SahasVsBhay : महात्मा गांधी लिखते हैं कि ‘डरबन (दक्षिण अफ्रीका) में हिन्दुस्तानियों की एक सभा बुलाई गई थी। कुछ मित्रों ने पहले ही मुझे बता दिया था कि इस सभा में मुझपर (महात्मा गांधी पर) आक्रमण हो सकता है; इसलिए या तो मैं इस सभा में शामिल ही न होऊं या अपनी रक्षा के कुछ खास उपाय करूं। लेकिन, दोनों में से एक भी मार्ग मेरे लिए खुला नहीं था। सेवक को उसका स्वामी बुलाए और सेवक डर के मारे न जाए, तो उसका सेवा धर्म भंग हो जाता है। और, जो सेवक स्वामी की सेवा से डरे, वह सेवक कैसा?’ आपको याद दिलाते दें कि पिछले दिनों लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर जवाब देने के लिए प्रधानमंत्री को आना था, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के मुताबिक उन्होंने कांग्रेस सदस्यों के रुख के कारण प्रधानमंत्री को आने से रोका। ओम बिरला कहते हैं कि लोकसभा में पिछले दिनों कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष का शोर शराबा चल रहा था, उसकी आड़ में कांग्रेसी प्रधानमंत्री की सीट के पास कुछ भी अप्रत्याशित कर सकते थे। मालूम हो कि जब प्रधानमंत्री को जवाब देने के लिए आना था, उसी दौरान कांग्रेस की महिला सदस्य बैनर लेकर उनकी सीट के पास पहुंचने लगी थीं।
उस अवरोध के बाद जब सदन बैठा, तो अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि उन्हें पक्की जानकारी मिली थी। अगर विपक्ष की रणनीति अंजाम तक पहुंचती, तो लोकतंत्र तार तार हो जाता, इसीलिए उन्होंने प्रधानमंत्री से न आने का आग्रह किया था। अध्यक्ष के इस बयान का प्रियंका गांधी वाड्रा ने बाहर विरोध किया और कहा कि प्रधानमंत्री लोकसभा अध्यक्ष के आसान के पीछे छिप रहे हैं। विपक्ष की प्रधानमंत्री को चोट पहुंचाने की कोई मंशा नहीं थी, लेकिन अगर विपक्ष के साथ भेदभाव होगा, तो विरोध होकर रहेगा। लोकसभा में पूरे सप्ताह चले सियासी टकराव ने संसदीय कार्यवाही को लगभग ठप्प कर दिया। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के बाद बजट पर चर्चा होने की उम्मीद थी, लेकिन विपक्ष के लगातार हंगामे और नारेबाजी के कारण कोई ठोस काम नहीं हुआ। अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि मौजूदा सत्र में अबतक लोकसभा में 19 घंटे 13 मिनट अव्यवस्था और स्थगन की भेंट चढ़ चुके हैं। अगले दिन की भी सदन पहली बार तीन मिनट और दूसरी बार मात्र पांच मिनट ही चल पाया, जिसके बाद कार्यवाही नौ फरवरी तक के लिए रोक दी गई।
दूसरी ओर कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सरकार पर आरोप लगाया वह सदन को लोकतांत्रिक तरीके से नहीं चलाना चाहती। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में उनसे पूछे गए सवालों का जवाब देने की हिम्मत नहीं है। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के जवाब में किसी सवाल का उत्तर नहीं देने का दावा किया कि झूठ दोहराना ही प्रधानमंत्री मोदी का काम रह गया है। वह केवल पचास—सौ साल पुरानी बातें करते हैं। पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज नरवाने की किताब जब कांग्रेस के पास है, तो सत्ता में बैठे लोगों के पास नहीं होगी, यह विश्वास के लायक नहीं है। लेकिन, इस सच्चाई से दूर गृहमंत्री और रक्षामंत्री इसके अस्तित्व को नकार रहे हैं। राज्यसभा में धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री के जवाब पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे