नीरज कृष्णा (पटना)
Navratri : नवरात्रि के दिनों में हम कहते हैं कि शक्ति घर-घर उतरी है। माँ दुर्गा के कलश, उनके गीत और उनका आह्वान हर आँगन में गूँजता है। हम देवी को आमंत्रित करते हैं कि वे हमारे घर आएँ, हमें आशीर्वाद दें, हमें शक्ति दें। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है — हमारे अपने घरों में जो बेटियाँ हैं, वे भी तो शक्ति का ही रूप हैं।
भारत में आज भी कई बेटियाँ जन्म से पहले ही अपनी कहानी खो बैठती हैं। जो जन्म लेती हैं, उन्हें पढ़ाई-लिखाई में लड़कों से कम अवसर मिलता है। बड़े होते-होते उन्हें “लोग क्या कहेंगे” के नाम पर अपने सपने छोड़ने पड़ते हैं। शादी, दहेज, चरित्र पर सवाल — इन सबके बीच बेटी का जीवन एक निरंतर संघर्ष बन जाता है।
और फिर भी, यही बेटियाँ अपने घरों को रोशनी देती हैं। वे पढ़ती हैं, कमाती हैं, माता-पिता का सहारा बनती हैं। वे संकट में सबसे पहले खड़ी होती हैं। वे भाई की तरह कमाती हैं, माँ की तरह पालती हैं, पिता की तरह जिम्मेदारी उठाती हैं। यही तो शक्ति है — जो घर-घर उतरती है।
परंतु इस शक्ति को पूजा की मूर्ति में बाँध देने से काम नहीं चलेगा। बेटी को तब शक्ति मानना होगा जब हम उसे पढ़ने के लिए समान अवसर दें, उसकी सुरक्षा को प्राथमिकता बनाएं, उसके निर्णय को महत्व दें, और उसकी स्वतंत्रता का सम्मान करें।
नवरात्रि में हम कन्या-पूजन करते हैं, उन्हें भोजन कराते हैं, पैर छूते हैं। लेकिन क्या यही सम्मान साल के बाकी दिनों में भी मिलता है? क्या वही बेटी अपनी पढ़ाई चुन सकती है? क्या वही बेटी अपने विवाह का निर्णय खुद ले सकती है? क्या वही बेटी देर रात बाहर निकल सकती है बिना डर के?
हमें बेटियों को केवल सुरक्षा का आश्वासन नहीं, साहस की शिक्षा देनी होगी। हमें उन्हें यह विश्वास देना होगा कि उनका जीवन उनके अपने निर्णयों से संचालित होगा, न कि समाज की पुरानी सोच से। हमें उन्हें यह बताना होगा कि वे केवल “संस्कार” की वाहक नहीं, बल्कि परिवर्तन की वाहक भी हैं।
सोचिए, जिस दिन हर बेटी अपने सपनों के आकाश में बिना डर के उड़ सकेगी, जिस दिन उसे यह नहीं सोचना पड़ेगा कि “लोग क्या कहेंगे”, उसी दिन यह कहा जा सकेगा कि शक्ति सचमुच घर-घर उतरी है।
यह अवसर केवल एक तिथि नहीं है — यह एक संकल्प है। संकल्प कि हर बेटी को पढ़ाई का हक़ मिलेगा। संकल्प कि दहेज की प्रथा को हम जड़ से खत्म करेंगे। संकल्प कि हर बेटी को अपने करियर और विवाह का निर्णय खुद लेने का अधिकार होगा। संकल्प कि हम उन्हें डर नहीं, उड़ान देंगे।
सच्ची पूजा तभी है जब हम अपनी बेटियों के लिए ऐसा समाज बनाएँ जिसमें उन्हें खुद को साबित करने के लिए बार-बार संघर्ष न करना पड़े। जिस दिन हर बेटी बिना डर के अपने सपने पूरे कर सकेगी, उसी दिन शक्ति सचमुच घर-घर उतरेगी।
राष्ट्रीय बेटी दिवस हमें याद दिलाता है कि शक्ति किसी मंदिर में बंद नहीं, बल्कि हमारे आँगन में खेलती है। हमें उसे बचाना है, उसे पंख देना है, उसे उड़ान भरने देना है। अपने घरों में शक्ति का स्वागत करें —न केवल तस्वीरों और मूर्तियों में, बल्कि अपनी बेटियों की मुस्कान, उनकी शिक्षा, उनके आत्मविश्वास में। क्योंकि जब शक्ति सच में घर-घर उतरती है, तभी समाज प्रगति करता है।
(राष्ट्रीय बेटी दिवस पर विशेष)
