- 140 करोड़ का भारत और 32 करोड़ का ‘गैस कनेक्शन’
LPG Reality : भारत में रसोई गैस का विस्तार केवल एक संख्या नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और सामाजिक बदलाव का चेहरा रहा है। जहाँ 2014 में यह आंकड़ा 13 करोड़ पर सिमटा था, वहीं आज 32 करोड़ उपभोक्ताओं का दावा किया जा रहा है। लेकिन क्या यह संख्या ‘संपूर्ण भारत’ का प्रतिनिधित्व करती है? जमीनी हकीकत बताती है कि सिलेंडर की गूँज अभी भी ‘शहर की सीमाओं’ तक ही सीमित है।
1. उज्ज्वला की छलांग और सब्सिडी का ‘डायरेक्ट प्रहार’
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना ने 10 करोड़ नए लाभार्थियों को जोड़कर गैस कनेक्शनों की संख्या को दोगुना जरूर किया है, लेकिन यहाँ सबसे बड़ा बदलाव ‘सिस्टम’ में आया है।
- बिचौलियों का खात्मा: पहले सब्सिडी डीलरों और अफसरों की जेब में जाती थी, आज वह सीधे गरीब के खाते में (DBT) पहुँच रही है।
- 56 हजार करोड़ की बचत: ‘फर्जी सब्सिडी’ की छंटाई ने सरकारी खजाने को वह ऑक्सीजन दी है, जिससे नई बुनियादी योजनाओं को बल मिला है।
- राज्यों का दबदबा: उत्तर प्रदेश (4.5 करोड़) और महाराष्ट्र (3.5 करोड़) जैसे बड़े राज्यों ने आंकड़ों में बाजी मारी है, लेकिन सवाल वही है—क्या इन सिलेंडर में रोज आग जल रही है? 2. 31 किलोमीटर का फासला: जहाँ ‘आंकड़े’ दम तोड़ देते हैं
आपका अनुभव कड़वा मगर सच है। शहर से मात्र 30-40 किलोमीटर दूर जाते ही भारत की तस्वीर बदल जाती है।
- परंपरागत ईंधन का वर्चस्व: जंगल की लकड़ी और गोबर के उपले आज भी ग्रामीण रसोई की पहली पसंद हैं।
- उपलब्धता बनाम सामर्थ्य: उज्ज्वला का सिलेंडर घर में रखा तो है, लेकिन रिफिल कराने की क्षमता आज भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक चुनौती है। इसीलिए गाँव में सिलेंडर ‘मांगने पर’ सहर्ष मिल जाता है, क्योंकि वह अक्सर ‘शो-पीस’ बनकर कोने में पड़ा होता है।
3. नजरिया युद्ध: राष्ट्रव्यापी मुद्दा क्यों नहीं बन पाता सिलेंडर?
विपक्ष चाहे कितनी भी ‘हायतौबा’ मचा ले, लेकिन सिलेंडर की कीमत कभी भी ‘अन्ना आंदोलन’ जैसा राष्ट्रव्यापी जन-उबाल पैदा नहीं कर सकती। इसके पीछे के ठोस कारण….
- विशाल भारत की तटस्थता: भारत की करीब 108 करोड़ आबादी आज भी इस गैस-आधारित ‘शोर’ से सीधे तौर पर नहीं जुड़ी है। उनके लिए ईंधन आज भी प्रकृति से जुड़ा है, बाज़ार से नहीं।
- PNG का कवच: समृद्ध समाज और हाई-राइज बिल्डिंगों में रहने वाले लोग PNG (Piped Natural Gas) का इस्तेमाल करते हैं। उन पर सिलेंडर की कीमतों का कोई मनोवैज्ञानिक असर नहीं पड़ता, जिससे विरोध की धार कुंद हो जाती है।
4. कमर्शियल संकट और ‘रिवर्स माइग्रेशन’ की नियति
कमर्शियल सिलेंडर की बढ़ती कीमतों से रेस्टोरेंट और मेस पर संकट जरूर है, लेकिन यह एक ‘विशिष्ट वर्ग’ की समस्या बनकर रह गई है।
- मजबूर श्रमिक और गाँव का आसरा: यहाँ काम करने वाला श्रमिक वर्ग संकट आने पर ‘शहर’ से लड़ने के बजाय ‘गाँव’ लौटने में यकीन रखता है। कोरोना काल ने सिद्ध कर दिया कि भारतीय ग्रामीण समाज के पास ‘प्रतीक्षा’ करने का अटूट धैर्य है। वे संकट में शोर नहीं मचाते, वे अपने ‘सुरक्षित ठिकानों’ की ओर मौन प्रस्थान कर जाते हैं।
LPG का मुद्दा केवल भाजपा शासित या गैर-भाजपा शासित राज्यों के बीच के ‘नजरिया युद्ध’ (Perspective War) तक सीमित है। असली भारत आज भी पाइपलाइन और सिलेंडर की कतारों से दूर, अपने पारंपरिक संसाधनों के साथ ‘सर्वाइवल’ मोड में है। जब तक 108 करोड़ की यह बड़ी आबादी गैस पर पूरी तरह निर्भर नहीं होती, तब तक यह मुद्दा ‘चुनावी लहर’ तो बन सकता है, ‘जनक्रांति’ नहीं।
