Republic Day : भारत के संविधान की उद्देशिका है यह उद्घोषित करती है....
Republic Day : भारत के संविधान की उद्देशिका है यह उद्घोषित करती है…
हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी, पन्थ-निरपेक्ष, लोकतन्त्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा समस्त नागरिकों को;
सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय,
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म
और उपासना के स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की की समता
प्राप्त करने के लिए
था उन सब में व्यक्ति की गरिमा और
राष्ट्र की एकता और अखंडता
सुनिश्चित करने वाली बन्धुता को बढ़ाने के लिए
दृढ़संकल्प होकर इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी को एतत्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और अतात्मर्पित करते
हैं.
यद्यपि हमने भारत को लोकतंत्रात्म्क गणराज्य बनाने के लिए भारतीय संधान को 26 नवम्बर, 1949 को आत्मार्पित किया, यह लागू हुआ 26 जनवारी, 1950 को. तब से हम 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाती हैं. यह हमारा मुख्य राष्ट्रीय पर्व है. इस वर्ष हम 76 वाँ दिवस मना रहे हैं जिसकी पूर्व संध्या पर यह काव्यगोष्ठी आयोजित की गई है .
न्यायालयों के गलियारे में भारत के संविधान के रखवाले और नागरिकों के अधिकारों की पैरवी करने वाले प्रख्यात वकील और न्यायविद् नानी पालकीवाला का भारत के संविधान एवं इसकी उद्देशिका के विषय में यह कहना है-“Constitution is not a jellyfish; it is a highly evolved organism. It has identity and intergrity of its own, the evocative Preamble being its identity card.” उन्होंने भारत के संविधान को अत्यंत ‘विकसित जीव’ और इसकी उद्देशिका को इसका ‘परिचय पत्र’ कहा। पालकीवाला की इस उक्ति का आशय क्या है, यह समझने के लिए इस ‘विकसित जीव’ यानी भारतीय संविधान के विकासक्रम से अवगत होना सुसंगत प्रतीत होता है।
आइए, एक नजर डालते हैं भारत के संविधान के निर्माण की कहानी पर। भारतीय जनता ने स्वतंत्रता के लिए ब्रिटिश शासन के विरुद्ध क्रांति का शंखनाद तो 1857 में ही कर दिया था। यद्यपि ब्रिटिश शासन ने 1857 के विद्रोह को दबा दिया था; स्वतंत्रता प्राप्त करने का संघर्ष हिंसक और अहिंसक क्रांति के रूप में परिणत होता गया। सन् 1920 में नागपुर के कांग्रेस अधिवेशन में शांतिपूर्ण ढंग से ‘स्वराज्य’ प्राप्त करने के उद्देश्य की घोषणा की गई। महात्मा गाँधी ने 1922 में यह मांग की कि भारत का राजनैतिक भाग्य भारतीय स्वयं बनायेंगे। उन्होंने कहा था-“स्वराज ब्रिटिश पार्लियामेंट की भिक्षा नहीं होगी, यह भारत की स्वयं की गई घोषणा होगी। यह सत्य है कि इसे पार्लियामेंट के ऐक्ट के तहत अभिव्यक्त किया जाएगा किन्तु यह भारत के लोगों की इच्छा की घोषणा का विनम्र अनुमोदन मात्र होगा जैसा कि दक्षिण अफ्रीका के संघ के मामले में किया गया था।” आगे चलकर सन् 1929 में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में संपन्न लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में ‘पूर्ण स्वराज’ का प्रस्ताव पारित किया गया और पहली बार स्वतंत्रता का झंडा फहराया गया। उसके बाद कांग्रेस की कार्यसमिति द्वारा सारे देश की जनता का आह्वान किया गया कि 26 जनवरी, 1930 का दिन ‘स्वराज दिवस’ के रूप में मनाया जाए और उस दिन सारे देश के नर-नारी स्वतंत्रता की शपथ लें और राष्ट्रीय झंडे का अभिवादन करें। पूर्ण स्वतंत्रता का लक्ष्य निश्चित के बाद 17 और 18 जून, 1934 को मुंबई में संपन्न कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में भारत में राजनैतिक सुधार करने तथा वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित भारतीय प्रतिनिधियों की एक संविधान सभा के गठन की मांग करने का निर्णय लिया गया। इसके द्वारा प्रथम बार कांग्रेस द्वारा भारतीय जनता का अपना संविधान, बिना बाहरी हस्तक्षेप के, स्वयं बनाने का निर्णय लिया गया। सन् 1934 में कांग्रेस की कार्यसमिति द्वारा पारित ‘जन प्रतिनिधियों की संविधान सभा’ के गठन के प्रस्ताव के थोड़े समय बाद ब्रिटिश संसद ने भारत के शासन हेतु गवर्नमेंट ऑफ इन्डिया ऐक्ट, 1935 पारित कर दिया। इस अधिनियम द्वारा एक परिसंघीय संविधान की कल्पना की गई। इसके द्वारा भारत की एकात्मक राज्य व्यवस्था को परिसंघात्मक राज्य व्यवस्था में परिणत कर दिया गया। प्रान्तों को पूर्ण प्रांतीय स्वायत्तता प्रदान की गई किन्तु साथ ही गवर्नर और गवर्नर जनरल को बहुत ही व्यापक अधिकार दिये गए थे ताकि जनता के प्रतिनिधि कई मुख्य एवं महत्वपूर्ण क्षेत्रों में रूचि न ले सकें। निर्वाचन क्षेत्रों का बंटवारा जाति और धर्म के आधार पर कर दिया गया। यद्यपि इस अधिनियम में भारतीयों को स्व-सरकार बनाने का अधिकार दिया गया था, परन्तु यह मात्र अधिकार स्वरूप ही था, इसमें संविधानवाद की झलक नहीं थी क्योंकि इसका एकमात्र उद्देश्य अंतिमतः ब्रिटिश शासन कायम रखना ही था। भारतीय जनता को यह ऐक्ट स्वीकार्य नहीं हुआ क्योंकि यह उस जनता का बनाया हुआ संविधान न होकर ब्रिटिश सत्ता द्वारा अपना शासन बनाये रखने के लिए उसपर थोपा गया अधिनियम था। सन् 1936 में फैजपुर में हुए कांग्रेस अधिवेशन में भी इस अधिनियम का प्रबल विरोध किया गया और यह मांग दुहरायी गई कि यह सभा जनता द्वारा चुनी जाने वाली एकमात्र उसीका प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था होगी।
सन् 1936 के फैजपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने प्रांतीय विधान सभाओं के लिए होने वाले चुनाव में भाग लेने का और स्वतंत्र भारत का संविधान-निर्माण का निर्णय लिया। प्रांतीय विधान सभाओं के चुनाओं में कांग्रेस को शानदार सफलता मिली।चुनाव के बाद कांग्रेस ने एक सम्मेलन बुलाया जिसमें 1935 के अधिनियम को निरस्त करने तथा भारत की जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा अपना संविधान बनाने की ‘राष्ट्रीय मांग’ का प्रस्ताव पारित किया गया। सन् 1938 में जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा की मांग को स्पष्ट रूप से रखते हुए यह कहा-“कांग्रेस स्वतंत्र और लोकतंत्रात्मक राज्य का समर्थन करती है। उसने यह प्रस्ताव किया है कि स्वतंत्र भारत का संविधान बिना बाहरी हस्तक्षेप के ऐसी संविधान सभा द्वारा बनाया जाना चाहिए जो वयस्क मतदान के आधार पर निर्वाचित हो।” इसी बात को कांग्रेस की भारत के कार्यसमिति ने 1939 फिर कहा।
ब्रिटिश सरकार ने द्वितीय विश्व युद्ध आरम्भ होने तक इस मांग का विरोध किया। विश्व युद्ध आरम्भ हो जाने पर बाहरी परिस्थितियों के कारण उन्हें यह स्वीकार करने के लिए बाध्य होना पड़ा कि भारतीय सांविधानिक समस्य का हल निकालना अत्यंत आवश्यक है और 1940 में इंगलैंड की बहुदलीय सरकार ने इस सिद्धांत को स्वीकार किया कि भारत के लिए नया संविधान भारत के लोग ही बनायेंगे। तब उन्होंने सर स्टेफर्ड क्रिप्स को, जो मंत्रिमंडल के एक सदस्य थे, ब्रिटिश सरकार के प्रस्तावों की घोषणा के प्रारूप के साथ भारत भेजा। क्रिप्स की यह यात्रा ‘क्रिप्स मिशन’ के नाम से प्रसिद्ध है। ये प्रस्ताव युद्ध की सामप्ति पर अंगीकार किये जाने वाले थे यदि उस समय के दो प्रमुख राजनैतिक दल ,कांग्रेस और मुस्लिम लीग, उन्हें स्वीकार करने के लिए सहमत हो जाएँ। मुख्य प्रस्ताव इस प्रकार थे-
(क) भारत के संविधान की रचना भारत के लोगों द्वारा निर्वाचित संविधान सभा करेगी,
