MahaKumbh 2025: नागाओं के नाम में छिपी है उनकी पहचान, कोई है खूनी तो कोई बर्फानी

Dilip Kushwaha

MahaKumbh 2025: उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में 13 जनवरी 2025 से महाकुंभ लगने जा रहा है। इस महाकुंभ में लाखों नागा साधु शामिल होंगे। नागा साधु लोगों के लिए आश्चर्य का केंद्र होते हैं। इनमें से कुछ नागाओं को खूनी नागा भी कहते हैं।

हर 12 साल में उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में कुंभ मेला का आयोजन होता है। इस बार 13 जनवरी 2025 से यहां महाकुंभ लगने जा रहा है। इस मेले में लाखों साधु-संत शामिल होकर पवित्र संगम स्थान पर डुबकी लगाएंगे। इन साधु-संतों में सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र नागा साधु होते हैं। इनमें से कुछ नागा साधुओं को खूनी तो कुछ को बर्फानी कहा जाता है। नागाओं के इन विशेष नाम पीछे खास वजह है। आगे जानें किसे कहते हैं खूनी नागा…

क्या है नागाओं के नाम के पीछे का रहस्य?

परंपरा के अनुसार, एक निश्चित समय पर देश के 4 धार्मिक शहरों उज्जैन, प्रयागराज, हरिद्वार और नासिक में कुंभ मेला लगता है। इन चारों ही स्थान पर लाखों की संख्या में साधु-संत आते हैं। इस दौरान जो लोग नागा साधु बनना चाहते हैं, उन्हें भी संन्यास परंपरा के अनुसार दीक्षा दी जाती है। इन 4 स्थानों पर बनने वाला नागा साधुओं के नाम भी अलग-अलग होते हैं।

कहां बनते हैं खूनी नागा?

परंपरा के अनुसार, उज्जैन में जो नागा साधु दीक्षा लेते हैं, उन्हें खूनी नागा कहते हैं। कहा जाता है कि खूनी नागा सैनिक की तरह होते हैं, जो धर्म की रक्षा के लिए खून भी बहा सकते हैं। खूनी नागा अस्त्र-शस्त्र धारण किए रहते हैं। इनका स्वभाव भी काफी गुस्सैल रहता है।

कहां बनते हैं बर्फानी नागा?

जिस तरह उज्जैन में दीक्षा लेने वाले नागाओं को खूनी कहा जाता है, उसी तरह हरिद्वार में दीक्षा लेने वाले नागाओं को बर्फानी नागा कहा जाता है। देखा जाए तो हरिद्वार चारों तरफ से बर्फ के पहाड़ों से घिरा हुआ है और यहां ठंड भी ज्यादा होती है। इसलिए यहां दीक्षा लेने वालों को बर्फानी नागा कहते हैं।

किन्हें कहते हैं राजराजेश्वर नागा?

मान्यता के अनुसार प्रयागराज के संगम स्थान पर जो व्यक्ति नागा संन्यासी की दीक्षा लेते हैं, उन्हें राजयोग मिलता है। शायद इसीलिए उन्हें राजराजेश्वर नागा कहा जाता है।

कहां बनते हैं खिचड़िया नागा?

नासिक में भी हर 12 साल में कुंभ मेले का आयोजन होता है। यहां दीक्षा लेने वाले नागाओं को खिचड़िया नागा कहा जाता है। इनकी परंपराएं अन्य स्थान पर दीक्षा लेने वाले नागाओं से अलग होती है।

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