Mahakaleshwar Jyotirling : शिव जी के बारह ज्योतिर्लिंगों में तीसरा है महाकालेश्वर, एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है महाकाल

Sanat Kumar Dwivedi

Mahakaleshwar Jyotirling :देशभर में शिव जी के 12 ज्योतिर्लिंग हैं। इनमें तीसरा ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित है। इस मंदिर में महाकाल लोक बनने के बाद सावन में लाखों भक्त रोज दर्शन-पूजन के लिए पहुंच रहे हैं। उज्जैन और इंदौर के बीच की दूरी करीब 55 किमी और भोपाल से उज्जैन की दूरी करीब 200 किमी है। महाकाल का ज्योतिर्लिंग दक्षिण मुखी है। ये इस शिवलिंग की सबसे खास बात है। ये एकमात्र ज्योतिर्लिंग है, जिसका मुख दक्षिण दिशा में है। ये मंदिर शिप्रा नदी के पास ही स्थित है। हर 12 साल में एक बार उज्जैन में सिंहस्थ का मेला लगता है। अगला सिंहस्थ 2028 में लगेगा।

जानिए महाकालेश्वर मंदिर और उज्जैन से जुड़ी खास बातें…

  • ज्योतिर्लिंग यानी शिव जी ज्योति स्वरूप में विराजित हैं। देशभर में 12 ज्योतिर्लिंग हैं। इन 12 जगहों पर शिव जी प्रकट हुए थे और भक्तों की इच्छा पूरी करने के लिए इन जगहों पर ज्योति रूप में विराजमान हो गए। ज्योतिर्लिंगों में सोमनाथ, मल्लिकार्जुन के बाद तीसरे नंबर पर महाकालेश्वर मंदिर आता है। ये मंदिर शिप्रा नदी से कुछ ही दूरी पर स्थित है।
  • माना जाता है कि पुराने समय महाकाल मंदिर के क्षेत्र में वन था। इस वन को महाकाल वन कहा जाता था। स्कंद पुराण के अवंती खंड, शिव महापुराण में भी महाकाल वन का जिक्र है।
  • एक पौराणिक कथा के मुताबिक, इस क्षेत्र में दूषण नाम का एक दैत्य शिव भक्तों और ऋषि-मुनियों को प्रताड़ित कर रहा था। उस दैत्य को मारने के लिए शिव जी यहां प्रकट हुए थे। दैत्य का वध करने के बाद सभी भक्तों ने शिव जी की स्तुति की और भगवान से प्रार्थना की थी कि अब से वे यहीं वास करें। भक्तों प्रार्थना सुनकर शिव जी यहां के शिवलिंग में ज्योतिरूप में विराजित हो गए।
  • शास्त्रों का एक मंत्र है- आकाशे तारकेलिंगम्, पाताले हाटकेश्वरम्। मृत्युलोके च महाकालम्, त्रयलिंगम् नमोस्तुते।। इस इस मंत्र के मुताबिक, सृष्टि में तीन लोक हैं- आकाश, पाताल और मृत्यु लोक। आकाश लोक के स्वामी हैं तारकलिंग, पाताल के स्वामी हैं हाटकेश्वर और मृत्युलोक के स्वामी हैं महाकाल। मृत्युलोक यानी पूरे संसार के स्वामी महाकाल ही हैं।
  • बारह ज्योतिर्लिंगों में सिर्फ महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की ही भस्म आरती की जाती है। शिवपुराण के अनुसार कपिला गाय के गोबर से बने कंडे, शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बैर के पेड़ की लकडि़यों को जलाकर भस्म तैयार की जाती है। मंत्र-जप करते हुए भस्म को शुद्ध किया जाता है। इसके बाद इस भस्‍म को कपड़े से छानते हैं और फिर इस भस्म से महाकाल की आरती की जाती है।
  • महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर की इमारत के ऊपरी तल पर मराठाकालीन नागचंद्रेश्वर भगवान की प्रतिमा स्थापित है। इस प्रतिमा के दर्शन साल में सिर्फ एक बार नाग पंचमी पर ही होते हैं। इस बार नाग पंचमी 21 अगस्त को रहेगी।
  • हर साल सावन महीने के सभी सोमवार और भादौ महीने के एक पक्ष के सोमवार को महाकाल की सवारी निकलती है। महाकाल की प्रतिमा को चांदी की पालकी विराजित किया जाता है, इसके बाद बाबा की पालकी को शिप्रा नदी के घाट पर ले जाते हैं और वहां से उज्जैन का भ्रमण करते हुए भगवान अपने मंदिर लौट आते हैं। भादौ महीने की अंतिम सवारी को शाही सवारी कहा जाता है।
  • महाकाल शब्द का एक अर्थ है महा+काल यानी समय के स्वामी। उज्जैन को कालगणना का केंद्र माना जाता है। इसी वजह से उज्जैन में बने पंचांगों का महत्व काफी है। माना जाता है कि ज्योतिषीय काल गणना के लिए उज्जैन सर्वश्रेष्ठ स्थान है।
  • महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के पास ही 51 शक्तिपीठों में से एक हरसिद्धि शक्तिपीठ स्थापित है। शिव जी, देवी शक्ति और शिप्रा नदी के कारण इस ज्योतिर्लिंग का महत्व काफी अधिक बढ़ गया है।
  • महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर का इतिहास हजारों साल पुराना है। मंदिर की इमारत परमार कालीन मानी जाती है। उज्जैन में परमार राजाओं का राज 10-11 सदी के आसपास का माना जाता है। इस मंदिर का संबंध उज्जैन के राजा विक्रमादित्य से भी है। विक्रमादित्य के नाम से ही विक्रम संवत चल रहा है।
  • उज्जैन के कालभैरव का एक प्राचीन मंदिर स्थापित है। कालभैरव को शहर का कोतवाल माना जाता है। कालभैरव को चांदी की प्लेट से शराब पिलाई जाती है। आज भी ये चमकत्कार आसानी से मंदिर में देखा जा सकता है। इसके साथ ही उज्जैन का संबंध भगवान श्रीकृष्ण से भी है। श्रीकृष्ण ने यहां ऋषि सांदीपनि से शिक्षा ग्रहण की थी। यहीं श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता भी हुई। श्रीकृष्ण की एक पटरानी मित्रवृंदा उज्जैन की राजकुमारी थीं।
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