Love : जो मैं ऐसा जानता कि प्रीत किए दुख होय

Bindash Bol

ध्रुव गुप्त

(आईपीएस) पटना

Love : आज स्कूली दिनोंकी एक सहपाठी का फेसबुक पर मित्रता का अनुरोध आया तो स्कूली इश्क़ की पुरानी यादें ताज़ा हो गईं। उस दौर में स्कूली इश्क़ के ज़ुदा अंदाज़ और तेवर हुआ करते थे। इश्क़ का मतलब चाहे पता न हो, प्यार चाहे एकतरफा हो, लेकिन ज़ांबाजी इतनी कि इश्क़ के ख़त तब स्याही से नहीं, खून से लिखे जाते थे। ख़तों के कंटेंट लगभग एक से होते थे – ‘लिखता हूं ख़त खून से स्याही न समझना/मरता हूं तेरे नाम पे जिंदा न समझना’। कमज़ोर दिल वाले आशिक़ जो अपनी ऊंगली काटने से डरते थे, वे चिट्ठी में लाल रंग लगाकर भेजते थे। ख़त हम चाहे जिस महबूबा के हवाले करें, पहुंचना उसे अंततः क्लास टीचर के पास ही होता था। फिर प्रणय-निवेदन का जो अवदान मिलता था, वह था हथेली पर सौ-पचास छड़ी और क्लास रूम के दरवाज़े पर फूल टाइम मुर्गा बनकर अपनी ‘बेवफ़ा’ प्रेमिका और उसकी सहेलियों का भरपूर मनोरंजन। प्रेमिका कुछ ज्यादा ’कोमल-ह्रदय’ हुई तो बात घरवालों तक भी पहुंच जाती थी। फिर शुरू होता था नए सिरे से इश्क़ का भूत झाड़ने का सिलसिला। पूरे स्कूली जीवन में महबूबा तो एक न मिली, लेकिन प्रेम का भूत उतरवाने के कुछ मौके जरूर हाथ लगे। कम से कम इतने कि हाथ और पीठ पत्थर जैसे हो गए। उफ्फ, कैसी तो बेरहम होती थीं हमारे दौर की प्रेमिकाएं ! तमाम दुर्दशा करने और करवाने के बाद हमदर्दी का मरहम लगाना तो दूर, सामने से हंसती हुई ऐसे निकल जाती थीं कि उस वक्त का सबसे लोकप्रिय शेर जुबान पर आ जाता था – ‘आकर हमारी कब्र पर तुमने जो मुस्कुरा दिया / बिजली चमक के गिर पड़ी सारा कफ़न जला दिया !’ वही दौर था जब ज़िंदगी का पहला शेर हमने कहा था _ ’हमने तुमको प्यार किया था, तुमने मारी लात / तेरी याद में इतना रोए, डूब मरी बरसात !’

तब की यादें कुछ इतनी खौफ़नाक हैं कि मोहतरमा का फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार करने में यह सोचकर हाथ कांपे जा रहे हैं कि कहीं पुराना हिसाब बराबर करने इस बार वह नाती-पोतों की फौज लेकर तो नहीं आ गई है !

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