रवि अग्रहरि
lifelessons : अष्टावक्र और बंदी संवाद, महाभारत के वनपर्व में तीर्थयात्रापर्व के अध्याय 134 में वर्णित है। यह एक प्रसिद्ध शास्त्रार्थ है जो राजा जनक की सभा में हुआ था। इसमें अष्टावक्र, जो आठ अंगों से टेढ़े थे, ने दुष्ट प्रवित्ति के विद्वान और अहंकारी बंदी को शास्त्रार्थ में पराजित किया था।
अष्टावक्र अद्वैत वेदान्त के महत्वपूर्ण ग्रन्थ अष्टावक्र गीता के ऋषि हैं। उनके अपने बारें में वैसे कई कथाएँ हैं, कई वर्जन भी है। लोगों ने अपने हिसाब से मूल बात कहने के लिए थोड़ा बहुत बदलाव भी किया है। ऐसा लगभग उन सभी महापुरुषों-ऋषियों को लेकर किया गया है जिनके बारें में मूल स्रोत से लोगों ने पढ़ा नहीं या उसकी उपलब्धता नहीं रही।
तार्किक कसौटी पर भी ऐसी कहानियों में बहुत कुछ कई बार सामान्य समझ से परे होता है। यह अंतर दरअसल काव्य और गणित की भाषा के अंतर की वजह से होता है।
गणित में जहाँ जो है सीधा-सीधा वही होता है वहीं काव्य में कहे गए से अलग भी अपना एक समानांतर अर्थ होता है जो पहले से कहीं अधिक गूढ़ होता है। जैसे, पौराणिक कथाएँ जो काव्य की भाषा में लिखी गई हैं, जहाँ क्या है से ज़्यादा जोर क्या होना चाहिए पर या सत्य पर होता है।
जो सत्य और तथ्य के अंतर के कारण होता है। कई बार ऐसा होता है जो तथ्य आपको दिख रहा है वो पूर्णतया सत्य भी हो यह जरुरी नहीं। जैसे किसी को उसके जन्म की तारीख न पता हो तो यह नहीं कहा जा सकता कि वह पैदा ही नहीं हुआ। तारीख तथ्य है लेकिन जन्म सत्य।
फिर भी अष्टावक्र के बारें में जो प्रचलित कथा है उसके अनुसार नाम के अर्थ से ही शुरू करते हैं। ‘अष्टावक्र’ का अर्थ ‘आठ जगह से टेढा’ होता है। कहते हैं कि अष्टावक्र का शरीर आठ स्थानों से टेढ़ा था।
उनके परिचय के रूप में बात की जाए तो जन्म से पहले से शुरू करना होगा- उद्दालक ऋषि के पुत्र का नाम श्वेतकेतु था। उद्दालक ऋषि के एक शिष्य का नाम कहोड़ था। कहोड़ को सम्पूर्ण वेदों का ज्ञान देने के पश्चात् उद्दालक ऋषि ने उनके साथ अपनी रूपवती एवं गुणवती कन्या सुजाता का विवाह कर दिया। कुछ दिनों के बाद सुजाता गर्भवती हो गई।
एक दिन कहोड़ वेदपाठ कर रहे थे तो गर्भ के भीतर से बालक ने कहा कि पिताजी! आप वेद का गलत पाठ कर रहे हैं। यह सुनते ही कहोड़ ने क्रोधित होकर श्राप दे दिया कि तू गर्भ से ही मेरा अपमान कर रहा है इसलिए तू आठ स्थानों से वक्र (टेढ़ा) हो जाएगा।
हठात् एक दिन कहोड़ राजा जनक के दरबार में जा पहुँचे। वहाँ बंदी से शास्त्रार्थ में उनकी हार हो गई। हार हो जाने के फलस्वरूप उन्हें जल समाधी लेनी पड़ी। क्योंकि प्रतियोगिता की यही क्रूर शर्त थी।
इस घटना के बाद अष्टावक्र का जन्म हुआ। पिता के न होने के कारण वह अपने नाना उद्दालक को अपना पिता और अपने मामा श्वेतकेतु को अपना भाई समझते थे।
