* वक्त की बिसात पर ‘चाणक्य’ भी मोहरा है…
Nitish Kumar : ”वक्त का हर शै गुलाम…” यह महज एक जुमला नहीं, बिहार की सत्ता के सबसे बड़े जादूगर रहे नीतीश कुमार की वर्तमान हकीकत है। जिस पाटलिपुत्र की धरती पर कभी नीतीश की मर्जी के बिना पत्ता नहीं खड़कता था, आज वहां पटकथा किसी और ने लिखी है। लोग इसे ‘इच्छा’ कह रहे हैं, लेकिन हकीकत में यह ‘समय का तकाजा’ है।
मोदी-शाह का ‘चेकमैट’: जब सिकंदर भी सरेंडर कर दे
कल तक जो नीतीश मंच साझा करने से कतराते थे, आज उन्हीं मोदी-शाह की जोड़ी ने उनके ‘एग्जिट प्लान’ पर मुहर लगा दी है। बिहार की सत्ता की ‘ड्राइविंग सीट’ अब आधिकारिक तौर पर भाजपा के पास है। यह एक ऐसे युग का अंत है जहाँ सीटें कम होने के बावजूद नीतीश का ‘स्टीयरिंग व्हील’ पर कब्जा रहता था। आज वक्त ने उन्हें किनारे कर राज्यसभा की राह दिखा दी है।
सुशासन बाबू से ‘कुर्सी कुमार’ तक का सफर
1985 का उदय: एक निर्दलीय विधायक से शुरू हुआ सफर, जिसने समाजवाद को नया चेहरा दिया।
रेलवे का कायाकल्प: अटल जी के दौर में रेल मंत्री के रूप में आधुनिक भारत की नींव रखी।
सुशासन का उदय: 2005 में बिहार को जंगलराज से निकाल ‘सुशासन बाबू’ की छवि बनाई।
पलटी मार सियासत: गठबंधन बदलते रहे, मुख्यमंत्री की कुर्सी वही रही। 10 बार शपथ लेकर रिकॉर्ड तो बनाया, लेकिन साख की कीमत पर।
विरासत का संकट: क्या ‘निशांत’ थाम पाएंगे कमान?
नीतीश ने अपनी छाया में कभी दूसरा बरगद पनपने नहीं दिया। अब जब वे जा रहे हैं, तो जेडीयू (JDU) अनाथ खड़ी है। चर्चा है बेटे निशांत कुमार की, जिनका मन अध्यात्म में रमता है, सियासत में नहीं। क्या एकांत पसंद निशांत, राजनीति के इस कुरुक्षेत्र में टिक पाएंगे? या जेडीयू धीरे-धीरे भाजपा की परछाई बनकर रह जाएगी?