कहते हैं कि प्रधानमंत्री का मनोबल टूटा हुआ है। खड़गे ने सिखों के अपमान के प्रश्न पर उसे खारिज करते हुए कहा कि डॉ. मनमोहन सिंह वित्तमंत्री से प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचे थे। खड़गे ने कहा कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से नरवाने की पुस्तक की चर्चा तो पहले सच तो सुन लेते, फिर सरकार उसका जवाब देती। प्रधानमंत्री ने हमारे किसी मुद्दे का जवाब नहीं दिया और उल्टे हम पर गालियां देने का गलत आरोप लगा दिया।
अब अगर आदिकाल से भारत की नीतिगत बात करें तो श्रीकृष्ण को भी रण छोड़ना पड़ा था। भारतीय ग्रंथ हमें बताते हैं कि विषम परिस्थितियों के कारण रण छोड़ा जा सकता है। श्रीकृष्ण को ‘रणछोड़’ इसलिए कहा जाता है, क्योंकि एक बार उन्होंने युद्ध के मैदान छोड़ दिया था। कुछ कहानियों के अनुसार, श्रीकृष्ण ने कालयवन नामक राक्षस को युद्ध के लिए ललकारा था, लेकिन बाद में उन्हें मैदान छोड़ना पड़ा। उसी घटना के बाद उन्हें ‘रणछोड़’ नाम से जाना जाने लगा, जिसका अर्थ है ‘युद्ध से भाग जाने वाला’। श्रीकृष्ण को भागवत मर्मज्ञ बताते हैं कि यह गलती भारतवर्ष के राजाओं ने कई बार दोहराई है। मोहम्मद गजनवी ने कई बार भारतीय राजाओं से हारने के बाद सेना के आगे गायों को खड़ा कर दिया, जिससे भारतीय राजाओं ने हथियार डाल दिए। धर्म के मर्म को समझने के लिए उन्होंने धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया। कहा कि धर्म तुम्हारी रक्षा तभी करेगा, जब तुम धर्म की रक्षा करोगे।
अब यदि धरातल पर हुई घटना का उल्लेख करें, तो बात यही थी कि जनरल मनोज नरवाने की तथाकथित अप्रकाशित पुस्तक, जिसके कुछ पृष्ठ को लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी पढ़ना चाहते थे, उसमें उन्हें अपनी बात सत्तापक्ष के नेताओं द्वारा कहने नहीं दिया गया। बात बढ़ती गई और फिर इतनी बढ़ गई कि सदन बार—बार बाधित होता रहा। यहां तक कि लोकसभा में जिसका उत्तर प्रधानमंत्री का अभिभाषण देश सुनना चाहता था, वह सुन नहीं सका। यह बात समझ में नहीं आ रही कि कुछ खतरा है, यह जानते हुए महात्मा गांधी अपनी बात कहने के लिए डरबन (दक्षिण अफ्रीका) की सभा में चले गए थे और विरोधियों द्वारा लाठी भी खाई। जबकि, डरबन भारत से हजारों किलोमीटर सुदूर का एक स्थान था, लेकिन यह तो हमारा अपना देश है, जहां हमारी सरकार है। अब प्रश्न यह है कि क्या हमारी सुरक्षा एजेंसी ऐसी हो गई है, जो सदन के नेता और देश के प्रधानमंत्री की भी सुरक्षा करने में अक्षम है। देश में हर जगह अब यही चर्चा का विषय बना हुआ है कि क्या सुरक्षा एजेंसियां सदन के नेता और हमारे प्रधानमंत्री को भी सुरक्षित नहीं रख पा रही हैं, तो फिर आम जनता की रक्षा कैसे होगी? कौन करेगा/देगा सुरक्षा? यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण बात है और इसका पर्दाफाश होना चाहिए। सदन के नेता और देश के प्रधानमंत्री पर हमला करने की हिम्मत किसके द्वारा की गई थी और किस साजिश के तहत इसे अंजाम दिया जाने वाला था? और, फिर उन महिला सांसदों को भी आगे आना ही चाहिए, जिनपर यह आरोप लगाया जा रहा है कि जब यह विश्वस्त सूचना लोकसभा के अध्यक्ष को थी कि महिला सांसदों का एक दल को विपक्ष द्वारा आगे करके सदन के नेता और प्रधानमंत्री पर आक्रमण कराया जाएगा। इस विषय पर एक उच्चायोग द्वारा जांच जरूर कराई जानी चाहिए, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)
