Sanatan : रणनीतिज्ञों व धर्माचार्यों में खटास समाज हित में उचित?

Nishikant Thakur
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Sanatan : आजकल “सनातन” पर गहन विश्लेषण किया जा रहा है, लेकिन इसका सार्थक विश्लेषण करना उसी प्रकार कठिन है जिस प्रकार कोई समुद्र की अथाह  गहराइयों में डूबकर उसमें धरातल की तलाश करना चाहे । जहां तक हमने देखा है समाज के सभी धर्मानुयाईयों का उद्देश्य एक ही ईश्वर को पाना मात्र ध्येय  होता है वैसे ही जैसे सभी नदियां अंत में  समुद्र में जाकर ही मिल जाती है । महर्षि विश्वामित्र, जो बाद में ब्रह्मर्षि बने, प्राचीन भारत में कान्यकुब्ज (आधुनिक कन्नौज, उत्तर प्रदेश) के राजा थे। वे कुश वंश (अमावसु वंश) के राजा गाधि के पुत्र थे और शुरू में एक क्षत्रिय राजा के रूप में शासन करते थे। वे भगवान राम के गुरु के रूप में प्रसिद्ध हैं। गौतम बुद्ध (लगभग 563-483 ईसा पूर्व) बौद्ध धर्म के संस्थापक, एक महान आध्यात्मिक शिक्षक और दार्शनिक थे, जिनका जन्म सिद्धार्थ के रूप में नेपाल के लुंबिनी में शाक्य वंश के राजा शुद्धोधन के घर हुआ था। 29 वर्ष की आयु में सांसारिक दुखों से विरक्त होकर उन्होंने सत्य की खोज में राजपाठ त्याग दिया और बोधगया में पीपल के पेड़ (बोधि वृक्ष) के नीचे ज्ञान प्राप्त कर बुद्ध कहलाए । ऐसे ब्रह्मर्षियों, धर्म संस्थापक की यहां चर्चा इसलिए कि इन महान महामानवों ने राज्यगद्दी को ठुकराकर धर्मध्वजा के वाहक  स्वेच्छा से बनना स्वीकार किया था ।

अभी जो देश में धर्माचार्यों और राजनीतिज्ञों के बीच  विवाद का विषय बना हुआ है वह यह कि गत दिनों मौनी अमावस्या की रात्रि में  प्रयागराज के  त्रिवेणी पर जब भक्तगण डुबकी लगा रहे थे तो अपनी पालकी से स्नान करने जा रहे शंकराचार्य   अविमुक्तेश्वरानन्द को रोका गया और उनके शिष्यों के साथ पुलिस ने मारपीट की । मामला यहीं खत्म नहीं हुआ फिर यहीं से शुरू हुआ विवाद,  जो आज गंभीर बन गया है। आज भी किसी से बात करेंगे तो  बीच में वहां इसी बात पर घूम कर आ जाती है कि आख़िर धर्माचार्य सच हैं या राजनीतिज्ञ । शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्द ने कहा है कि पुलिस अधिकारी ने उन्हें अपमानित करने के उद्देश्य से सरकार के आदेश पर ऐसा किया । अब सच तो तभी सामने आएगा जब कोई निष्पक्ष जांच हो, लेकिन इसकी जांच आखिर करेगा कौन?  सरकार द्वारा यदि जांच कराई जाती है तो उसे धर्माचार्य शास्त्रानुसार मानने से इनकार करेंगे और फिर आखिर किसके द्वारा जांच कराई जाएगी। जबकि कानून तो यही कहता है विषम मुद्दों की जांच कानून सम्मत हो तो फिर उसे इनकार करने का अर्थ नहीं रह जाता । लेकिन, ऐसी स्थिति में धर्माचार्य सच का पता लगाएंगे ? अभी भी जो बात सामने आ गई है उसमें भी दोनों पक्ष दो विचारों में बंट गए हैं । राजनीतिज्ञों की ओर से भी दो पक्ष हो गए है जिनमें एक का कहना है कि शंकराचार्य धर्मगुरु हैं और भगवान स्वरूप हैं अतः उनका और उनके  शिष्यों का जो अपमान किया गया वह उचित नहीं हैं । दूसरी ओर सरकार की ओर से   अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य  मानने  से ही  इंकार कर दिया गया है।

