अमरेंद्र किशोर
Lalu yadav : बिहार की राजनीति में एक समय था जब लालू प्रसाद यादव का नाम मात्र उच्चारण भी सामाजिक न्याय के तूफान को जीवित कर देता था। वह दौर ऐसा था जिसमें लालू सिर्फ एक नेता नहीं बल्कि व्यवस्था के विरुद्ध उठी एक बारात थे—एक ऐसी बारात जिसमें घोड़ी पर बैठा दूल्हा ‘पिछड़ा समाज’ था और बरातियों में शामिल थे वह लोग जो दशकों से सत्ता के दरवाज़े पर खड़े-खड़े थक चुके थे।
यह सच है कि हर सामाजिक आंदोलन का एक काल होता है, एक आयु होती है, और जब वह अपने शिखर के बाद भी वही भाषा, वही स्वर और वही जड़ता को ढोता है तो वह अंततः ‘दर्शन’ से ‘नारे’ में बदल जाता है। यही लालू दर्शन के साथ हुआ। तेज हवाओं में सूखे चावल की तरह वह उड़ने लगा, और आज बिहार की एक पीढ़ी को वह दर्शन उसी तरह लगता है जैसे बासी भात—जिसकी गंध से पुरानी यादें भले जागें, पर उसे खाने का उत्साह कोई नहीं दिखाता। इस संक्रमण को समझने के लिए हमें यह देखना होगा कि बिहार के सामाजिक समीकरण कैसे बदले और जनसुराज जैसी नई राजनीतिक अवधारणाएँ कैसे इस बासीपन को उजागर करती चली गईं।
बीते तीन दशकों में लालू का दर्शन धीरे-धीरे भाषणों, पोस्टरों और स्मृतियों की गिरफ्त में सिमट गया। सामाजिक न्याय का जिस उभार से यह दर्शन पैदा हुआ था, वही उभार समय के साथ अपनी दिशा खो बैठा। लालू की राजनीति ने पिछड़ों की आवाज़ तो बुलंद की, पर उसे संस्थागत रूप नहीं दे पाई। सरकारी पदों, प्रशासनिक ढाँचों और विकास की बुनियादी संरचनाओं में यह सामाजिक न्याय कभी स्थायी रूप नहीं ले सका। दूसरी ओर नई पीढ़ी आई—जो इंटरनेट, शहरों और नौकरी-परीक्षाओं के कठोर संसार में पली।
इस पीढ़ी के लिए ‘जंगलराज’ की स्मृति केवल भाजपा की प्रचार पर्ची नहीं थी, बल्कि घरों में दबी हुई, बड़ों के अनुभवों से निकली हुई चुभन भी थी। इसी वजह से उन्हें लालू का अंदाज़ उतना प्रासंगिक नहीं लगा। “नेताओं का आभामंडल तब टूट जाता है जब जनता अपने दुःख की तुलना नेताओं की स्मृतियों से करने लगती है”—यह बात ऑरवेल ने सत्ता के संदर्भ में कही थी, लेकिन आज बिहार की राजनीति पर उतनी ही लागू होती है।
इसी गिरावट के बीच जनसुराज पार्टी ने अपनी जमीन तैयार की। उन्होंने लालू दर्शन को खारिज नहीं किया—बल्कि उसे ‘पुराना संस्करण’ बताकर उसकी सीमाओं को उजागर किया। जनसुराज ने दो बातें पकड़ीं—एक, बिहार की गरीबी; दूसरी, बिहार की राजनीतिक थकान। उन्होंने पूछा, “सामाजिक न्याय के तीस साल बाद भी बिहार गरीब क्यों?” यह प्रश्न इतना सरल और इतना सीधा था कि लालू के दशकों पुराने भाषण एक झटके में खोखले लगने लगे।
लालूवाद ने अवसर तो दिया, पर अवसर को टिकाऊ राजनीतिक ढांचे में बदलने का कौशल नहीं दिखाया। जनसुराज ने युवाओं को बताया कि राजनीति ‘विरोध’ से नहीं, ‘निर्माण’ से चलती है। जैसे ही युवाओं ने इस अंतर को समझा, लालूवाद की पकड़ ढीली पड़ने लगी। राजनीति में स्मृति का अपना स्थान होता है, पर स्मृति पेट नहीं भरती—और बिहार की सबसे बड़ी लड़ाई पेट की लड़ाई है।
