Strategic Diplomacy : गीता के दूसरे अध्याय के अन्तिम श्लोक में कहा गया है कि ‘विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष को उन विषयों में आसक्ति पैदा होती है, फिर आसक्तियों से कामना पैदा होती है और कामना से क्रोध पैदा होता है, क्रोध से मूढ़ता पैदा होती है, मूढ़ता से स्मृति लोप होता है और स्मृति लोप से बुद्धि नष्ट होती है। और, जिसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है, उसका विनाश हो जाता है।’ यह उद्धरण इसलिए, क्योंकि जब किसी के पास सारी शक्ति आ जाती है, तो फिर वह तानाशाह के रूप में काम करने लगता है। विश्व के कई देशों में ऐसा तो देखने को मिलता ही रहता है। यहां तक कि जब समाज में, किसी गांव या मोहल्ला-सोसाइटी में जो कोई धन—बल के माध्यम से तथाकथित ताकतवर हो जाता है, तो उसके बाद वह समय समय पर समाज के साथ साथ सामान्य लोगों के साथ भी व्यक्तिगत खुन्नस निकालता रहता है। ऐसा नहीं है कि अमेरिका, चीन आज शक्तिशाली देश बना है। अमेरिका तो वर्षों से आजाद रहा है और उसकी ताकत से विश्व परिचित है, लेकिन पिछले दिनों चीन ने जो प्रगति की है, उसने जो अपना विकास किया है, उससे भारत को सीख लेने की जरूरत है, ताकि इन ताकतवर राष्ट्रों के सामने आंख में आंख डालकर बात कर सके?
जब आजाद भारत और अमेरिका के कूटनीतिक संबंधों की शुरुआत हुई थी, तो दुनिया दो ध्रुवों, यानी सोवियत संघ और अमेरिका के बीच बंटी थी। लेकिन, आज की दुनिया बहुध्रुवीय है, जहां बहुत सी संप्रभु शक्तियां अपनी ‘ताकत’ दिखा रही हैं । जब अक्टूबर 1949 में भारत के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू, उस वक्त के अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमन से मिले थे, तो दुनिया दूसरे विश्व युद्ध के दौर से उबरते हुए शीत युद्ध के लंबे युग में दाखिल हो रही थी। उस वक्त अमेरिका चाहता था कि भारत उसके खेमे में आ जाए; नेहरू ने इसका विरोध किया और गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नाम से एक तीसरी ताकत खड़ी करने की कोशिश की। इसके बाद भारत और अमेरिका के रिश्ते बिगड़ गए। फिर अमेरिका ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए पाकिस्तान को एक हथियारबंद भौगोलिक क्षेत्र में तब्दील कर दिया। अमेरिका और भारत के ऐतिहासिक संबंध शीत युद्ध के दौर में अविश्वास और तनाव से शुरू होकर, आज एक मजबूत रणनीतिक और रक्षा साझेदारी में बदल चुका है। 1970-80 के दशक की खटास के बाद, 1991 के आर्थिक सुधारों और विशेष रूप से 2008 के नागरिक परमाणु समझौते के बाद संबंधों में अभूतपूर्व प्रगति हुई। दोनों देश रक्षा, व्यापार, तकनीक और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में गहरे सहयोगी बन गए।
अब जो एक दूसरा गंभीर संकट देश पर आ गया है, उस पर भी सरकार को तत्काल कूटनीतिक कदम उठाने की जरूरत है। अमेरिका-भारत के बीच टैरिफ को लेकर उठापटक के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नए नियमों को मंजूरी दे दी है। अब नौकरी करने के लिए अमेरिका जाना भारतीयों के लिए खासा कठिन हो गया है, क्योंकि अब एच-1बी वीजा के लिए एक लाख डॉलर, यानी लगभग 88 लाख रुपये देने होंगे। उस पर भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फरमान जारी कर दिया है कि एच-1बी वीजाधारकों को 24 घंटों के अंदरर वापस स्वदेश भी लौट जाना है। इस अमेरिकी तानाशाही के कारण लाखों भारतीयों को वापस भारत लौटना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में भारत क्या करे? यह तो बिल्कुल भारत-चीन वाली स्थिति हो गई, जिसके कारण हम 1962 