रवि अग्रहरि
mahadev : अक्सर जब हम परेशान होते हैं तो ईश्वर को कोसते हैं कि वह न्याय नहीं कर रहा! हमें मनोवांछित फल नहीं दे रहा है। जबकि हम सभी कर्म के अधीन हैं, कर्मों के परिणाम से कोई नहीं बचा है, न बचेगा। लेकिन हम अपने परिणाम में करुणा, चमत्कार और न्याय भी अपने पक्ष में चाहते हैं और दूसरे को स्वयं जज कर चाहते हैं कि उसे ईश्वर वही दंड दे जो हमने एक दो कर्मों की आंशिक योजना के आधार पर तय कर रखा है।
ऐसा नहीं है कि जो आपको लग रहा है किसी एक सन्दर्भ में बहुत आनंद में है वह सच में आनंद में ही है। यहाँ हर किसी का अपना दुःख है- चाहे वह किसी धर्म, पंथ, वर्ग, जाति, आय समूह, पद-प्रतिष्ठा, लिंग का क्यों न हो?
आप अच्छे कर्म कीजिए जिसकी गवाही आपका हृदय स्वयं देगा कि आप जो कर्म कर रहे हैं वह पाप-पुण्य या समाज-कानून के किस दायरे में आता है। बाकी सभी को उनके कर्म के अनुसार फल निश्चित है। प्रकृति किसी से भेदभाव नहीं करती, न सबके लिए अलग-अलग नियम तय करती है।
और हाँ, ईश्वर किसी डेस्क के पीछे बैठा कोई बूढ़ा क्लर्क थोड़े न है कि जो हर वक्त आपके पाप-पुण्य का हिसाब करे, न ईश्वर मैनेजर है कि दुनिया मैनेज करें। आपके कर्म आपके मन के आकाश में संग्रहित हैं। आपके कर्मों और उनके परिणामों का पूरा ढांचा निर्वात में, मन के आकाश में, आकाशिक रिकॉर्ड के रूप में दर्ज है।
वहीं ईश्वर व्यक्ति नहीं परम चेतना का नाम है। किसी सन्दर्भ में कहूँ तो विद्युत की तरह है। जो बरतना जानने वाले के लिए सुविधाएँ देता है और सॉकेट में उंगली डालने वाले को झटका। कर्म का सिद्धांत समझ आ गया होगा शायद! नहीं आया तो दोबारा पढ़िएगा।
और रह गई बात ईश्वर की तो वह एक आध्यात्मिक अनुभव है। उसे सिद्ध नहीं किया जा सकता। बल्कि ऐसा प्रयास करना भी स्वयं और दूसरों को भ्रमित करना है। लेकिन लोग इस क़वायद में लगे रहते हैं सिर्फ अपना ईगो शांत करने के लिए। समझिए, जो धतकरम आप कर रहे हैं ईश्वर का प्रमाण माँग या उसे स्वयं अनुभव न कर दूसरों के सामने सिद्ध करने का निरर्थक प्रयास करके वह व्यर्थ है। आप तो चम्मच से समुद्र की थाह लगाने निकले हैं। ध्यान रहे, चम्मच से समुद्र की नाप जोख नहीं हो सकती।
