Rahul Gandhi : क्रिकेट का चीफ और राजनीति का प्रिंस: एक जैसा

Bindash Bol

वीरेंद्र राय

Rahul Gandhi : ‘योगदान’….राहुल गांधी का तंज वाकई निशाने पर था “अमित शाह के बेटे को क्रिकेट बैट पकड़ना नहीं आता, रन लेना तो छोड़ो, मगर है वो क्रिकेट का चीफ।”
सही कहा। अगर जय शाह अमित शाह के बेटे नहीं होते, तो शायद अहमदाबाद की किसी गलियों में ट्रेडिंग कंपनी चला रहे होते या मुंबई के किसी क्लब में मेंबरशिप के लिए फॉर्म भर रहे होते। मगर कहानी यहीं खत्म नहीं होती। सवाल पलटकर पूछने का मन करता है कि अगर राहुल गांधी राजीव गांधी के बेटे नहीं होते तो क्या वे आज भी राजनीति के “प्रिंस” बने बैठे होते?
तीन-तीन लोकसभा चुनाव हारने के बाद भी पार्टी के सर्वेसर्वा हैं, जबकि उनसे ज़्यादा काबिल, ज़मीन से जुड़े और संघर्षशील नेता उनकी जीहजूरी में व्यस्त हैं।
कांग्रेस का दुर्भाग्य यही है कि यह अब विचारधारा से ज़्यादा “इमेज मेकओवर” का प्रोजेक्ट बन गई है।
एनजीओ और पीआर एजेंसियों के सहारे पार्टी “गांव” में नहीं, “ग्राफिक” में काम करती है।
राहुल गांधी की राजनीति अब कैमरे की फ्रेमिंग से तय होती है। कभी किसी किसान के खेत में कैमरे के साथ उतर जाते हैं। कभी ट्रक ड्राइवर के साथ रात बिताते हैं, तो कभी गरीब के घर में दो निवाले खाकर “जनता का आदमी” बनने की कोशिश करते हैं। पर जनता फोटोशूट नहीं, फाइटशूट देखती है। उसे नेता चाहिए, जो ज़मीन पर लड़े, न कि मौसम देखकर सियासत में उतरने वाला “सीज़नल पॉलिटिशियन”।
राहुल का कहना है कि वोट चोरी हुई। जरा सोचिए, अगर कोई सचमुच वोट चुरा सकता है, तो क्या वो “मोदी 400 पार” के बावजूद बहुमत से वंचित रह जाता? असलियत ये है कि भाजपा का ग्राफ़ अब नीचे गिर रहा है। क्योंकि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती।
लेकिन राहुल गांधी की “परिपक्वता” का स्तर अब इतना बढ़ गया है कि सत्ता पाने की भूख में वे सेना तक में आरक्षण का शिगूफ़ा छोड़ देते हैं।
कांग्रेस की सच्चाई आज यह है कि उसका असली वजूद बस कुछ राज्यों तक सिमट गया है, मध्यप्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, केरल, हिमाचल और असम। बाकी जगह क्षेत्रीय दल ही अपने-अपने किलों की रखवाली कर रहे हैं।
ताजा उदाहरण से समझाता हूं… अभी केंद्र शासित प्रदेश दादरा नगर हवेली और दमण-दीव में स्थानीय निकायों के चुनाव हुए। लेकिन स्थानीय प्रशासन ने तानाशाही रवैया अपनाते हुए 85% सीटें भाजपा को निर्विरोध जीतवा दीं। यह सत्य है तानाशाही भी। लेकिन, इससे भी बड़ा सत्य यह है कि यहां कांग्रेस है भी नहीं। लेकिन, बैठा कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व इससे अनजान बना हुआ है। यहां पांच साल से ज्यादा समय से कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष ही नहीं है। न अल्पसंख्यक मोर्चा है, न युवा मोर्चा है। न महिला विंग। अब अंदाजा लगा लीजिए कि कांग्रेस यहां चुनाव भी लड़ जाती तो चुनाव कैसे जीतती। दमण-दीव में तो कांग्रेस ने टिकट ही नहीं दिया। सूरत लोकसभा का चुनाव याद है। वैसा ही हाल है… बाद में आप कहते रहिए कि वोट चोरी हो गया… असलियत यह है कि जब संगठन ही नदारद हो, तो “वोट चोरी” का शोर सिर्फ खोखला लगता है।
सच्चाई यही है कि कांग्रेस अब जनता से ज़्यादा जुमलों और जवाबों में जी रही है। बाद में जब हार हो जाए, तो फिर वही पुराना राग “वोट चोरी हो गई”…दरअसल, हार की जिम्मेदारी लेने का साहस इस पार्टी में अब किसी के पास नहीं बचा… ना राहुल में, ना उनके चारों ओर घूमते कैमरों में और ना ही चमचों में…

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