(ख) संविधान भारत को डोमिनियन प्रास्थिति और ब्रिटिश राष्ट्रकुल में बराबर की भागीदारी देगा,
(ग) सभी प्रान्तों और देशी रियासतों को मिलाकर एक संघ बनेगा, किन्तु कोई प्रान्त (या देशी रियासत) जो संविधान को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हो तो तत्समय विद्यमान अपनी सांविधानिक स्थिति बनाये रखने के लिए स्वतंत्र होगा और इस प्रकार सम्मिलित न होने वाले प्रान्तों के लिए ब्रिटिश सरकार पृथक् सांविधानिक व्यवस्था कर सकेगी।
किन्तु दोनों राजनैतिक दल इन प्रस्तावों को स्वीकार करने के लिए सहमत नहीं हुए। मुस्लिम लीग ने इस बात पर बल दिया, –
(क) कि भारत को साम्प्रदायिक आधार पर दो स्वतंत्र राज्यों में विभाजित किया जाय और श्री जिन्ना द्वारा बताये गए कुछ प्रान्तों को मिलाकर एक स्वतंत्र मुस्लिम राज्य की स्थापना की जाए, जिसे पकिस्तान कहा जायेगा,
(ख) एक संविधान सभा के स्थान पर दो संविधान सभाएँ होनी चाहिए अर्थात् पाकिस्तान के संविधान के निर्माण के लिए अलग संविधान सभा होगी।
क्रिप्स के प्रस्तावों के अस्वीकार हो जाने के बाद कांग्रेस द्वारा 8 अगस्त, 1942 को भारत छोडो आन्दोलन आरम्भ किया गया। 23 मार्च, 1946 को ब्रिटिश मंत्रिमंडल ने सेक्रेटरी ऑफ स्टेट पैथिक लारेंस के नेतृत्व में अपना तीन सदस्यों का एक प्रतिनिधि मंडल भारत भेजा। इस मंडल के अन्य दो सदस्य सर स्टेफर्ड क्रिप्स तथा श्री बी० ए० अलेक्जेंडर थे। इस प्रतिनिधि मंडल (जिसे कैबिनेट मिशन के नाम से जाना जाता है) ने अपनी ओर से प्रस्ताव रखे जिनकी भारत और इंग्लैंड में 16 मई, 1946 को एक साथ घोषणा की गई। इसके फलस्वरूप भारत की जनता द्वारा वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित एक शुद्ध भारतीय विधान सभा के गठन का स्वप्न साकार हुआ जब संविधान सभा का चुनाव जुलाई, 1946 में संपन्न हुआ। सोमवार 9 दिसम्बर, 1946 के 11 बजे दिन में इस संविधान सभा का पहला अधिवेशन आरम्भ हुआ। इस महान् संविधान सभा ने भारत गणराज्य को उसका लोकतंत्रात्मक संविधान दिया। संविधान के निर्माण में संविधान सभा को 2 वर्ष 11 महीने 18 दिन का समय लगा। 26 नवम्बर, 1949 को संविधान पर संविधान सभा के सभापति का हस्ताक्षर हुआ और उसे पारित घोषित किया गया। नागरिकता, निर्वाचन एवं अंतरिम संसद से संबंधित उपबन्धों को तथा अस्थायी और संक्रमणकारी उपबन्धों तुरंत प्रभावी किया गया अर्थात् वे 26 नवम्बर, 1949 से लागू किये गए। शेष संविधान 26 जनवरी, 1950 को प्रवृत्त हुआ और इस तारीख को संविधान में उसके प्रारम्भ की तारीख कहा गया।
सन् 1946 से 1949 के बीच जब संविधान बनकर तैयार हो रहा था, देश के राजनैतिक क्षितिज पर कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन दृष्टिगोचर हुए, जिनका उल्लेख करना सुसंगत प्रतीत होता है। 26 जुलाई, 1947 को गवर्नर जनरल ने पाकिस्तान के लिए पृथक् संविधान सभा के स्थापना की घोषणा की। 18 जुलाई, 1947 को ब्रिटिश संसद द्वारा भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 पारित किया गया, जो उसी तारीख को प्रवृत्त हो गया। इस अधिनियम में यह उपबन्ध किया गया कि 15 अगस्त, 1947 से (जिसे इस अधिनियम में ‘नियत तारीख’ कहा गया है) भारत शासन अधिनियम, 1935 में यथा परिभाषित ‘भारत” के स्थान पर दो डोमिनियन स्थापित हो जायेंगे जो भारत और पाकिस्तान के नाम से ज्ञात होंगे। प्रत्येक डोमिनियन की संविधान सभा को किसी भी संविधान की रचना करने और उसे अंगीकार करने की असीमित शक्ति होगी। साथ ही, संविधान सभा को ब्रिटिश पार्लियामेंट के किसी भी अधिनियम को, भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम सहित, निरसित करने की शक्ति होगी। जो संविधान सभा