इतिहास तो यह बताता है कि आदिगुरु शंकराचार्य और पंडित मंडन मिश्र के बीच जब शास्त्रार्थ होने की बात तय हुई थी तो यह कहा गया इन दोनों के बीच जीत हार का निर्णय कौन करेगा । इतिहास ही बताता है कि पंडित मंडन मिश्र की अर्धांगिनी विदुषी भारती ने सुझाव दिया कि आप दोनों जैसे विद्वान आज पृथ्वी पर नहीं हैं अतः दोनों विद्वानों के गले में माला डालकर यह निर्णय लिया गया कि जिनकी हार होगी उनकी माला मंद पड़  जाएगी । यही हुआ । लेकिन, आज क्या यही हो सकता है । एक ओर जहां धर्मध्वज लेकर चलने वाले शंकराचार्य हैं , जिनके पीछे उसी धर्मध्वज का बल होता है और दूसरी ओर सरकार जिनके पास आज शासन है सत्ता है । आखिर निर्णय कौन करेगा । सच तो यह है भारतीय सीमा के अंदर रहने वाले सभी भारतीय हैं जिन्हें भारतीय संविधान को मानना ही है , चाहे वह धर्मगुरु हो या सरकार । सरकार का पक्ष यह कहता है कि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य होने का मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है वहीं दूसरी ओर धर्माचार्यों की ओर से यह कहा जा रहा है कि शंकराचार्य के सभी पीठों पर शंकराचार्यों द्वारा ही बिठाया जाता है जिनमें दो धर्माचार्यों की स्वीकृति उनके पक्ष में है और एक धर्माचार्य की मौन स्वीकृति है। अब ऐसी स्थिति में न तो हमारा भारतीय  समाज अपने को सरकार से ही अलग कर सकता है और न ही अपने को नास्तिक मान सकता है ।

हमारा भारतवर्ष कभी भी अपने को न तो धर्म से अलग कर सकता है और न ही सरकार से । सरकार से यदि अपने को अलग करने का प्रयास करेगा तो लंबे कानून के हाथ से दबोच लिया जाएगा और यदि धर्म से अपने को अलग करता  है तो समाज में वह  निराश्रित रह कर जीवित नहीं रह सकता ।  शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्द का कहना यह भी है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के वक्तव्य और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के वक्तव्य पर जनता आकलन कर रही है । अब मामला राजनीतिक रूप से गरम होता जा रहा है क्योंकि समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने शंकराचार्य के विवाद पर कहते है कि हमें खुशी है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद  डटे हुए हैं क्योंकि सनातनी उनके साथ है । शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद नकली सनातनियों की पोल खोल दी है।
मालूम हो कि इससे पहले शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्द ने कहा था कि डिप्टी सीएम केशव मौर्य समझदार नेता हैं ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री होना चाहिए जो समझते हैं कि अफसरों से गलती हुई है और जो डर का बैठा है उसे मुख्यमंत्री नहीं होना चाहिए । दरअसल, पिछले दिनों डिप्टी सीएम केशव मौर्य ने कहा था कि शंकराचार्य जी के चरणों में प्रणाम करता हूं और उनसे स्नान करने की प्रार्थना करता हूं।

जो कुछ भी मौनी अमावस्या के दिन प्रयागराज में त्रिवेणी तट पर हुआ इसका निर्णय तो आखिरकार धर्माचार्य, सरकार और अंत में न्यायालय द्वारा तो किया ही जाएगा , लेकिन समाज अभी डरा हुआ है और वर्तमान स्थिति पर चुप है । यह सामाजिक घुटन कभी भी विस्फोटक स्थिति में आ जाए यह कहना कठिन नहीं  है। यह तो हो नहीं सकता कि  विवाद सदियों तक चलता रहेगा , इसका समाधान तो होगा ही, लेकिन जिस घुटन में समाज और एक साधारण व्यक्ति डरा हुआ है उसे दूर करना ही होगा।इस मामले में यदि सरकार के अधिकारियों से कुछ गलत हुआ है तो कम से कम उन अधिकारियों को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से अपनी भूल के लिए याचना तो करनी ही चाहिए , पर यदि शंराचार्य के शिष्यों ने कुछ गलत जोर जबरदस्ती किया है तो उन्हें भी दो कदम पीछे हटना ही चाहिए क्योंकि ; यह धर्मसंगत भी होगा और न्यायसंगत भी। इस विवाद में  किसी तीसरे को शामिल होने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए ऐसा इसलिए क्योंकि राजनीतिज्ञों और धर्मगुरु समाज के हित की ही बात करेंगे  । वैसे दोनों पक्षों में विद्वान और बड़े बड़े विचारक बैठे ही हैं, पर हल तो दोनों पक्षों को सुलझाना ही चाहिए।

(लेखक वरिष्ट पत्रकार और स्तंभकार हैं)

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