Rahul Gandhi : न्यूटन जैसा सवाल—राहुल गांधी ने चुनावी जांच के लिए सेंट्रल बेंगलूर के बजाए रायबरेली को क्यों नहीं चुना

Bindash Bol

मुकेश कौशिक

Rahul Gandhi : सेब पेड से टूटकर धरती पर क्यों गिरता है, इस तरह का न्यूटन टाइप सवाल जेहन में आया है। सवाल यह है कि राहुल गांधी ने बेंगलूर सेंट्रल की संसदीय सीट को इस तहकीकात के लिए क्यों चुना; इसके लिए उन्हें रायबरेली या वायनाड की सीट का ख्याल क्यों नहीं आया। सेब पेड से टूट कर धरती पर नहीं गिरेगा तो और कहां जाएगा, यह सहज जवाब है। लेकिन न्यूटन की दिमागी खुराफात इस संदर्भ में लागू की जाए तो असलियत समझ आ जाएगी। कांग्रेस ने रायबरेली या वायनाड को इस लिए नहीं चुना कि ये सीटें राहुल गांधी ने जीती थीं। जो सीट उन्होंने जीती हैं, वहां चुनाव आयोग या भाजपा कैसे वोट चोरी कर सकता है। या उन 99 सीटों पर वोट चोरी कैसे हो सकती है जहां 2024 के चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार जीते। या फिर उन बाकी 135 सीटों पर आयोग मतदाताओं का फर्जीवाडा कैसे कर सकता है जहां भाजपा या उसके सहयोगी दलों के विरोधी प्रत्याशियों की जीत हुई। वोट चोरी की संभावना तो उन सीटों पर ही है जहां कांग्रेस या उसके सहयोगी दलों के उम्मीदवार नहीं जीत पाए। जाहिर है चुनाव आयोग कम से कम 234 सीटों पर ईमानदारी से चुनाव कराने में सफल रहा और बाकी जो सीटें एनडीए के उम्मीदवारों ने जीतीं उनमें से ज्यादातर में वोटों की हेराफेरी, फर्जीवाडा, नकली मतदाता सूची जैसी हरकतें हुईं।

दूसरा बडा सवाल यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगर 25 सीटों की हेराफेरी से इस पद पर हैं तो इसी चुनाव प्रक्रिया के बदौलत ही तो राहुल गांधी भी विपक्ष के नेता हैं। देश की संसद में उनकी आवाज भी तो इसी चुनावी जीत के बल पर बुलंद होती है। ​

तीसरा बडा सवाल यह है कि महाराष्ट्र में 2024 के लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार 30 सीटें जीतने में कैसे कामयाब हो गए। उन्हें और चुनाव आयोग को यह ख्याल पहले क्यों नहीं आया कि वोट अगर बढा दिए जाएं तो भाजपा गठबंधन को 48 में से ज्यादातर सीटें मिल जाएंगी। सीटें हारने के बाद यह सबक क्यों आया। जो कथि​त फर्जीवाडा आयोग से मिलकर भाजपा ने 40 लाख वोट बढाकर बाद में किया वह पहले कर लिया होता तो तेलुगू देशम के चंद्रबाबू नायडू या जनता दल यू के नीतीश कुमार के सामने तो न गिडगिडाना पडता। चार सौ पार नहीं तो 300 पार तो कर ही लेते।

चौथा सवाल, जिस राजस्थान में भाजपा ने विधानसभा चुनाव में जीत हासिल कर सरकार बनाई और जहां 2014और 2019 के चुनाव में यह पार्टी सारी की सारी 25 सीटें जीत रही थी, वहां कुछ ही महीने बाद हुए लोकभा चुनाव में भाजपा 11 सीटें कैसे हार गई। उत्तर प्रदेश में उसे 33 सीटें गंवाने की मूर्खता करने की क्या आवश्यकता थी जबकि वह बाकी जगह मतदाता घटा या बढाकर जीत हासिल कर सकती थी।

