Mahakumbh 2025 : मेला महाकुम्भ का

Prashant Karn

Mahakumbh 2025 : मेला अपने आप में एक जटिल विषय है . जटिल इसलिए कि समाज के कई प्रकार के लोगों का इससे जुड़ाव होता है और साथ ही उनकी अपनी – अपनी अपेक्षाएं . यही स्थिति सरकार के नाना प्रकार के विभागों की भी होती हैं एक से बढ़कर एक अपेक्षाएं और उनके कारण लगाव – जुड़ाव . मेला धार्मिक हो तो धर्म और अधर्म दोनों से जुड़े लोग , उनकी संस्थाएं भी अपना आयाम खोजने लगते हैं .सब की चल निकलती है . चलते – चलते इतनी दूर पँहुच जाती है कि आम आदमी को दीखते नहीं . पास रहकर भी अपने – अपने समझ से परे . मेले में ठेला न हो , रेला न हो , झमेला न हो तो मेले का मजा ही क्या ? मेला तो शिव की साक्षात बरात बन जाती है . नाना प्रकार के व्यवसाय , व्यवसायी भी बरसात के कुकुरमुत्ते बन जाते हैं . अन्यान्य प्रकार के धंधों का समावेश , अनेक प्रजाति के मानवों का समागम ! सब के सब फलते – फूलते और फैलते हैं . मेले की एक अपनी मनोवृति , एक अपना संसार साथ ही अलग – अलग उद्देश्य हुआ करते हैं . उस पर जब मेला कुम्भ का हो तो कहना ही क्या ? सोने पर सुहागा . और फिर बात महाकुम्भ मेले की हो तो मेले के सभी अवयवों , दर्शन , सुदर्शन , अर्थ , अनर्थ अपने चरमोत्कर्ष पर ! क्या नहीं दीखता , क्या नहीं मिलता . जिसकी रही भावना जैसी , प्रभु मूरत देखि तिन तैसी ! लुटने वाले भी प्रसन्न और लूटने वाले भी !
कुम्भ भाव से चलता है . प्रयागराज , हरिद्वार , उज्जैन और नासिक सभी के कुम्भ , महाकुम्भ के कालखंड की गणना अलग – अलग . अर्ध कुम्भ षटवर्षीय और पूर्ण कुम्भ द्वादश भाव रखते हैं . द्वादश – द्वादश भाव में महाकुम्भ . हमारी सनातन ज्योतिषीय और खगोलीय ज्ञान का गुण , दर्शन एक धर्म विशेष और उनके सम्पोषक वामपंथियों को छोड़ पूरा विश्व मानता है और अब यह स्पष्ट भाव से दीखता भी है . सनातन संस्कृति , उपासना के भिन्न – भिन्न मार्ग , योग – हठयोग के नाना प्रकार के पंथ , मठ , साधु – सन्यासी , नाना प्रकार की सिद्धियाँ एक साथ एकत्रित ! अद्भुत समागम का अनुपम दृश्य . आम तौर पर न दिखने वाले , संधारण शब्दों में समाज से अदृश्य हो साधनारत एक से बड़े एक साधु – संत सब कुम्भ के कालखंड में एक साथ कल्पवास करते मिलते हैं . धार्मिक – आध्यात्मिक – योग – हठयोग के ज्ञान का असीमित आगर , कुम्भ !
हमारी पीढ़ी ने कुम्भ मेले में बिछड़ने की कई कथाएं बचपन से पढ़ी . सब के मन में वह अंकित हो गयीं . इसी परिपेक्ष्य और पृष्ठभूमि में रामलाल इस वर्ष तीर्थराज प्रयाग में चल रहे महाकुम्भ मेले की प्रशंसनीय व्यवस्था से इतने दुःखी निकले कि सीधे बुराई करते दिखे . कहने लगे – कुम्भ में बिछड़े बिरले ही मिलते हैं . लेकिन मेरी सगी और एकलौती पत्नी कुल बारह बार बिछड़ी और हर बार पुलिस ने उसे खोजकर मुझे ही सौंप दिया . हमारी वर्षों की सोच को गहरा धक्का लगा है . कम से कम बारहवीं बार तो खोजकर न सौंपते . सारे अरमान धरे के धरे रह गए . अब लौटकर रामकली को क्या कहूँगा , क्या मुँह दिखाऊँगा ? अब तो सात जन्मों तक वह मेरी छाती पर मूँग दलेगी , साथ सात बार संगम तट पर डुबकी जो लगाई और मुझे भी लगवा दी है !
मेरा भी सौभाग्य रहा कि अपनी सगी और एकलौती धर्मपत्नी के साथ तीर्थराज प्रयाग के ठीक संगम में कुल चौदह डुबकियाँ लगाई . अपना तो सात क्या चौदह जन्म का मामला बन गया . रामलाल तो बन नहीं सकता कि कोई रामकली का मामला हो ! मेले में ऐसे कई व्यवसाय , धंधे देखे , जिसकी कल्पना कोई विलक्षण शक्तियों वाला मनुष्य भी जीते जी सोच नहीं सकता . टीका लगाने से लेकर स्वचलित द्विचक्र , चतुष्चक्र वाहनों के चालकों का अद्भुत मोल – भाव आकर्षित करता है . जब से सुना कि सोशल मिडिया में स्वयं को टिंबर मर्चेंट कहने वाले असल में संगम में दातुन बेचकर चालीस – पचास हजार रुपए इस महाकुम्भ में कमा लिए तब मन होता है कि एक अदद प्लास्टिक की कुर्सी पर ही अथवा कंधों पर बिठाकर किसी धनाढ्य श्रद्धालु को द्वार से घाट ले जाकर कुछ धन भी अर्जित कर लूँ अथवा घाट – घाट का पानी ही पी लूँ . पर मेरे कुसंस्कारों ने ऐसा भी नहीं करने दिया . धर्मपत्नी भी नहीं बिछड़ीं ! वस्तुतः हम दोनों ने अपने आप को प्रवेश द्वार पर ही भीड़ को सौंप दिया .श्रद्धालुओं की भीड़ हमें अपने साथ बहाते हुए सीधे संगम घाट ले गयी और स्नानोपरांत पुनः पवेश द्वार पर छोड़ गयी . हम दोनों भीड़ की गोद में बैठ कर सकुशल गए और लौटे . मानो गंगा – यमुना – सरस्वती माताओं ने भाँप लिया था कि यह कुकर्मी आ गया है , सो उठवाकर सीधे अपने गोद में ले लिया . मेरे विगत एक सौ चौआलिस वर्षों के पाप एक झटके में धुल गए . अब नवल – धवल इस अधम शरीर के साथ अगले एक सौ चौआलिस वर्षों तक कलियुग के इस कालझंड में छूटकर , खुलकर पाप करने को स्वतंत्र हो गया हूँ . कलियुग में सतयुग की सोच , धर्म और आचरण का अनुगमन करना , सदाचार , सत्यनिष्ठा आदि पाप ही तो है !

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