में चीन से जंग हार चुके हैं। अब बारी अमरीका की है कि भारत इस टैरिफ और एच-1बी वीजा के संकट से कैसे उबरे। क्या हमारी दोस्ती केवल दिखावा थी अथवा हम अमेरिकी चाल को समझ नहीं सके! हमारे विदेश मंत्री खुद को विदेशी मामलों के विशेषज्ञ मानते रहे हैं या फिर कहिए कि ऐसा डंका पीटते रहे हैं, उसके बावजूद अमेरिका की ऐसी धूर्तता को नहीं समझ पाना, कुछ हजम नहीं होता? जो भी हो, यदि अमेरिका ने अपनी इन दोनों नीतियों को वापस नहीं लिया, तो फिर अमेरिका से एच-1बी वीजा धारकों को बैरंग स्वदेश वापस लौटना पड़ेगा। जब से टैरिफ बढ़ने की बात शुरू हुई है, अपने देश की कई कंपनियां भी बंद होने के कगार पर हैं। अब यदि दूसरा नियम एच-1बी वीजा भी लागू हो गया, तो यह बात कल्पना से बाहर हो जाएगी कि भारत में बेरोजगारी की दर क्या और कितनी हो जाएगी और रोजगार के कितने केंद्रों के दरवाजे बंद हो जाएंगे। हमें किसी न किसी तरह अमेरिकी नियमों का सामना कूटनीतिक काट से ही करना हैं, अन्यथा इस तरह के उद्योग भारत को स्वयं विकसित करने होंगे, ताकि ऐसे अनुभवी लोगों को देश में ही रहकर इसके विकास में योगदान देने का अवसर मिल सके।
अभी पिछले कुछ दिनों की बात अमेरिका और भारत की बात करें तो यह स्पष्ट दिख जाएगा कि किस तरह वह भारत ही नहीं, विश्व के कई देशों के साथ अपनी ताकत के बल पर अपने ही कई नियमों को तोड़ रहे हैं। यहां तक कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति का अपहरण करके विश्व में अपनी ताकत का एहसास दिलाया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत सहित कई देशों पर लगाए गए टैरिफ को वाशिंगटन सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों अवैध करार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में राष्ट्रपति के पास अधिकार होने के दावा को खारिज कर दिया था। इस फैसले का वैश्विक आर्थिकी पर बड़ा असर पड़ सकता था। फैसले के बाद अमेरिका सहित दुनिया भर के शेयर बाजारों में तेजी देखी गई थी। बता दें कि ट्रंप टैरिफ से प्रभावित उद्योगों और बारह अमेरिकी राज्यों ने ट्रंप द्वारा इस कानून के इस्तेमाल को चुनौती दी थी।
लेकिन, यह क्या? अभी चौबीस घंटे भी नहीं बीते थे कि राष्ट्रपति ट्रंप ने वैश्विक टैरिफ को बढ़ाकर पंद्रह प्रतिशत करने की घोषणा कर दी। दस प्रतिशत के वैश्विक शुल्क से भारतीय निर्यात के एक बड़े हिस्से को तात्कालिक राहत मिल सकती थी, लेकिन पंद्रह प्रतिशत किए जाने से कोई बड़ा बदलाव होता हुआ नहीं दिख रहा है। ट्रंप ने कहा है कि भारत के साथ कारोबारी मोर्चे पर सब यथावत रहेगा। दूसरी ओर, भारत ने भी कहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अध्ययन कर रहा है। जो भी हो, अमेरिका प्रारंभ से ही भारत ही नहीं, विश्व के कुछ देशों को छोड़कर अपनी दादागीरी दिखाने से बाज नहीं आ रहा है। लेकिन, अब प्रश्न यह है कि आखिर विश्व में अमेरिका की यह दादागीरी कब तक चलेगी! ऐसे में एक बार फिर यह बात कही जा सकती है कि भारत ऐसा देश नहीं है कि वह इस दबाव के बाद परास्त हो जाएगा, पर यह सही है कि युद्ध किसी समस्या का समाधान भी नहीं होता। अतः इसके निदान के लिए अपनी कूटनीति का ही सहारा लेना पड़ेगा। यह ठीक है कि सरकार के ऊपर कई तरह के दबाव बनाए जाएंगे, लेकिन सरकार में बैठे राजनेताओं की नजर हर तरफ होती है, यानी वे दूरदृष्टा होते हैं। अतः ऐसी स्थिति में जनता के हानि—लाभ को देखना उनकी जिम्मेदारी हो जाती है। राजनीतिज्ञ इस जिम्मेदारी का भलीभांति निर्वहन करेंगे, इसकी उम्मीद तो समाज को रहती ही है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)।
