Rahul Gandhi : हिंदी के लिख्खाड़ और प्रबुद्ध भेड़ चाल में मस्त हैं

Bindash Bol
  • राहुल के कोरस में शामिल देश का लिबरल ब्रिगेड, एक सभ्य समाज की अभद्रताएं और अश्लीलताएं

उमानाथ लाल दास
Rahul Gandhi : युवराज के पास भाषा नहीं बची, उनकी बहन और मां का रास्ता भी यही है। संवैधानिक पदों पर जनतांत्रिक तरीके से चुने गए माननीयों के लिए इज्जत तो क्या, एक भद्र भाषा तक नहीं बची, उसे कोई हक नहीं कि वह अपने बाप, दादी और दादी के बाप की करतूतों को डिफेंड करें ,,, बाप के नाना ने लेडी माउंटबेटन संग रंगरेलियां मनायीं, कांग्रेस के प्रांतीय परिषद के नकारे जाने के बावजूद पीएम बने, बंगाल के दंगाई मुख्यमंत्री अली सुहरावर्दी को आजाद भारत में संरक्षण तब तक दिया तक कि वह पाकिस्तान नहीं भागा (क्वात्रोची को भी इसी तरह बचाकर भागने का मौका दिया गया), बाबासाहेब की फजीहत की (चुनाव में), बाप की दादी ने देश के इतिहास का काला अध्याय लिखा, धर्मांतरण की तरह संविधान की आत्मा (प्रस्तावना) का धर्मांतरण तक कर डाला, देश के इतिहास का सर्वाधिक साहसी और बलिदानी कौम सिख को आतंकवादी खालिस्तानी बना दिया, बोफोर्स व पनडुब्बी सौदा घोटाला, पड़ोसी श्रीलंका के सिविल वार में भारत को सक्रिय भागीदार बना दिया, पत्नी सोनिया के भारतीय नागरिक बनने से पहले वोटर बना डाला, खुद सोनिया के लिए विदेशी नागरिकता का सवाल इतना भारी पड़ा कि कांग्रेस दो खेमों में बंटकर दो फाड़ हो गयी, समन्वय समिति का प्रमुख बनकर सोनिया गांधी प्रोटोकॉल में पीएम को लांघ जाती थी, खुद युवराज ने पीएम मनमोहन सिंह के सामने अध्यादेश फाड़ डाले, किसानों के मामले या सीएए का मामला हो, बाबरी मस्जिद का मामला हो या कश्मीर के 370 का मुद्दा हो, ट्रिपल तलाक हो या वक्फ का मामला, या अभी बिहार का एसआईआर हो, लगभग सभी राष्ट्रीय मामलों में अराजकता को हवा देने से बाज नहीं आ रहे, विदेशों में जाकर देश की छवि को तार-तार करने में कोई कसर कभी नहीं छोड़ते ,,,

इतने के बावजूद हिंदी के लिक्खाड़ और लिबरल को इस युवराज में संभावनाएं दिखती हैं। इसके बावजूद उन्हें अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में दिखती है, इसके बावजूद उन्हें लोकतंत्र ख़तरे में दिखता है। विष्णु नागर और अनिल जनविजय की भाषा देखिए। हिंदी में उनकी प्रतिष्ठा तब भी है जब उनकी भाषा एक औसत आदमी से भी नीचे चली गई है। रवीश कुमार, उर्मिलेश, अभिसार शर्मा, दीपक शर्मा, नवीन कुमार, वामन मेश्राम, रतन लाल, लक्ष्मण यादव, स्वामी प्रसाद मौर्य, अनुराग भदौरिया, कन्हैया कुमार, विवेक श्रीवास्तव आदि-आदि में किनको कोर्ट नोटिस हुआ है, किनको हिरासत में लिया गया, किनकी गिरफ्तारी हुई है, किनकी माब लिंचिंग हुई है? फिर भी एक तोता रटंत है अभिव्यक्ति खतरे में और लोकतंत्र असुरक्षित ,,, संवैधानिक मर्यादाओं (भाग तीन/मौलिक अधिकार) को तार-तार करने वाले को यह हक नहीं है बोलने का। भद्रता के लिए जाना जाने वाले लेखक-कवि-कलाकार समुदाय के मुट्ठी भर लोगों ने पाठक समाज की भाषा और संस्कार बिगाड़ने का ठेका ले रखा है। जनतंत्र के पहरेदार और चौथे स्तंभ के इनफ्लुएंसर यूट्यूबर और कुछ नामचीन पत्रकार समाचार जगत में कांग्रेस की दलाली करके कौन आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं। लिबरल बौद्धिक विमर्श के नाम पर संविधान का काला अध्याय लिखने वाली कांग्रेस और देश में वोट चोरी की नींव डालने वाले नेहरू को भूलकर सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस का एजेंट बनकर काम करने वालों को और कौन सी आजादी चाहिए ,,, योगेन्द्र नाथ मंडल, अली सुहरावर्दी वाली आजादी तो आप भोग ही रहे हैं ,,,

दरअसल लिबरल जत्था जार्ज सोरोस और यूएस एड्स के यज्ञ से लहालोट है तो दूसरी तरफ देशी फाउंडेशन और ट्रस्ट ने एजेंडा धारी लिख्खाड़ पोस-पालकर रखे हुए हैं। कभी किसी पत्रिका को बंद करवाने की जुगत लगायी जाती है तो कभी फेलोशिप में स्कैंडल रचा जाता है लेखक को घेरने के लिए। कुछ तो शिकार हो भी जाते हैं और कुछ जेहादी किस्म के निर्भय बचे रहते हैं।

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