अमरेंद्र किशोर
Nitish Kumar : नई दिल्ली : अब नीतीश कुमार वर्तमान से पूर्व हो चुके हैं। बदलते दौर में पूर्व होना असामान्य नहीं, लेकिन बिहार के लिए यह क्षण कई सवाल छोड़ जाता है। आज सत्ता परिवर्तन के दौर से गुजरता यह राज्य बदलाव में कम, विस्मय में ज्यादा नजर आता है। वही सत्ता शैली, वही राजनीतिक दर्शन, जिसे कभी चुनौती नहीं मिली और जिसे सामाजिक न्याय के नाम पर आदर्श माना गया, वही भगवा राजनीति का रंग आज हासिल जनादेश को दबोच कर मजाक में बदलती दिख रही है।
भाजपा की सत्ता में मचाई गई अराजकता, गठबंधन की अधूरी रणनीति और जनता के विश्वास के साथ किए गए खिलवाड़ ने राज्य की राजनीति को अस्थिरता की ओर धकेल दिया है। फिर भी, इन सब परिस्थितियों के बीच नीतीश कुमार की विदाई सोचने पर मजबूर करती है और यह स्पष्ट करती है कि उनके बिना बिहार की राजनीति अब पहले जैसी स्थिरता, पहचान और सामाजिक संतुलन नहीं पा रही है।
नीतीश का होना बिहार के आत्मसम्मान और विकास का प्रतीक था; उनका नहीं होना यह संकेत देता है कि अब राज्य को अपने भविष्य, अपनी दिशा और अपने मूल्यों के लिए खुद निर्णय लेना होगा।
बिहार में पिछले बीस सालों का राजनीतिक परिदृश्य नीतीश कुमार के नाम से जुड़ा रहा। उनका व्यक्तित्व, उनकी निर्णय प्रक्रिया और उनकी शैली राज्य की पहचान के साथ इतने गहरे जुड़ गए थे कि कई लोग कह सकते थे—नीतीश के बिना बिहार का चेहरा अधूरा है।
आंदोलन की उपज के रूप में उभरे नीतीश, लालू यादव के राजनीतिक मॉडल से पूरी तरह अलग थे। लालू का राजनीति जनता की भावनाओं और गठबंधन पर आधारित थी, वहीं नीतीश ने स्पष्ट, ठोस और दूरदर्शी विकल्प अपनाए। बिहार के राजनीतिक इतिहास में उनकी यह अलग राह कई बार विवाद और आलोचना की वजह भी बनी, लेकिन यह अलग राह ही थी जिसने राज्य की पहचान को मजाक और उपहास से सम्मान और आत्मसम्मान की ओर मोड़ा।
नीतीश कुमार की उपलब्धियों की लंबी सूची है। शिक्षा सुधार, सड़क और बुनियादी ढांचे का विकास, बिजली और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार, महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में ठोस पहल, भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कदम—ये सब उन्होंने राजनीतिक साहस और दूरदर्शिता के साथ किए। इन सुधारों ने बिहार को सिर्फ प्रशासनिक दृष्टि से नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय पहचान की दृष्टि से नई दिशा दी।
लेकिन हर कहानी में छिपे पहलू, हर उपलब्धि के पीछे कुछ कड़वाहट और चुनौती भी होती है। नीतीश के मामले में यह सच है कि उनकी राजनीति हमेशा पूरी तरह पारदर्शी और स्थिर नहीं रही। कई बार उन्होंने सत्ता में बने रहने के लिए समझौते किए। गठबंधन की राजनीति में उनका व्यवहार कभी-कभी बदलता रहा। जदयू की बढ़ती शक्ति, राष्ट्रीय गठबंधन के दबाव और राज्य में बने रहने की आवश्यकता ने उन्हें बार-बार राजनीतिक समझौते करने के लिए मजबूर किया। नीतीश ने कई बार अपने फैसले पलटे, कई बार विरोधियों के साथ तालमेल बनाया और कभी-कभी अपने समर्थकों की उम्मीदों के विपरीत कदम उठाए। यह परिवर्तनशीलता, कई लोगों ने, उन्हें अविश्वसनीय बना दिया।
शराबबंदी इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। इसे लागू करने में महिलाओं और समाज से व्यापक समर्थन मिला, लेकिन इसके आर्थिक और सामाजिक प्रभाव भी थे। रोजगार और स्थानीय उद्योग प्रभावित हुए, और इस कदम ने कई विरोधाभास भी उजागर किए। यह कदम बताते हैं कि नीतीश का कड़ा होना और फैसले लेने की शैली केवल लोकप्रियता या चुनावी रणनीति के लिए नहीं, बल्कि समाज में स्थिरता और अनुशासन बनाए रखने की दृष्टि से थी।