अविभाजित भारत के लिए निर्वाचित की गई थी, उसके सदस्यों की संख्या 389 थी. इसके प्रथम अस्थायी अध्यक्ष डॉ0 सच्चिदानंद सिन्हा थे. बाद में 11 दिसंबर, 1946 को डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष चुने गए. और स्थायी अध्यक्ष और जिसकी पहली बैठक 9 दिसम्बर, 1946 को हुई थी वही संविधान सभा भारत डोमिनियन के प्रभुत्वसंपन्न संविधान सभा के रूप में 14 अगस्त, 1947 को पुनः समवेत हुई। भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम वस्तुतः न तो भारत के लोगों की इच्छा का अनुसमर्थन करता है और न इसे संविधान सभा की शक्ति स्रोत कहा जा सकता है। भारत की संविधान सभा को संविधान की रचना करने की शक्ति भारत के लोगों से प्राप्त हुई है न कि ब्रिटिश पार्लियामेंट द्वारा पारित किसी विधि या अधिनियम से।
प्रत्येक संविधान का अपना एक दर्शन होता है। हमारे संविधान के दर्शन का आधार पंडित जवाहरलाल नेहरू का वह ऐतिहासिक संकल्प-उद्देश्य है जिसे संविधान सभा ने 22 जनवरी, 1947 को अंगीकार किया था और जिससे आगे के सभी चरणों में संविधान को रूप देने में प्रेरणा मिली। यह संकल्प इस प्रकार है:-
“संविधान सभा भारत को स्वतंत्र प्रभुसंपन्न गणराज्य के रूप में घोषित करने के अपने दृढ़ और सत्यनिष्ठ संकल्प की और भारत के भावी शासन के लिए संविधान बनाने की घोषणा करती है:
(2) जिसमें उन राज्यक्षेत्रों का जो भारत ब्रिटिश भारत में समाविष्ट हैं, उन राज्यक्षेत्रों का जो अभी देशी रियासतों के भाग हैं और भारत के उन भागों का जो अभी ब्रिटिश भारत के बाहर हैं और ऐसी रियासतों का तथा एक ऐसे अन्य राज्यक्षेत्रों का जो स्वतंत्र प्रभुत्वसंपन्न भारत का भाग बनने के लिए सहमत हैं, मिलकर एक संघ बनेगा, और
(3) उक्त राज्यक्षेत्र, अपनी वर्तमान सीमाओं से या ऐसी सीमाओं से जो संविधान सभा द्वारा या उसके पश्चात् सांविधिक विधि के अनुसार अवधारित की जाएँ, स्वायत्त इकाइयों की प्रस्थिति रखेंगे। वे सरकार और प्रशासन की उन सभी सभी शक्तियों और कृत्यों का प्रयोग करेंगे केवल ऐसी शक्तियों और कृत्यों को छोड़कर जो संघ में निहित या संघ को समनुदिष्ट हैं, या जो संघ में अंतर्निहित या विविक्षित हैं या उसके परिणामस्वरूप हैं, और
(5) भारत की जनता को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, प्रतिष्ठा और अवसर की तथा विधि के समक्ष समता, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, उपासना, व्यवसाय, संगम और कार्य की स्वतंत्रता विधि और सदाचार के अधीन रहते हुए होगी, और
(6) अल्पसंख्यकों के लिए, पिछड़े और जनजातीय क्षेत्रों के लिए, दलितों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए पर्याप्त रक्षोपाय किये जायेंगे, और
(7) गणराज्य के राज्यक्षेत्र की अखंडता और भूमि, समुद्र तथा आकाश पर उसके प्रभुत्वसंपन्न अधिकार, न्याय और सभी राष्ट्रों के विधि के अनुसार बनाये रखे जायेंगे, और
(8) यह प्राचीन भूमि विश्व में अपना समुचित और गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त करेगी और विश्व शान्ति तथा मानव कल्याण के लिए अपना पूर्ण सहयोग प्रदान करेगी।”
पंडित नेहरू के शब्दों में व्यक्त उपर्युक्त संकल्प “संकल्प से कुछ अधिक है। यह एक घोषणा है, एक दृढ़ निश्चय है, एक प्रतिज्ञा है, एक वचन है और हम सभी के लिए एक समर्पण है।”