पांचवा सवाल, ऐसा क्यों हो रहा है कि भाजपा पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु या केरल जैसे राज्यों में मतदाता घटा या बढाकर इन क्षेत्रीय दलों को टक्कर नहीं दे पा रही है। चुनाव आयोग तो वहां भी यही है। फिर इन राज्यों में भाजपा विपक्षी दलों के साथ उदारता क्यों बरत रही है। या मान लिया जाए कि इन राज्यों में या उन सीटों पर जहां विपक्षी दल जीतते हैं, ईमानदारी से चुनाव सिर्फ वहीं हो रहा है, बाकी जगह वोट चोरी हो रही है।

छठी बात यह कि क्या अब यह मान लिया जाए कि ईवीएम में गडबडी की धारणाएं सच नहीं हैं, अगर कोई गडबडी गुंजाइश है तो वह मतदाता सूचियों में है। इसे दुरुस्त कर दिया तो चुनाव का शुद्धिकरण बहुत हद तक हो जाएगा।

सातवां और आखिरी सवाल, अगर चुनाव आयोग की मिलीभगत से व्यापक पैमाने पर वोट चोरी हो रही है, यानी मैच का अंपायर ही प्रतिद्वंद्वी टीम से खुलकर मिल चुका है तो ऐसे मैच में उतरने का औचित्य क्या है। अगर मैच हारने की पहले से गारंटी है तो उस मैच को खेलकर प्रतिद्वंद्वी की जीत को वैधता क्यों दी जाए। उसे यह कहने लायक क्यों रखा जाए कि वह मैच खेलकर जीता है।

इन सारे सवालों का मतलब यह कतई नहीं है कि राहुल गांधी ने जो सवाल उठाए, वोट चोरी के आरोप लगाए वे सरासर गलत हैं या उनमें कोई सच्चाई नहीं है। गेंद आयोग और जनता के पाले में है. बुनियादी सवाल पूरी चुनाव प्रक्रिया के अवैध हो जाने का है। अगर हमने मान लिया कि सरकारी वोट चोरी से बनी है तो लोकतंत्र पर भरोसे का क्या होगा। चुनाव में एक आम नागरिक कतार में क्यों लगेगा। कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, झारखंड, हिमाचल प्रदेश या जम्मू कश्मीर में चल रही सरकारें ईमानदारी से चुनी गईं मान ली जाएंगी और जहां जहां भाजपा सत्ता में है, वे सरकारें चोरी के वोटों से गठित मान ली जाएंगी।

चुनाव में गडबडियां तब से होती आ रही हैं जब से चुनाव होते आ रहे हैं। बैलेट से होते तब भी थीं और अब मशीन से होते हैं तब हैं। आरोप हमेशा लगे हैं। समाधान और शुद्धिकरण के प्रयास हमेशा हुए हैं। लेकिन पूरी प्रक्रिया को पूरी तरह करप्ट मान लेने का सबसे खतरनाक परिणाम यह होगा कि लोगों का लोकतंत्र से विश्वास उठ जाएगा। इमरजेंसी की जकडन के बीच इसी देश के विपक्ष ने इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड फेंका था और रक्तहीन क्रांति की थी। फिर मिलीजुली सरकारों का दौर भी चला। छह साल चली अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को सोनिया गांधी की अगुवाई में कांग्रेस ने उखाड दिया। दस साल मनमोहन सिंह सरकार इसी चुनाव प्रक्रिया के जनादेश से चली। वह सरकार भी नरेंद्र मोदी की अगुवाई में किनारे कर दी गई। क्या मान लें कि इसके बाद खेल के सारे नियम बदल गए। अंपायर करप्ट हो गए। चुनाव प्रक्रिया भ्रष्ट हो गई।

डिसक्लेमर: ये सारे सवाल इस लिए उठाए गए हैं ताकि मतदाताओं का लोकतंत्र से विश्वास न उठ जाए।

Share This Article
Leave a Comment