एक दिन जब वह उद्दालक की गोद में बैठे थे तो श्वेतकेतु ने उन्हें अपने पिता की गोद से खींचते हुए कहा कि हट जा तू यहाँ से, यह तेरे पिता का गोद नहीं है।
अष्टावक्र को यह बात अच्छी नहीं लगी और उन्होंने तत्काल अपनी माता के पास आकर अपने पिता के विषय में पूछताछ की। माता ने अष्टावक्र को सारी बातें सच-सच बता दीं।
अपनी माता की बातें सुनने के पश्चात् अष्टावक्र अपने मामा श्वेतकेतु के साथ बंदी से शास्त्रार्थ करने के लिए राजा जनक के यज्ञशाला में पहुँचे। वहाँ द्वारपालों ने उन्हें रोकते हुए कहा कि यज्ञशाला में बच्चों को जाने की आज्ञा नहीं है। क्योंकि उस समय अष्टावक्र की उम्र महज 10 साल थी।
इस पर अष्टावक्र बोले कि अरे द्वारपाल! केवल बाल श्वेत हो जाने या अवस्था अधिक हो जाने से कोई बड़ा व्यक्ति नहीं बन जाता। जिसे वेदों का ज्ञान हो और जो बुद्धि में तेज हो वही वास्तव में बड़ा होता है। इतना कहकर वे राजा जनक की सभा में जा पहुँचे और बंदी को शास्त्रार्थ के लिए ललकारा।
राजा जनक ने अष्टावक्र की परीक्षा लेने के लिए पूछा कि वह पुरुष कौन है जो तीस अवयव, बारह अंश, चौबीस पर्व और तीन सौ साठ अक्षरों वाली वस्तु का ज्ञानी है?
राजा जनक के प्रश्न को सुनते ही अष्टावक्र बोले कि राजन्! चौबीस पक्षों वाला, छः ऋतुओं वाला, बारह महीनों वाला तथा तीन सौ साठ दिनों वाला संवत्सर आपकी रक्षा करे।
अष्टावक्र का सही उत्तर सुनकर राजा जनक ने फिर प्रश्न किया कि वह कौन है जो सुप्तावस्था में भी अपनी आँख बन्द नहीं रखता? जन्म लेने के उपरान्त भी चलने में कौन असमर्थ रहता है? कौन हृदय विहीन है? और शीघ्रता से बढ़ने वाला कौन है?
अष्टावक्र ने उत्तर दिया कि हे जनक! सुप्तावस्था में मछली अपनी आँखें बन्द नहीं रखती। जन्म लेने के उपरान्त भी अंडा चल नहीं सकता। पत्थर हृदयहीन होता है और वेग से बढ़ने वाली नदी होती है।
अष्टावक्र के उत्तरों को सुनकर राजा जनक प्रसन्न हो गए और उन्हें बंदी के साथ शास्त्रार्थ की अनुमति प्रदान कर दी।
बंदी ने अष्टावक्र से कहा कि एक सूर्य सारे संसार को प्रकाशित करता है, देवराज इन्द्र एक ही वीर हैं तथा यमराज भी एक है।
अष्टावक्र बोले कि इन्द्र और अग्निदेव दो देवता हैं। नारद तथा पर्वत दो देवर्षि हैं, अश्वनीकुमार भी दो ही हैं। रथ के दो पहिए होते हैं और पति-पत्नी दो सहचर होते हैं।
बंदी ने कहा कि संसार तीन प्रकार से जन्म धारण करता है। कर्मों का प्रतिपादन तीन वेद करते हैं। तीनों काल में यज्ञ होता है तथा तीन लोक और तीन ज्योतियाँ हैं।
अष्टावक्र बोले कि आश्रम चार हैं, वर्ण चार हैं, दिशाएँ चार हैं और ओंकार, आकार, उकार तथा मकार ये वाणी के प्रकार भी चार हैं।
बंदी ने कहा कि यज्ञ पाँच प्रकार के होते हैं, यज्ञ की अग्नि पाँच हैं, ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं, पंच दिशाओं की अप्सरायें पाँच हैं, पवित्र नदियाँ पाँच हैं तथा पंक्ति छंद में पाँच पद होते हैं।