हमारे संविधान की उद्देशिका के प्रथम चार शब्द हैं ‘हम भारत के लोग’। यह शब्द-समूह का निहितार्थ बहुत गहरा है। इस शब्द समूह का ‘भारत’ शब्द ऐतिहासिक दृष्टि से एक पौराणिक शब्द है। पुराणों के अनुसार हमारी धरती सात द्वीपों में विभाजित है जिसमें से एक है जम्बुद्वीप। जम्बूद्वीप में नौ ‘खंड’ या ‘वर्ष’ हैं। इसमें से एक खंड का नाम ‘अजनाभ वर्ष’ था। इस शब्द की व्याख्या पुराणों और महाकाव्यों में वर्तमान है। पुराणों में भारत एक पुराना नाम ‘अजनाभ वर्ष’ है। ‘अजनाभ वर्ष’ उस भूखंड को द्योतित करता है जिसकी नाभि से आदि सिसृक्षा की कारयित्री शक्ति ‘अज’ या ‘विधाता’ का जन्म होता है। ‘वर्ष’ का एक पर्याय ‘खंड’ भी है। अति प्राचीन काल में यह देश ‘अजनाभ वर्ष’ ही कहा जाता था। बाद में ‘भरतखंड’ और ‘भारत वर्ष’ कहा जाने लगा। किसी भी पूजा के पहले संकल्पोचार ‘जम्बुद्वीपे भरतखंडे’ से आरम्भ होता है। आज संविधान ने इसे सिर्फ ‘भारत’ कहकर स्वीकार किया है। हिन्दी के प्रख्यात निबंधकार कुबेरनाथ राय अपने ‘जम्बुद्वीपे-भरतखंडे’ शीर्षक निबंध में कहा है-“मुझे ‘भारत’ शब्द सुनकर इसके अर्थ का मानसिक भोग एक भौगोलिक सत्ता के रूप में नहीं होता, बल्कि एक प्रकाशमय, संगीतमय भाव-प्रत्यय या चैतन्य-प्रतिमा के रूप में होता है। मैं सदैव अनुभव करता हूँ कि ‘भारत एक भौगोलिक-राजनीतिक इकाई से भी अधिक सत्य और शाश्वत है। एक विशिष्ट ‘संस्कार-समूह’ के रूप में, एक विशिष्ट बोध-सत्ता के रूप में अर्थात् अपने चिन्मय रूप में। संविधान की उद्देशिका में प्रयुक्त ‘भारत’ शब्द से उसकी अपनी सत्ता के तीनों रूपों-‘मृण्मय भारत’, ‘शाश्वत भारत’ और ‘चिन्मय भारत’- का बोध होता है। महाकवि ‘दिनकर’ निम्नलिखित पंक्तियाँ भारत के इन तीन रूपों की ओर संकेत करती हैं-
“किसका नमन करूँ मैं भारत, किसका नमन करूँ
तेरा, तेरे नदीश गिरि वन पथ का नमन करूँ मैं
मेरे प्यारे देश, देह या मन का नमन करूँ मैं।”
उत्तर में लेह से लेकर दक्षिण में इंदिरा पॉइंट तक, पूर्व में अरुणाचल प्रदेश के चाकलांग जिला से पश्चिम में गुजरात के कच्छ तक विस्तीर्ण 28 राज्यों और 8 संघ राज्यक्षेत्रों का संघ मृण्मय भारत है, जो हमारे गाँव-नगर, खेत-खलिहान, हाट-बाजार और हमारे नदी-पहाड़-जंगल-वनस्पितयों में दृश्यमान है। भारत का शाश्वत रूप मोहनजोदड़ो-हड़प्पा सभ्यता से पूर्व से, निषाद-द्रविड़-किरात-आर्य के प्रवाहों और निरंतर समिश्रण से गतिमान है। यह शाश्वत इस अर्थ में है कि यह अविच्छिन्न रहा है। हमारे देश की सभ्यता मिस्र, मेसोपोटामिया और ग्रीस की सभ्यताओं से भी पुरानी है और उनसे इस अर्थ में भिन्न है कि इसकी परम्पराएँ बिना किसी क्रमभंग के वर्तमान में भी परिरक्षित हैं। प्राचीन विश्व के किसी भी भाग में मनुष्य और मनुष्य तथा मनुष्य और राज्य के बीच का संबंध इतना सुन्दर और मानवीय नहीं रहा। भारत का ‘शाश्वत रूप’ इतिहास की विकास-यात्रा में हजारों हजार वर्षों से देहान्तर होते हुए भी वर्तमान तक अविच्छिन्न रूप से विद्यमान है। भारत का ‘चिन्मय रूप’ का एक बीज है-वेदांत। यज्ञ, शंकर का अद्वैत योग, विशिष्टतायोग, भक्ति, संन्यास-योग आदि कई रूपों में व्यक्त होता रहा। हमारी भारतीय साधना, शिल्प, साहित्य, संस्कृति और दार्शनिक चिन्तन और 20 वीं सदी में सर्वोदय का स्रोत चिन्मय भारत है। वेद की ऋचाओं, उपनिषदों, श्रीमद्भागवत, कालिदास के काव्य, भक्तिकाल के काव्य, रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविता, संतवाणी, अरविन्द चिन्तन के कथ्य और शैली ‘चिन्मय भारत’ का रूप अधिक स्पष्ट है। ‘कामायनी’ और ‘उर्वशी’ चिन्मय भारत की अभिव्यक्तियाँ हैं तो ‘भारत-भारती’ और ‘कुरुक्षेत्र’ ‘शाश्वत भारत’ की। संविधान की उद्देशिका में भारत अपने तीनों रूपों में विद्यमान है।