नीतीश की मजबूरियाँ राजनीतिक तंत्र की वास्तविकताओं से जुड़ी थीं। बिहार के बदहाली और पिछड़ेपन की स्थिति में उन्हें न केवल सत्ता में बने रहना था, बल्कि राज्य को विकास की राह पर खड़ा करना भी था। राष्ट्रीय राजनीति में जाल बुनने वाली भाजपा जैसी ताकतों के साथ तालमेल बनाने की मजबूरी ने उन्हें कई बार समझौते और गठबंधन करने पर मजबूर किया। सत्ता में बने रहना उनकी मजबूरी थी—बिहार को बदहाली से निकालने और राज्य की पहचान बनाए रखने के लिए।
नीतीश के राजनीतिक जीवन में समझौता आबादी की समस्या भी स्पष्ट थी। जदयू के भीतर, सहयोगी दलों और विरोधियों के बीच लगातार संतुलन बनाए रखना, कई बार उनके कदमों को बदलने का कारण बना। उनके समर्थक कई बार निराश हुए, आलोचकों ने उन्हें अविश्वसनीय ठहराया, लेकिन राजनीतिक यथार्थ ने उन्हें बार-बार नई रणनीति अपनाने पर मजबूर किया। यह बदलाव दिखाता है कि नेतृत्व केवल स्पष्ट निर्णय लेने का नाम नहीं, बल्कि परिस्थितियों और मजबूरियों का संतुलन भी होता है।
उनकी पहचान केवल सत्ता के पद पर बने रहने तक सीमित नहीं थी। नीतीश ने बिहार की आत्मसम्मान और पहचान के लिए कई लड़ाइयाँ लड़ी। शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार, सड़क और पुलों का विकास, महिलाओं के अधिकारों की दिशा में कदम—इन सबके माध्यम से उन्होंने राज्य की मूलभूत पहचान को मजाक से सम्मान की ओर मोड़ा। उनका आंदोलन, उनकी दूरदर्शिता और उनके साहस ने बिहार को वह आत्मविश्वास दिया जो पहले कभी नहीं था।
लेकिन उनके कार्यकाल में कुछ कमियाँ भी उजागर हुईं। कभी-कभी निर्णय कठोर और विवादास्पद रहे, कई योजनाओं में प्रशासनिक और आर्थिक सीमाएं सामने आईं, और सत्ता में बने रहने के लिए किए गए समझौते उनके प्रति जनता की अविश्वास भावना को बढ़ाते रहे। इन कमजोरियों के बावजूद, उनके नेतृत्व ने राज्य को स्थिरता, पहचान और विकास की दिशा दी।
अब, जब नीतीश कुमार राष्ट्रीय राजनीति में चले गए हैं और राज्यसभा की सीट लेकर केंद्र की राजनीति में शामिल हैं, बिहार एक नए नेतृत्व और नई चुनौती के दौर में प्रवेश कर रहा है। उनके बिना राज्य की राह कई अनसुलझे सवाल छोड़ती है। क्या नया नेतृत्व उनके पदचिह्नों की गहराई को समझ पाएगा? क्या बिहार की पहचान, जिसे नीतीश ने मजबूती से बनाया, अब भी उसी दिशा में आगे बढ़ पाएगी?
नीतीश का होना बिहार का होना था। उनका जाना, उनके कार्य, उनके फैसले और उनके संघर्ष हमेशा याद रहेंगे। शराबबंदी, सड़क और पुल, शिक्षा और स्वास्थ्य सुधार, भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई और महिलाओं के सशक्तिकरण की पहल—इन सबकी वजह से उनका योगदान अजर-अमर रहेगा। उनके कमजोर कदम, समझौते और पलटाव भी याद रहेंगे, क्योंकि इन्हीं कमजोरियों ने उन्हें एक मानव और नेता दोनों के रूप में दिखाया।
नीतीश के कार्यकाल ने बिहार को दिखाया कि नेतृत्व केवल सत्ता में बने रहने का नाम नहीं, बल्कि मजबूरियों, यथार्थ और समाज के संतुलन का नाम भी है। उनके बिना बिहार अब नए सवालों, नई चुनौतियों और नए नेतृत्व के सामने खड़ा है। उनका होना बिहार के आत्मसम्मान का प्रतीक था; उनका नहीं होना यह संकेत देता है कि अब राज्य को अपने भविष्य, अपनी पहचान और अपने विकास की दिशा स्वयं तय करनी होगी।
नीतीश कुमार की राजनीति, उनके कार्य, उनकी उपलब्धियाँ, उनकी कमजोरियाँ और उनके संघर्ष—ये सब बिहार के इतिहास का हिस्सा हैं।
उनके आने और जाने से यह स्पष्ट होता है कि बिहार की राजनीति में स्थिरता, पहचान और विकास केवल नेताओं के व्यक्तित्व से नहीं, बल्कि उनके फैसलों, मजबूरियों और दूरदर्शिता से जुड़ी होती है। उनके जाने के बाद राज्य की नई राह में यह सवाल हमेशा बना रहेगा कि क्या बिहार वही पहचान, वही आत्मसम्मान और वही विकास की गति बनाए रख पाएगा, जो नीतीश कुमार ने पिछले बीस सालों में तय की थी।
