डॉ प्रशान्त करण
(आईपीएस) रांची
Sharad Purnima : शरद ऋतु में आश्विन मास की पूर्णिमा को ही लोग शरद पूर्णिमा कहते हैं . कहते हैं कि इसी दिन माता लक्ष्मी का प्रादुर्भाव धरा पर हुआ और और इसी रात्रि को श्रीकृष्ण ने महारास रचाया था . आज भगवान विष्णु की विशेष पूजा होती है . कहते हैं कि इस पूर्णिमा को चन्द्रमा की किरणें अमृत वर्षा करती हैं .
लेकिन आज बात शरद बाबू के पूर्णिमा की .शरद जी पास में ही रहते हैं . अच्छी नौकरी में हैं . सरकारी है . सरकारी नौकरी अच्छी तभी मानी जाती है जब ऊपरी कमाई भरपूर हो . शरद जी की है . लेकिन पता नहीं किस कारण से उनकी पत्नी पूर्णिमा उनके ही वरीय अधिकारी अर्थात बॉस के साथ भाग गयी . सम्भव है कि उस बड़े अधिकारी की ऊपरी कमाई और अच्छी हो . पर मुहल्ले वाले कहते ही गबरू जवान , गोरे – चिट्ठे , स्मार्ट शरद जी को छोड़कर काले – कलूठे , बेढंगे – बेडौल और अधेड़ के साथ क्यों भागी ? अगर मुहल्ले वाले किसी के साथ भागती तो वे ऐसा नहीं कहते . मुहल्ले वालों के इस निंदा रस में पीड़ा भी है कि उनके साथ नहीं भागी . शरद जी चुप ही रहे . तटस्थ . न पत्नी की बुराई ही करते और न ही उस बॉस की निंदा . जब कोई उनकी पत्नी के बारे में धृष्टता कर पूछ भी लेता तो शरद जी टाल देते . जिसकी भागी हो उसके दर्द को कुरेदने में कुछ महिलाएं अधिक उछलतीं . शरद जी चुप रहते . मुहल्ले की स्त्रियाँ उनको देखकर ताना मारतीं – अपनी जोरू को भी नहीं बाँधकर रख सका . कुलक्षणी भाग गयी . कोई कहती – लगता है यह मुआँ मर्द ही नहीं है . जितने मुँह , उतनी बातें . शरद जी चुप रहते . निर्विकार !
धन उत्तराधिकारी मांगता है . शरद जी का धन भी चिल्लाने लगा . उन्हें कोई संतान नहीं थी . पर अब बिना पत्नी के संतान हो तो कैसे ? शरद बाबू के नया विवाह करने की ठानी . भागी हुई पत्नी से कानूनी रूप से संबंध विच्छेद किया . फिर स्वतंत्र होकर घोषित किया कि उन्हें विवाह करना है , जाति बंधन नहीं है . वे स्वयं ब्राह्मण थे .अकूत और आगे और जमा हो रहे सम्पत्ति का उत्तराधिकारी चाहिए . पूरे मुहल्ले में यह बात जंगल की आग बन गयी . मुहल्ले की औरतें अपने संबंधियों की प्रौढ़ , विधवा और अविवाहित कन्याओं का प्रस्ताव लाने लगीं . अब शरद बाबू होनहार और अच्छे वर हैं . तभी उनके बोस की संदेहात्मक परिस्थिति में नहाते समय बाथटब में मृत्यु हो गयी . कालांतर में यह मृत्यु स्वाभाविक घोषित हुई . उनकी सारी सम्पत्ति पर पूर्णिमा का अधिपत्य कानूनी रूप से हो गया . वर्ष भर बाद पूर्णिमा शरद बाबू के पास लौट आयी . शरद बाबू ने विधिवत उनसे विवाह कर लिया . शीघ्र ही उनकी सम्पत्तियों का उत्तराधिकारी भी मिल गया .
अब मुहल्ले में फिर से कानाफूसी होने लगी . लोग कहते – शारद बाबू और शरद बाबू की पूर्णिमा बहुत ऊँचे खिलाड़ी हैं .मुहल्ले में यह निंदा के विटामिन और प्रोटीन की गोली से सबका स्वास्थ्य बनता जा रहा है .