यह कहा जा चुका है कि उद्देशिका संविधान का परिचय-पत्र है। बेरुबाड़ी वाद (1960) में सर्वोच्च न्यायालय ने उद्देशिका को संविधान का अभिन्न अंग नहीं माना और यह कहा कि जहाँ संविधान की भाषा संदिग्ध हो, वहाँ विधिक निर्वचन में उद्देशिका की सहायता ली जा सकती है लेकिन संविधान का भाग नहीं होने के कारण इसमें संशोधन नहीं किया जा सकता लेकिन केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) में दिये गए निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे संविधान का भाग बताया। संविधान का एक भाग होने के कारण ही संसद ने 1976 में 42वें संविधान संशोधन द्वारा इसे संशोधित करते हुए इसमें ‘समाजवादी’, ‘अखंडता’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़े थे। यथासंशोधित उद्देशिका में संविधान के स्रोत, देश की शासन-प्रणाली, नागरिकों के अधिकार, उनके कर्त्तव्य संक्षिप्ततः वर्णित हैं और संविधान स्वीकार करने की तारीख का उल्लेख है। “हम भारत के लोग………….इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं-ये शब्द भारत के लोगों की सर्वोच्च प्रभुता की घोषणा करते हैं और इस बात की ओर संकेत करते हैं कि संविधान का आधार उन लोगों का प्राधिकार है। उद्देशिका यह स्पष्ट शब्दों में घोषित करती है कि संविधान के अधीन सभी प्राधिकारों का स्रोत भारत के लोग हैं। उद्देशिका में प्रभुत्वसंपन्न राष्ट्र, समाजवादी विचारधारा वाली धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य का जो चित्र है, वह देश की शासन-प्रणाली का स्वरूप बताती है। उद्देशिका में यह बतलाया गया है कि देश के समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता तथा प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने एवं उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता को बढ़ाने वाली वंधुता बढ़ाने के लिए हम भारत के लोग दृढ़ संकल्प हैं। इस प्रकार, यह उद्देशिका हमारी प्रतिज्ञाओं का घोषणा-पत्र है। लेखक ने इसी मत को व्यक्त किया है।
हमरे संविधान में वर्णित प्रतिज्ञाएँ हमारी सांस्कृतिक विरासत, हमारे दार्शनिक चिंतन में हजारों वर्षों से विद्यमान हैं। भारत में लोकतांत्रिक सरकार की व्यवस्था पूर्व-वैदिक काल से है। वस्तुत: लोकतंत्र की अवधारणा वेदों की देन है। इस सन्दर्भ में कई सूत्र मिलते हैं। ऋग्वेद में ‘सभा’ और ‘समिति’ का उल्लेख है। द्विसदनीय संसद की शुरुआत वैदिक काल से मानी जा सकती है। ऋग्वेद, अथर्वेद एवं ब्राह्मण साहित्य में कई बार ‘राष्ट्र’ और ‘गणतंत्र’ शब्दों का उल्लेख हुआ है। वैदिक सहित में गणतंत्र, लोकतंत्र, राष्ट्र के भौगोलिक, भू-सांस्कृतिक, भू-राजनीतिक तथा संप्रभु शासन की चर्चाएँ की गई हैं। यजुर्वेद में एक राष्ट्रगीत इस प्रकार है:-
“ॐ आ ब्रहमन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम्
अस्मिन राष्ट्रे राजन्य: इषव्य: शूरो महारथो जायताम्
दोग्ध्री धेनु: वोढाSनडवान् आशु: सप्तिः:
पुरन्ध्रिः योषा जिष्नू रथेष्ठाः
सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम।”
हमारे राष्ट्र में ब्रह्मवर्चसी ब्राह्मण उत्पन्न हों। हमारे राष्ट्र में शूर, वाणवेधन में कुशल महारथी क्षत्रिय उत्पन्न हों। गायें दूध देने वाली, बैल भार ढोने वाले, स्त्रियाँ सुशील और सर्वगुण संपन्न हों। रथवाले जयशील, पराक्रमी और यजमान पुत्र हों।
महाभारत के बाद बौद्ध काल में (450 ई पू० से 350 ई० पू० ) पिप्प्ली वन के मौर्य, कुशीनगर और काशी के मल्ल, कपिलवस्तु के शाक्य, मिथिला के विदेह और वैशाली के लिच्छवी प्रमुख गणराज्य रहे हैं। इसके परवर्ती काल में अटल, अराट, मालव, और मिसोई गणराज्य प्रमुख थे। बौद्ध काल के वज्जी, लिच्छवी, वैशाली, वृजक, मल्लक, मदक, सोम्बस्ती और कम्बोज जैसे गणतंत्र लोकतांत्रिक संघीय व्यवस्था के कुछ उदाहरण हैं।