अष्टावक्र बोले कि दक्षिणा में छः गौएँ देना उत्तम है, ऋतुएँ छः होती हैं, मन सहित इन्द्रियाँ छः हैं, कृतिकाएँ छः होती हैं और साधस्क भी छः ही होते हैं।
बंदी ने कहा कि पालतू पशु सात उत्तम होते हैं और वन्य पशु भी सात ही, सात उत्तम छंद हैं, सप्तर्षि सात हैं और वीणा में तार भी सात ही होते हैं।
अष्टावक्र बोले कि आठ वसु हैं तथा यज्ञ के स्तम्भक कोण भी आठ होते हैं।
बंदी ने कहा कि पितृ यज्ञ में समिधा नौ छोड़ी जाती है, प्रकृति नौ प्रकार की होती है तथा वृहती छंद में अक्षर भी नौ ही होते हैं।
अष्टावक्र बोले कि दिशाएँ दस हैं, तत्वज्ञ दस होते हैं, बच्चा दस माह में होता है और दहाई में भी दस ही होता है।
बंदी ने कहा कि ग्यारह रुद्र हैं, यज्ञ में ग्यारह स्तम्भ होते हैं और पशुओं की ग्यारह इन्द्रियाँ होती हैं।
अष्टावक्र जवाब दिया कि बारह आदित्य होते हैं, बारह दिन का प्रकृति यज्ञ होता है, जगती छंद में बारह अक्षर होते हैं और वर्ष भी बारह मास का ही होता है।
बंदी ने कहा कि त्रयोदशी उत्तम होती है, पृथ्वी पर तेरह द्वीप हैं।… इतना कहते कहते बंदी श्लोक की अगली पंक्ति भूल गए और चुप हो गए।
इस पर अष्टावक्र ने श्लोक को पूरा करते हुए कहा कि वेदों में तेरह अक्षर वाले छंद अति छंद कहलाते हैं और अग्नि, वायु तथा सूर्य तीनों तेरह दिन वाले यज्ञ में व्याप्त होते हैं।
इस प्रकार शास्त्रार्थ में बंदी की हार हो जाने पर अष्टावक्र ने कहा कि राजन्! यह हार गया है, अतएव इसे भी जल में डुबो दिया जाए।
तब बंदी बोला कि हे महाराज! मैं वरुण का पुत्र हूँ और मैंने सारे हारे हुए ब्राह्मणों को अपने पिता के पास भेज दिया है। मैं अभी उन सबको आपके समक्ष उपस्थित करता हूँ।
बंदी के इतना कहते ही बंदी से शास्त्रार्थ में हार जाने के पश्चात जल में डुबोए गए सारे ब्राह्मण जनक की सभा में आ गए जिनमें अष्टावक्र के पिता कहोड़ भी थे।
अष्टावक्र ने अपने पिता के चरणस्पर्श किए। तब कहोड़ ने प्रसन्न होकर कहा कि पुत्र! तुम जाकर समंगा नदी में स्नान करो, उसके प्रभाव से तुम मेरे शाप से मुक्त हो जाओगे।
तब अष्टावक्र ने इस स्थान में आकर समंगा नदी में स्नान किया और उनके सारे वक्र अंग सीधे हो गए।
यह तो रही अष्टावक्र की कथा और बंदी से शास्त्रार्थ का एक छोटा अंश, निश्चित रूप से यह शास्त्रार्थ बहुत लम्बा चला होगा। यहाँ तो सत्य से अवगत कराने का यह एक छोटा सा प्रयास है।
संवाद का महत्व:
यह संवाद ज्ञान, तर्क, और अहंकार पर विजय का प्रतीक है। अष्टावक्र ने अपने ज्ञान से न केवल बंदी को पराजित किया, बल्कि राजा जनक और अन्य विद्वानों को भी ज्ञान का महत्व समझाया। इस संवाद से यह भी पता चलता है कि ज्ञान और विनम्रता एक साथ कैसे रह सकते हैं।
