Mahashivratri : भगवान शिव: देवों के महादेव क्यों ?

Bindash Bol

वेद माथुर

Mahashivratri : हिंदू धर्म में भगवान शिव का स्थान सर्वोच्च और अद्वितीय है। उन्हें “देवों का देव” यानी “महादेव” कहा जाता है, जो उनकी अपार शक्ति, करुणा और अलौकिक गुणों का प्रतीक है। वे सृष्टि के संहारक होने के साथ-साथ संतुलन और पुनर्जन्म के भी आधार हैं। उनकी यह उपाधि उनके विशिष्ट स्वभाव को दर्शाती है, जो देवताओं और असुरों दोनों के लिए पूजनीय और आवश्यक है। इस लेख में हम जानेंगे कि भगवान शिव को यह सम्मान क्यों प्राप्त हुआ, उनकी विशेषताएँ, समुद्र मंथन में उनकी भूमिका और उनकी अनोखी बारात का विवरण।

भगवान शिव को “महादेव” क्यों कहा जाता है?

  1. सृष्टि चक्र में उनकी सर्वोच्च भूमिका

हिंदू त्रिमूर्ति में ब्रह्मा सृष्टिकर्ता, विष्णु पालनकर्ता और शिव संहारक माने जाते हैं। यहाँ संहार का अर्थ केवल विनाश नहीं है, बल्कि पुराने को समाप्त कर नए की सृष्टि का मार्ग प्रशस्त करना भी है। शिव की यह भूमिका उन्हें अन्य देवताओं से अलग और महान बनाती है।

  1. निष्पक्षता और करुणा

भगवान शिव का स्वभाव अद्भुत है। वे कैलाश पर्वत पर ध्यानमग्न रहते हैं, फिर भी अपने भक्तों की पुकार तुरंत सुनते हैं। चाहे देवता हों या दानव, शिव सभी के प्रति समान भाव रखते हैं। उनकी करुणा और निष्पक्षता ही उन्हें “देवों का देव” बनाती है।

  1. समुद्र मंथन में विषपान

जब देवताओं और असुरों ने अमृत पाने के लिए समुद्र मंथन किया, तो सबसे पहले हलाहल विष निकला। यह विष इतना प्रचंड था कि समस्त सृष्टि के विनाश का खतरा उत्पन्न हो गया। तब भगवान शिव ने बिना किसी स्वार्थ के उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे “नीलकंठ” कहलाए। यह घटना उनकी निःस्वार्थ करुणा और विश्व-रक्षक स्वरूप को दर्शाती है।

भगवान शिव की कुछ विशेषताएँ उन्हें अन्य देवताओं से अलग बनाती हैं….

जटाओं में बहती गंगा – जो पवित्रता और जीवन का प्रतीक है।
गले में नाग – जो समय और मृत्यु पर उनके नियंत्रण को दर्शाता है।
त्रिशूल – उनकी तीन शक्तियों (इच्छा, क्रिया और ज्ञान) का प्रतीक है।
डमरू – जो सृष्टि की ध्वनि और लय को व्यक्त करता है।

भगवान शिव का स्वभाव अद्भुत है। वे क्रोध में तांडव करते हैं, परंतु शांतचित्त योगी भी हैं। वे वैरागी हैं, फिर भी पार्वती, गणेश और कार्तिकेय के साथ एक पारिवारिक जीवन जीते हैं। इसी संतुलन के कारण वे “महादेव” कहलाते हैं।

समुद्र मंथन की कथा भगवान शिव की महानता का जीवंत उदाहरण है। जब अमृत के लिए समुद्र मंथन किया गया, तो सबसे पहले हलाहल विष निकला, जिसने समस्त सृष्टि को विनाश के कगार पर पहुंचा दिया।
यह विष इतना भयंकर था कि देवता और असुर दोनों भयभीत हो गए। विष के प्रभाव से जल, वायु और आकाश प्रदूषित होने लगे।
सभी देवता भगवान शिव की शरण में पहुँचे और प्रार्थना की।
भगवान शिव ने बिना कोई विलंब किए विष को अपने कंठ में धारण कर लिया, लेकिन उसे न निगला और न ही उगला।
इससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे “नीलकंठ” कहलाए।

भगवान शिव की बारात हिंदू धर्म में सबसे विचित्र और अनोखी बारात मानी जाती है।
जब शिव का विवाह माता पार्वती से तय हुआ, तो उनकी बारात किसी सामान्य राजसी बारात की तरह नहीं थी। शिव अपने गणों, भूत-प्रेतों, पिशाचों और योगियों को साथ लेकर चले। वे नंदी बैल पर सवार थे, उनके शरीर पर भस्म लगी थी और गले में नाग थे।
बारात में भूत-पिशाच नाचते-गाते चल रहे थे, और ढोल-नगाड़े बज रहे थे।
जब माता पार्वती के माता-पिता, हिमवान और मैना, ने यह बारात देखी, तो वे अचंभित रह गए।
सामान्य रूप से राजसी बारातों में सोने-चाँदी और शाही ठाठ-बाट होता है।
लेकिन शिव की बारात सादगी और आध्यात्मिक शक्ति से भरी थी।
कुछ कथाओं में कहा जाता है कि शिव ने अपनी माया से बारात को भव्य बना दिया, ताकि पार्वती के परिवार को संतोष हो।
शिव की यह अनोखी बारात हमें सिखाती है कि सच्चा वैभव बाहरी चमक-धमक में नहीं, बल्कि आंतरिक शक्ति और सादगी में है।

शिव अद्भुत हैं और उनके अनेक रूप ….

महादेव – महान देवता, जो सभी देवताओं में सर्वोच्च हैं।
त्रिलोकीनाथ – तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) के स्वामी।
नटराज – नृत्य का स्वरूप, जो सृष्टि और संहार का प्रतीक है।
भोलेनाथ – सरल और दयालु स्वभाव वाला, जो भक्तों की पुकार आसानी से सुन लेते हैं।

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