स्वामी विवेकानन्द ने “एकम् सत् विप्रा बहुधा वदन्ति” (ऋग्वेद,1-164-46) की इस प्रकार की है- “That which exists is one; but sages call it by different names. In all these cases, where hymns are written about these gods the Being perceived is one and the same. It was the perceiver who made all the differences. It was the hymnists, the sages, the poets who sang in different languages and different words, the praise of one and the same Being. अर्थात् वह जो विद्यमान है , वह एक है, संतगण उसे अनके नाम से पुकारते हैं यानी ईश्वर एक है उसे प्रबुद्धजन अनेक नाम से पुकारते हैं। विवेकानन्द आगे कहते हैं- “Tremendous results have followed from that one verse. Some of you are surprised to know that India is the only country where there has never been religious persecution, where never was there any man disturbed by his religious faith। India has always had the magnificent idea of religious freedom, and remeber that religious freedom is the condition of growth.” अतः स्पष्ट है कि उद्देशिका में ‘पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य’ की स्थापना और ‘विश्वास’, ‘धर्म और ‘उपासना’ की स्वतंत्रता का संकल्प वेदों से प्रेरित है।
‘अहम् ब्रह्मास्मि’ पुरातन शास्त्रों और उपनिष्दों में वर्णित महावाक्यों में से एक है, जिसका अर्थ शाब्दिक अर्थ है-‘मैं ब्रह्म हूँ।’ यह यजुर्वेद के वृहदारण्यक उपनिषद में संकलित है। आदि शंकराचार्य ने इस मंत्र का उद्घोष कर हर मनुष्य को यह अहसास करने की कोशिश की कि अंदर से सभी एक सामान है। ‘अहं ब्रह्मास्मि’ की अनुभूति करने से ही व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता सुनिश्चित हो सकती है। छान्दोग्य उपनिषद् का महावाक्य ‘एकोहं बहुस्याम’ का अर्थ है एक ही ब्रह्म स्वयं के संकल्प से विविधताओं और विभिन्नताओं में समाहित है। वृहदारण्यक उपनिषद् में योगसाधना के आरम्भ में की जाने वाली प्रार्थना-‘ॐ सर्वेषां स्वस्तिर्भवतु, सर्वेषां शान्तिर्भवतु, सर्वेषां पूर्णंभवतु, सर्वेषां मंगलंभवतु, लोका: समस्ताः सुखिनो भवन्तु’ (सबका कल्याण हो, सभी शांति से रहें, सभी पूर्ण हों, सबका मंगल हो, सब लोग सुखी हों), ‘ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः/ सर्वे सन्तु निरामया/ सर्वे भद्राणि पश्यन्तु /मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत’ (सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त रहें, सभी अच्छी घटनाओं के साक्षी बनें और कभी किसी को दुःख का भागी न बनना पड़े), अक्सर उद्धृत पंचतंत्र की सूक्ति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, तथा ऋग्वेद की यह ऋचा ‘अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते सं/ भ्रातरौ वावृधु: सौभाग्य (न कोई बड़ा है, न कोई छोटा, न मध्यम, सभी एक दूसरे के वन्धु हैं, उत्तम भाग्य प्राप्त करने के लिए वर्धमान हो रहे हैं)। संविधान की उद्देशिका में वर्णित सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा प्रतिष्ठा और अवसर की समानता की प्रतिज्ञाएँ वेदों एवं उपनिषदों से उद्भूत हैं। वैदिक साहित्य में राष्ट्र की संकल्पना एवं राष्ट्रीय एकता और अखंडता की अवधारणा स्पष्ट दिखलाई देती है।
लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा अत्यंत प्राचीन काल से ही भारत में रही है. रामायण काल में रामराज्य की अवधारणा लोककल्याणकारी राज्य के सिद्धांत पर आधारित थी. कौटिल्य का अर्थशास्त्र दुनिया का पहला लोककल्याणकारी राज्य बनाने का बौधिक आधार प्रदान करता है. कौटिल्य ने सभी क्षेत्रों में कल्याण की बात की. उनके अनुसार आर्थिक गतिविधि में वृद्धि, आजीविका की सुरक्षा, कमजोर वर्गों की सुरक्षा, उपभोक्ता संरक्षण, नागरिकों के उत्पीड़न की रोकथाम और श्रमिकों तथा कैदियों के कल्याण को कल्याण के अनिवार्य तत्व हैं.
