष्ण ने उनका हाथ पकड़ लिया। उन्होंने अर्जुन को निर्देश दिया कि जयद्रथ का शीश इस प्रकार उड़ाओ कि वह कट कर उनके ही पिता की गोदी में जा कर गिरे।

अर्जुन ने निशाना लगा कर अपना तीर छोड़ दिया। उस तीर के वार से जयद्रथ का सिर धड़ से अलग हो गया। उस वार की शक्ति इतनी तीव्र थी कि उसका शीश उड़ कर युद्ध भूमि से मीलों दूर जा कर ठीक उसके ही पिता, वृद्धक्षत्र की गोद में गिरा। वृद्धक्षत्र यह देख कर विचलित हो गया और उस हड़बड़ी में, उनकी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप, जयद्रथ का शीश ज़मीन पर गिर गया। चूँकि जयद्रथ का शीश उसके पिता वृद्धक्षत्र ने ही भूमि पर गिराया था, उनके वरदान के अनुसार उन्हीं के शरीर के हज़ार टुकड़े हो कर बिखर गए।

इस कहानी के अनुसार भगवान कृष्ण ने अर्जुन के गुरु की भूमिका निभाई। अर्जुन ने जिस लक्ष्य को लेकर शपथ ली थी, वह कार्य लगभग असंभव ही था। इसमें समय सीमा तथा ज्ञान की बाधाओं के साथ साथ अर्जुन के शत्रु की रक्षा करने वाली एक शक्ति भी थी। किंतु, भगवान कृष्ण ने एक गुरु के रूप में अर्जुन को उत्तम सलाह दी जिसके परिणाम स्वरूप उन्होंने न केवल अर्जुन को निश्चित मृत्यु से बचाया, अपितु उनके द्वारा ली गई शपथ को भी पूर्ण करवाया।

हमारे जीवन में भी यह गुरु का ज्ञान और आशीर्वाद ही होता है जो हमें उन सब असंभव प्रतीत होने वाली दुर्गम परिस्थितियों से पार पाने में सहायता करता है, जो भाग्य हमारे सामने चुनौती के रूप में लाता रहता है। सुख और दुःख जीवन रूपी सिक्के के दो पक्ष हैं जिनसे हम बच नहीं सकते। परंतु अपने गुरु अथवा अपने इष्ट, जिसको हम मानते हैं, की कृपा से हम मार्ग में आने वाली रुकावटों से अधिक प्रभावित हुए बिना अपना जीवन अधिक संतुलित ढंग से जी सकते हैं।

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