Mahashivratri : शिवत्व के जागरण की पावन रात्रि

Niranjan Srivastava

Mahashivratri : शिव हिंदुओं के एक प्रसिद्ध देवता हैं। इनपर सृष्टि का संहार करनेका भार है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश ये पौराणिक त्रिमूर्त्ति के नाम से प्रसिद्ध हैं। शिव इस त्रिमूर्त्ति के अंतिम देवता हैं। इनका निवास स्थान कैलाश पर्वत माना गया है। वैदिक काल से ही शिव हिंदुओं के एक प्रसिद्ध देवता हैं। वैदिक काल के रुद्र ही पौराणिक काल में शंकर, महादेव आदि नामों से प्रसिद्ध हुए। पुराणानुसार इनके सिर पर गंगा, मस्तक पर चंद्रमा तथा तीसरा नेत्र, गले में साँप, सारे शरीर पर भस्म, व्याघ्रचर्म ओढ़े हुए तथा संग में पार्वती हैं। इनका वाहन नन्दी नामक बैल है। इनके गण भूत और प्रेत हैं। इनके धनुषाकार त्रिशूल का नाम ‘पिनाक’ है जिसके कारण उन्हें पिनाकी कहते हैं। इनके पास ‘पाशुपत’ नामका एक प्रसिद्ध अस्त्र था जिसे अर्जुन ने इन्हें तपोबल से प्रसन्न कर प्राप्त किया था।
समुद्र मंथनसे निकले विष का संसार के कल्याणार्थ इन्होंने पान किया था। प्राणघातक होनेके कारण इसे उन्होंने कंठ में ही रोक लिया था। जिससे इनका कंठ नीला पड़ गया और ये ‘नीलकंठ’ कहलाये। इनके नाम का शिवपुराण एक प्रसिद्ध पुराण है। इनके उपासक शैव कहलाते हैं। ये बड़े ही दयालु तथा शीघ्र ही प्रसन्न होने वाले हैं, अतः इन्हें ‘आशुतोष’ भी कहा जाता है। आशुतोष शिव भारतीय मन को सहज लुभाते हैं। ऐसे देवता से जुड़कर हरएक मन महीप बन जाता है।


‘शिवरात्रि’ फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को मनाया जाने
वाला शैवों का एक प्रसिद्ध पर्व है। ‘शिवरहस्य’ में कहा गया है :-
चतुर्दश्यां तु कृषणायां फाल्गुने शिवपूजनम्।
तामुपोष्य प्रयत्नेन विषयान् परिवर्जयेत् ।।


प्रतिवर्ष करने से यह ‘नित्य’ और कामनापूर्वक करने से ‘काम्य’ होता है। कहा जाता है कि चौदहवीं तिथि यानी चतुर्दशी के स्वामी शिव हैं। अतः इसका शिवरात्रि नाम सार्थक है। यह भी कहा जाता है कि इसी दिन शिवका पार्वती से विवाह हुआ था। इसे चारों वर्णों के स्त्री-पुरुष, बाल-युवा-वृद्ध सब कर सकते हैं। यह व्रत इतना कठिन है कि वेदपाठी ही कर पाते है और सरल इतना है कि गरीब से गरीब कर ले।
ईशानसंहिता के अनुसार करोड़ों सूर्य की प्रभा के समान भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को निशीथ में हुआ था:-
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दश्यामादिदेव।
शिवलिंगतयोद्भूत कोटिसूर्यसम्प्रभः।।
अतः इसे महाशिरात्रि भी कहा जाता है। ब्रह्मा ने रुद्र रूपी शिव की उत्पत्ति इसी दिन की थी।
प्रलय के बाद सबकुछ विनष्ट हो गया था। हर जगह शून्य ही शून्य था। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शंकर ने तांडव नृत्य किया था तथा अपने डमरू के निनाद से सारे वायुमण्डल में ज्ञान-विज्ञानको सूक्ष्म रूप से व्याप्त कर दिया था। तभी से महाशिवरात्रि का महात्म्य आजतक बना हुआ है। प्रत्येक आस्तिक हिंदू पूरी श्रद्धा से अपने सामर्थ्य अनुसार शिव की आराधना करता है। निराहार व्रत और जागरण ही इस पर्व का प्रधान अंग है। सामवेदीय और ऋग्वेदीय पद्धति से स्वस्तिवाचन और पूजन करनेके बाद चार बार प्रत्येक प्रहरमें शिवपूजन का विधान है। प्रथम प्रहर में दुग्ध से शिव की ईशान मूर्त्ति को, द्वितीय प्रहर में अघोर मूर्त्ति को दधि से, तृतीय प्रहर में शिवकी वामदेव मूर्त्ति को घृत से और चतुर्थ प्रहर में सद्योजात मूर्त्ति को मधु से स्नान करा पूजन करना चाहिये। दूसरे दिन अमावश्याको व्रत-कथा सुनकर पारण करना चाहिए। शिवपुराण में इस पर्व की विशेष व्याख्या दी गई है।
अज्ञान के नाश और भक्ति के प्रकाश का पावन दिन है महाशिवरात्रि। यह शिव-शक्ति के संतुलन का दिन है। यह रात शिव और पार्वती के विवाह और सोहाग की ही रात नहीं, यह विश्व-सृष्टि के बीच संवाद की स्थिति लाने वाली, व्यष्टि-समष्टि के बीच समरसता स्थापित करने वाली उत्सव की रात्रि है। आज की रात्रि एक-एक क्षण चिन्मय प्रकाश की ताल पर नाच रहा है। एक-एक क्षण अपूर्व उल्लास की नई हिलोर है, हम शिव को उस हिलोर में पा सकते हैं। महाशिवरात्रि का पर्व आदि देव महादेव को याद करते हुए स्वयं सदाशिव हो जाने का दिन है।
शिव का अर्थ है कल्याण, मंगल, मंगलकारी और शुभ। शिवत्व एक गुण है जो प्रकृत्या कल्याणकारी, मंगलकारी और शुभ है। शिव ओर शिवत्व को धारण या आत्मसात
करने का अर्थ है दूसरों के लिए कल्याणकारी, मंगलकारी और शुभ बनना। दूसरों के लिए कल्याणकारी, मंगलकारी और शुभ बनना ही महाशिवरात्रि पर्व का संदेश है।

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