यादव समाज, जो लालू यादव की राजनीति का बुनियादी आधार था, खुद आर्थिक रूप से बदला है। ट्रैक्टर, मंडी, मोबाइल और माइग्रेशन ने उन्हें नई व्यावहारिकता दी है। वे पहले की तरह संघर्ष के रोमांस में विश्वास नहीं रखते। उन्हें स्थिरता चाहिए, पैसा चाहिए, सामाजिक सम्मान चाहिए। यही वर्ग आज महसूस कर रहा है कि लालूवादी राजनीति उन्हें सुरक्षा तो दे सकती है, पर समृद्धि नहीं। दूसरी ओर कोयरी–कुर्मी समाज, जो कभी नीतीश–लालू के बीच हलचल में रहे, आज यह तय कर चुके हैं कि गँवई करिश्मा और जातीय शौर्य के नारे अब उनकी आकांक्षाओं का उत्तर नहीं हैं।
यही वह जमीन है जहाँ जनसुराज ने अपनी जड़ें गाड़ दीं। यह राजनीति न भावनात्मक है, न धार्मिक, न जातीय—यह राजनीति ‘प्रत्यक्ष अनुभवों’ पर चलती है। युवा इसे ‘नया सिस्टम’ मानते हैं, जबकि लालू दर्शन उन्हें ‘पुरानी सरकार की कॉपी’ जैसा दिखता है।
एक और बड़ा बदलाव मुसलमान समाज में आया। मुसलमान मतदाता लालू का सबसे स्थायी स्तंभ थे, लेकिन हाल के वर्षों में वे भी महसूस करने लगे कि उनकी सुरक्षा, प्रतिनिधित्व और आवाज़ को केवल चुनावी मौसम में याद किया जाता है। लालूवाद ने मुसलमानों को सम्मान तो दिया, पर उन्हें भयमुक्त जीवन नहीं दे पाया। जनसुराज ने यही बिंदु पकड़ा। उन्होंने पूछा—“क्या सिर्फ सांकेतिक सुरक्षा से जीवन चलता है?” मतलब साफ था—धर्म-आधारित राजनीति नहीं, अवसर-आधारित राजनीति चाहिए। यह तर्क मुसलमान समाज में धीरे-धीरे गहरा उतरा। नतीजतन, लालू का कभी सबसे सुरक्षित माना जाने वाला मुस्लिम वोट-बेस आज विभाजित और अस्थिर हो चुका है।
अब प्रश्न उठता है—लालू दर्शन आज बासी भात जैसा क्यों लगता है? इसका उत्तर सीधा है—क्योंकि यह दर्शन समय के साथ विकसित नहीं हुआ। लालू की राजनीति में वही भाषण, वही स्वर, वही दोहराव चलता रहा। जनता बदल गई, पर दर्शन नहीं बदला। समय बदल गया, आकांक्षाएँ बदल गईं, पर राजनीति नहीं बदली। जनता केवल वही दर्शन स्वीकार करती है जिसमें उसका वर्तमान और भविष्य दोनों दिखाई दें। लालू का दर्शन संघर्ष-दिनों की स्मृति तो दिखाता है, पर भविष्य का नक्शा नहीं। यही कारण है कि जनता आज उसे खैरात के बर्तन में रखा हुआ सूखा भात समझती है—जिसे खाने से न तृप्ति होती है, न ऊर्जा मिलती है, और कभी-कभी पेट ही खराब हो जाता है।
लालूवाद का पतन लालू यादव की हार नहीं, बल्कि बिहार की सामाजिक चेतना का नया अध्याय है। यह वह अध्याय है जहाँ जनता पूछने लगी है—“हमारे बच्चों का भविष्य कहाँ है?” और कोई दर्शन इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाता, तो वह अपनी नैतिक वैधता खो देता है। इस जनादेश ने लालू दर्शन को समाप्त नहीं किया—उन्होंने उसे पुनर्पाठ के लिए मजबूर किया। क्योंकि सामाजिक न्याय की लड़ाई खत्म नहीं हुई, लेकिन इसे परिवारवाद, जातीय वर्चस्व और घोषणाओं से अलग करना होगा। बिहार एक नया राजनीतिक ढांचा चाहता है—जिसमें पारदर्शिता, अवसर और वास्तविक विकास हो। जब तक लालूवाद इस भाषा में खुद को पुनर्गठित नहीं करेगा, तब तक वह स्मृति से आगे नहीं बढ़ पाएगा।
निष्कर्ष यही है कि लालू का दर्शन अब न तो उतना प्रेरक है, न उतना जीवंत। वह एक ऐतिहासिक अध्याय है—सम्माननीय, प्रभावशाली, परंतु अप्रासंगिक। जनता उसे याद तो रखेगी, पर अपनाएगी नहीं।
