ध्रुव गुप्त
(आईपीएस) पटना
Love : प्रेम को परिभाषित करने की कोशिशें अनंत काल से होती रही हैं। इस विलक्षण सी अनुभूति के बारे में बहुत कुछ कहा और लिखा गया लेकिन लगता नहीं कि इसे शब्दों में कोई भी ठीक ठीक बांध पाया। हमारे पुराणों में एक कथा है जो बहुत हद तक प्रेम के मर्म तक पहुंचती है। कहा गया है कि इस सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा ने अपनी देह को दो भागों में विभाजित किया था। पहला हिस्सा ’का’ था और दूसरा ’या’। दोनों को ही मिलकर काया बनना था। पुरुष हिस्से का नाम स्वयंभुव मनु पड़ा और स्त्री हिस्से का नाम शतरूपा। इन्हीं दोनों के मेल से पृथ्वी पर मनुष्य की उत्पत्ति हुई। काल्पनिक जैसी लगने वाली इस कथा के अर्थ बहुत गहरे हैं। अपने आप में संपूर्ण न पुरुष है और न स्त्री। रचना के बाद पुरुष और स्त्री दोनों ही अपने आधे हिस्से की तलाश में भटक रहे हैं। टुकड़ों में उस आधे की उपलब्धि का सुख कभी प्रेम में मिलता है, कभी विपरीत लिंगी मित्रों में, कभी दांपत्य में और कभी कल्पनाओं में बनी स्त्री या पुरुष छवियों में भी। यह तलाश कभी पूरी नहीं होती। अधूरेपन के इस शाश्वत अहसास और अपने खोए हुए हिस्से को खोज लेने की बेचैनी का नाम ही शायद प्रेम है। प्रेम स्त्री और पुरुष के बीच का यौन आकर्षण या उसकी तृप्ति का नहीं,उस तड़प, उस बेचैनी, उस आंतरिक खुशबू का नाम है जो दो लोग एक दूसरे के साथ रहकर या अलग होकर भी जीवन भर महसूस करते हैं।
भारतीय संस्कृति में अर्द्धनारीश्वर कि कल्पना यूं ही नहीं की गई है।