संविधान निर्माता यह मानते थे की पारंपरिक भारत ही आज के भारत के उद्भव का स्रोत है। संविधान का मूल, हमारी वही महान परम्परा है। इसका प्रमाण संविधान की मूल प्रति में विख्यात चित्रकार नंदलाल बोस द्वारा अपनी कूची से बनाये गए कुल 22 चित्र हैं जो भारतीय इतिहास के विभिन्न कालखंडों और हमारी परम्परा का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुने गये हैं। इन चित्रों के आधार पर हम यह समझ सकते हैं कि संविधान निर्माताओं के मन-मस्तिष्क में परम्परा आधारित एक आदर्श भारतीय समाज की कैसी परिकल्पना रही होगी। इन चित्रों में मोहनजोदड़ो की मुहर, वैदिककाल के गुरुकुल, लंका पर प्रभु श्रीराम की विजय, गीता का उपदेश देते श्रीकृष्ण, भगवान बुद्ध, भगवान महावीर, सम्राट अशोक द्वारा बौद्ध धर्म का प्रचार, गुप्त वंश की कला में हनुमान की मूर्ति, विक्रमादित्य का दरबार, नालंदा विश्वद्यालय, उड़िया मूर्तिकला, पृथ्वी पर गंगावतरण, नटराज की कांस्य प्रतिमा, अकबर का दरबार, शिवाजी और गुरु गोविन्द सिंह, टीपू सुलतान, महारानी लक्ष्मी बाई, महात्मा गांधी का दांडी मार्च, नोआखाली में दंगा पीड़ितों की बीच गाँधी, नेताजी सुभाषन्द्र बोस, हिमालय के दृश्य। रेगिस्तान के दृश्य और महासागर के दृश्य शामिल हैं। इन चित्रों द्वारा संविधान में भारत की महान परम्परा की कहानी प्रस्तुत की गई है। इन्हीं चित्रों के माध्यम से शासन और राजनीति के अभीष्ट निर्धारित किये गए हैं।
9 दिसम्बर, 1946 को संविधान सभा के अस्थायी अध्यक्ष, सच्चिदानंद सिन्हा ने अपने उद्घाटन भाषण में हमें इन शब्दों में सतर्क किया था -“The Constitution has been reared for immortality, if the work of man may justly aspire to such a titile. It may, nevertheless, perish in an hour by the folly, or corruption, or negligence of its only keepers, THE PEOPLE.
हम अपनी पुरातन संस्कृति भूल गये। आज की संस्कृति हमें उत्कर्ष की ओर अग्रसर नहीं कर पायी। संसद द्वार संख्या 1 पर ‘लोकद्वारमपावा पश्येम त्वं वयं वेरा’ (लोगों के कल्याण लिए द्वार खोल दो और उन्हें संप्रभुता का मार्ग दिखाओ), संसद के केन्द्रीय कक्ष के द्वार पर ‘अयन निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्/उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्’ उत्कीर्ण हैं। भारत सरकार का आदर्श वाक्य ‘सत्यमेव जयते’, लोकसभा का आदर्श वाक्य ‘धर्मचक्र प्रवर्तनाय’, उच्चत्तम न्यायालय का आदर्श वाक्य यतोधर्मस्ततोजय:’ आकाशवाणी का ‘बहुजन हिताय’, दूरदर्शन का ‘सत्यं, शिवं सुन्दरं, भारतीय सेना का ‘सेवा अस्माकम् धर्मः, ये सभी प्रदर्शन मात्र के लिए रह गये हैं। क्या ये विकास में बाधक रहे? नानी पालकी वाला की टिप्पणी गौर करने लायक है-“The contrast between the culture of ancient India and that of modern seems sufficient to disprove Darwin’s theory of evolution.” अपनी पुस्तक ‘We, the People’ का समर्पण उन्होंने इन शब्दों में लेखबद्ध किया है:-
TO MY COUNTRYMEN
who gave unto themselves the the onstitution
but not the ability to keep it,
who inherited a resplendent heritage
but not the wisdom to cherish it,
who suffer and endure in patience
without the perception of their potential’
यहे प्रश्न बार-बार उठता रहा है कि क्या संविधान ने हमें विफल किया है या हमने संविधान को विफल किया है? हमारे सत्तासीन जन प्रतिनिधियों ने संविधान में इतने सशोधन किये हैं कि उसका मूल स्वरूप बदल चुका है. कार्यरूप में संविधान को देखकर लगता है कि हमने संविधान को विफल किया है और पालकीवाला की व्यथा समझ में आती है.
