डॉ प्रशान्त करण
(आईपीएस) रांची
LifeLessons : साधो ! मनुष्यों की साँसों की यात्रा के दृश्यों को धैर्य मापने के यंत्र से देखें तो विकट अनुभव हुआ करते हैं . धैर्यवान पुरुष और नारियाँ अधिक धैर्य से प्रताड़ना के तट पर मिलते हैं , पृथक – पृथक , नितांत अकेले . वहीँ धैर्य मापक यंत्र में शून्य अंक वाले अधीरता से सफलता के साथ सम्पन्नता के महलों की सीढ़ियों पर खटाखट चढ़ते पाए जाते हैं . लेकिन इनमें से अधिकतर दुःख की पनघट पर आँखों के खारे जल में डूबे भी रहते हैं . उनके धैर्य मापक यंत्र शून्य बताते हैं .धैर्य में संतुलन रखने जीवन संतुलित कर वर्तुल की तरह सुख – दुःख के बीच झूलते रहते हैं . इन तीनों परिस्थितियों में बहुमत अवसाद के पक्ष में है . साधो ! तत्व प्रश्न यह है कि धैर्य कितनी मात्रा में रखी जाए और उसकी कालावधि के सिद्धांत क्या हैं ?
साधो ! हिंसक पशुओं को देखो तो पाओगे कि वह शिकार पकड़ने की प्रक्रिया में असीम धैर्य रखता है और शिकार को पकड़ते ही अपने धैर्य को त्याग कर देता है . वहीं शाकाहारी पशु शिकार होने तक अधैर्य की अवस्था में बेचैन रहता है . अधैर्य भय देता है तो वहीं धैर्य शक्ति और सफलता ही नहीं दुःख – विषाद भी देता है . मनुष्य भय से लड़ भी ले अथवा डर – डर कर जी भी ले , लेकिन दुःख – विषाद के फेरे में कौन पड़े !
साधो ! एक कथा से विषय की गूढ़ता को समझो .ज्ञानचंद धैर्यवान थे . आठ बार आठवीं कक्षा में अनुतीर्ण हुए लेकिन धैर्य नहीं छोड़ा . नौवीं बार धैर्य पूर्वक नकल कर उत्तीर्ण हुए तो पूरा विद्यालय और परिवार दोनों अवाक ! उनके पिता धनीचंद ने आठवीं दुक़ान बिकने तक भी धैर्यवान थे . अब घर बिकने की नौबत आयी तो उनका धैर्य डगमगाने लगा . पत्नी ने सलाह दी कि सम्पत्ति तो आती है , जाती है लेकिन धैर्य न टूटे . परिणामस्वरूप घर भी बिका . अब पड़ोसी राधेश्याम ने दया दिखाते हुए उनके अपने घर में स्थान दिया . धनीचंद ने धैर्य नहीं छोड़ा . राधेश्याम के तीर्थ जाते ही धैर्य पूर्वक राधेश्याम के पूरे घर पर अधिपत्य जमा लिया . पत्नी वियोग में धैर्य रखते हुए राधेश्याम की पत्नी से यह कहकर विवाह कर लिया कि तीर्थ से राधेश्याम अब न लौटेंगे . कह कर गए हैं कि साधु बनेंगे . नियत समय राधेश्याम लौटे तो उन्हें नकली राधेश्याम बताकर धैर्य पूर्वक खदेड़ दिया . अब फिर धैर्य से राधेश्याम के सारे खेत खलिहान अपने नाम कर लिया . उधर राधेश्याम को धैर्य न था . उसने ध्नीराम पर आक्रमण कर दिया . अधैर्य राधेश्याम कारागार पँहुच गया . अब उसने धैर्य सीखा . अब कारागार से छूट कर साधू के वेश में घर गया . धनीराम साधु से प्रभावित हो अपने घर में शरण दी . धैर्य से ध्नीराम ने राधेश्याम को बहला फुसलाकर तीर्थ भेजा . अब उसी धैर्य से उसने अपनी पत्नी , घर , खेत – खलिहान पा लिया . इस कथा को सुनाकर बेताल ने राजा विक्रमादित्य से प्रश्न किया – धैर्य कितना और कब तक ? राजन ने बेताल को क्या उत्तर दिया पता नहीं . लेकिन साधो ! धैर्य मापक तुला में चतुराई और धूर्तता का बट्टा लगा दो तो लाभ ही लाभ है ! जैसे उनके दिन फिरे , सबके दिन फिरें .
