नीरज कृष्णा
पटना
Navratri : नवरात्रि का समय है। घर-घर में दीप जलते हैं, आरतियाँ गूँजती हैं, पंडालों में माँ दुर्गा सिंह पर आरूढ़ दिखाई देती हैं — अष्टभुजा, हर हाथ में एक शस्त्र। यह दृश्य केवल पूजा का नहीं, एक आह्वान का दृश्य है। पर हम इसे अक्सर केवल सजावट समझ लेते हैं।
दुर्गा की आठ भुजाएँ हमें कहती हैं — शक्ति केवल हाथ जोड़कर आशीर्वाद देने का नाम नहीं है, यह अन्याय को चुनौती देने का साहस है। आज की स्त्री को आठ हाथ नहीं चाहिए, लेकिन उसे आठ साहस चाहिए — अष्टसाहस — जो उसके भीतर की दुर्गा को जागृत कर सकें।
दुर्गा के हाथों में थामे हुए ये शस्त्र केवल लोहे-इस्पात के औजार नहीं, हमारे भीतर की आवाज़ हैं। त्रिशूल संकेत है — अपने भीतर के डर को भेद दो, सच कहो, आवाज़ उठाओ। चक्र घूमता है और कहता है — समय को अपने हाथ में लो, अपने फैसले खुद लो। गदा गरजती है — डर पर प्रहार करो, चुप्पी तोड़ो। तलवार चमकती है — उन रिश्तों को काट दो, जो तुम्हें तोड़ते हैं। धनुष-बाण तनते हैं — लक्ष्य साधो और विचलित मत हो। खड्ग फुसफुसाता है — पुरानी जंजीरों को तोड़ दो, जो तुम्हें पीछे बाँधती हैं। शंख गूँजता है — अपनी उपस्थिति की घोषणा करो, अपने होने पर गर्व करो। और कमल मुस्कुराता है — खुद से प्रेम करना मत भूलो, अपनी पवित्रता अपने भीतर बचाए रखो।
ये सब मिलकर हमें याद दिलाते हैं कि दुर्गा केवल मंदिर की मूर्ति नहीं, वह हमारे भीतर की जागृत शक्ति है। उसके आठ हाथ हमें आठ संदेश देते हैं — साहस, समय, प्रहार, मुक्ति, लक्ष्य, विद्रोह, घोषणा और प्रेम। नवरात्रि हमें यही सिखाती है कि जीवन की असली पूजा तब है, जब हम इन आठों संदेशों को अपने भीतर जगा लें और अपने जीवन के सिंह पर सवार हो जाएँ।
नवरात्रि का यह पर्व केवल भक्ति का नहीं, जागरण का पर्व है। देवी की आरती का अर्थ है अपने भीतर के इन आठ साहसों को जगाना। दुर्गा के सिंह पर आरूढ़ होने का अर्थ है — अपने जीवन की लगाम अपने हाथ में लेना।
हम हर साल महिषासुर का वध देखते हैं, लेकिन असली महिषासुर हमारे भीतर बैठा है — चुप्पी का, डर का, समझौते का। जिस दिन स्त्री अपने अष्टसाहस के साथ खड़ी होगी, उसी दिन यह महिषासुर मरेगा।
इस नवरात्रि, केवल प्रतिमा को सजाइए मत — अपने भीतर की दुर्गा को सजाइए। केवल आरती मत गाइए — अपने भीतर के भय को चीर दीजिए। केवल फूल मत चढ़ाइए — अपनी आवाज़ को हकीकत में बदल दीजिए।
………क्योंकि समाज को अष्टभुजा वाली देवी नहीं चाहिए, उसे अष्टसाहस वाली स्त्रियाँ चाहिए। वही समाज की सबसे बड़ी पूजा है।
