मनोज कुमार
Leh Violence : रेबेका सिर्फ एक शिक्षिका नहीं थी। उसने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से M.Ed. किया, वो भी वांगचुक से आधिकारिक तौर पर शादी के बंधन में बंधने के बाद। वर्ष 1993 में वो इंटरनेशनल स्टडीज में बैचलर्स अमेरिकी संस्थान “स्कूल फाॅर इंटरनेशनल ट्रेनिंग” (SIT) से करने के बाद लद्दाख पहुंची थी, जैसा कि हम पिछले भाग में जान चुके हैं।
शादी के 4 साल बाद सन 2000 में वो M.Ed. करने अमेरिका वापस गई और कोर्स की अवधि समाप्त होते होते वो वांगचुक के लिये American Establishment से चैनल बना कर करके वापस आती है, और फिर सोनम वांगचुक को अशोका फाउंडेशन की फेलोशिप का प्रस्ताव चुटकियों में मिल जाता है। यही वांगचुक के जीवन का टर्निंग पॉइन्ट था।
जल्द ही अशोका फाउंडेशन की फेलोशिप के लिये वो 2002 में 3 साल के लिये अमेरिका के वर्जिनिया पहुंचा और तभी पहली बार उसकी मुलाकात सीधे अमेरिकन इस्टैबलिशमेंट से होती है। और यही वो अवधि थी जब अमेरिकन असेट के रूप में वांगचुक की ग्रूमिंग, स्ट्रेटेजिक ट्रेनिंग इत्यादि यूएस स्टेट द्वारा की जाती है।
अमेरिकन अंतरराष्ट्रीय एनजीओ नेटवर्क जैसे अशोका फाउंडेशन, #फोर्ड फाउंडेशन (सीआईए समर्थित), स्कोल फाउंडेशन (अमेरिकी प्रतिष्ठान से संबंधित), रॉकफेलर फाउंडेशन बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के अंतर्राष्ट्रीय ecosystem, विचारधारा, फंडिंग चैनल से उनका पूरी तरह से इंटीग्रेशन कराया जाता है। कहने की जरूरत नहीं कि ये सभी संस्थाएं अमेरिकी डीप स्टेट के क्लासिक फंडिंग चैनल्स हैं।
उन्हें इस अवधि में उसे बाकायदा मासिक स्टाइपेंट,रहने,खाने का भत्ता भी दिया जाता है। और इस तरह से एक लद्दाखी शिक्षक को सिस्टेमेटिकली अमेरिकी इस्टैबलिशमेंट का असेट बनाया जाता है।
उधर आपको इस बात से ताज्जुब नहीं होना चाहिये कि रेबेका को इस सुनियोजित रणनीति के तहत भारतीय नागरिकता ना दिला कर अमेरिकी नागरिकता बरकार रखी जाती है, ताकि एक अमेरिकी नागरिक को भारतीय कानूनों से बचाव के लिये कवच बना रहे।
अमेरिका में उसकी राजनीतिक झुकाव भी स्पष्ट हैं – वह जो बाइडेन की खुली समर्थक और डोनाल्ड ट्रम्प की कड़ी आलोचक है। और अमेरिकी चुनावों में वो नियमित तौर पर मतदान करने जाती भी रही है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि रेबेका ने लद्दाखी भाषा की शब्दकोश और वाक्यावली बनाई है। 32 साल तक वहां रहकर उसने स्थानीय संस्कृति में पूरी तरह घुसपैठ की है।
गहन अनुसंधान के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि रेबेका नॉर्मन ने कभी भी भारतीय नागरिकता नहीं ली। और ना ही भारतीय नागरिकता हासिल करने की आवेदन प्रक्रिया का कोई सरकारी रिकार्ड ही मिला, कोई OCI card (Overseas Citizen of India) का भी प्रमाण नहीं मिला।
2020 में और 2024 मे वह अमेरिका जाकर ट्रम्प के विरुद्ध वोट तक कर आई। 32 साल भारत में रहकर भी वह अमेरिकन राजनैतिक गतिविधियों में भाग लेती रहती है। यह पैटर्न साफ दिखाता है कि वह अमेरिकन सिटिजनशिप बरकरार रख कर किसी खास मकसद से यहां तैनात है।
आगे….. कैसे मनी लॉन्ड्रिंग किया “3 इडियट्स” के Rancho ने
