Sawan : कन्नप्पा नयनार : कन्ना यानी आँखें अर्पित करने वाला नयनार यानी शिव भक्त…

Bindash Bol

रवि अग्रहरि

Sawan : सावन का महीना महादेव शिव को विशेष प्रिय है। दूर-दूर से हर उम्र के शिव भक्त काँवड़िये अलग-अलग शिवालयों में गंगा जल चढ़ाने जाते हैं। यह सिलसिला लगभग पूरे श्रावण मास तक चलेगा। शिव भोलेनाथ हैं एक लोटा जल से ही मगन हो जाते हैं। उनकी भक्ति में भाव देखा जाता है विधि-विधान की कोई खास बाध्यता नहीं है। ऐसे ही आज बात करते हैं एक ऐसे भक्त की जिसकी भक्ति अनूठी थी और भाव प्रबल।

कहते हैं कि एक बार एक मशहूर धनुर्धर थिम्मन एक दिन शिकार के लिए जंगल गया। शिकार के बाद जंगल में भटकते हुए उसे एक मंदिर मिला, जिसमें एक शिवलिंग था। थिम्मन के मन में शिव के लिए एक गहरा प्रेम भर गया और उन्होंने वहाँ कुछ अर्पण करना चाहा। लेकिन उन्हें समझ नहीं आया कि कैसे और किस विधि ये काम करें।

उन्होंने भोलेपन में अपने पास मौजूद मांस लिंग पर अर्पित कर दिया और खुश होकर चले गए कि शिव ने उनका चढ़ावा स्वीकार कर लिया।

उस मंदिर की देखभाल एक ब्राह्मण करता था जो उस मंदिर से कहीं दूर रहता था। हालाँकि, वह शिव का भक्‍त था लेकिन वह रोजाना इतनी दूर मंदिर तक नहीं आ सकता था इसलिए वह सिर्फ पंद्रह दिनों में एक बार आता था। अगले दिन जब ब्राह्मण वहाँ पहुँचा, तो लिंग के बगल में मांस पड़ा देखकर वह भौंचक्‍का रह गया।

यह सोचते हुए कि यह किसी जानवर का काम होगा, उसने मंदिर की सफाई कर दी, अपनी पूजा की और चला गया।

अगले दिन, थिम्मन और मांस अर्पण करने के लिए लाए। उन्हें किसी पूजा पाठ की जानकारी नहीं थी, इसलिए वह बैठकर शिव से अपने दिल की बात करने लगे। वह मांस चढ़ाने के लिए रोज आने लगे। एक दिन उन्हें लगा कि लिंग की सफाई जरूरी है लेकिन उनके पास पानी लाने के लिए कोई बरतन नहीं था। इसलिए वह झरने तक गए और अपने मुँह में पानी भर कर लाए और वही पानी लिंग पर डाल दिया।

जब ब्राह्मण वापस मंदिर आया तो मंदिर में मांस और लिंग पर थूक देखकर घृणा से भर गया। वह जानता था कि ऐसा कोई जानवर नहीं कर सकता। यह कोई इंसान ही कर सकता था। उसने मंदिर साफ किया, लिंग को शुद्ध करने के लिए मंत्र पढ़े। फिर पूजा पाठ करके चला गया।

लेकिन, हर बार आने पर उसे लिंग उसी अशुद्ध अवस्था में मिलता। एक दिन उसने आंसुओं से भरकर शिव से पूछा, “हे देवों के देव, आप अपना इतना अपमान कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं।”

कहते हैं कि तब शिव ने जवाब दिया, “जिसे तुम अपमान मानते हो, वह एक दूसरे भक्त का अर्पण है। मैं उसकी भक्ति से बँधा हुआ हूँ और वह जो भी अर्पित करता है, उसे स्वीकार करता हूँ। अगर तुम उसकी भक्ति की गहराई देखना चाहते हो, तो पास में कहीं जा कर छिप जाओ और देखो। वह आने ही वाला है।”

तब वह ब्राह्मण एक झाड़ी के पीछे छिप गया। थिम्मन मांस और पानी के साथ आया। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि शिव हमेशा की तरह उसका चढ़ावा स्वीकार नहीं कर रहे।

वह सोचने लगा कि उसने कौन सा पाप कर दिया है। उसने लिंग को करीब से देखा तो पाया कि लिंग की दाहिनी आँख से कुछ रिस रहा है। उसने उस आँख में जड़ी-बूटी लगाई ताकि वह ठीक हो सके लेकिन उससे और रक्‍त आने लगा।

आखिरकार, उसने अपनी आँख देने का फैसला किया। उसने अपना एक चाकू निकाला, अपनी दाहिनी आँख निकाली और उसे लिंग पर रख दिया। रक्‍त टपकना बंद हो गया और थिम्मन ने राहत की साँस ली। लेकिन तभी उसका ध्यान गया कि लिंग की बाईं आँख से भी रक्‍त निकल रहा है। उसने तत्काल अपनी दूसरी आँख निकालने के लिए चाकू निकाल लिया, लेकिन फिर उसे लगा कि वह देख नहीं पाएगा कि उस आँख को कहाँ रखना है।

तो उसने लिंग पर अपना पैर रखा और अपनी आँख निकाल ली। कहते हैं कि उसकी अपार भक्ति को देखते हुए, शिव ने थिम्मन को दर्शन दिए। उसकी आँखों की रोशनी वापस आ गई और वह शिव के आगे दंडवत हो गया।

कालांतर में उसे महान भक्त कन्नप्पा नयनार के नाम से जाना गया। कन्ना यानी आँखें अर्पित करने वाला नयनार यानी शिव भक्त।

यह कथा बहुत पुरानी है। और शिव भक्ति में भाव की प्रबलता का एक प्रमाण भी। भाव प्रबल हो तो भोलेनाथ की भक्ति के लिए किसी विशेष वस्तु की जरूरत नहीं। ऐसे तमाम भक्तों की कथा है जिनकी भक्ति आज बेशक़ अतरंगी मालूम पड़े लेकिन यह सभी महान शिव भक्तों में शुमार हैं।

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