Subhash Chandra Bose Jayanti : नेताजी सुभाष चंद्र बोस: छात्र जीवन के द्वंद्व से स्वतंत्रता संग्राम के शिखर तक, पढ़ें किस्सा

Bindash Bol

Subhash Chandra Bose Jayanti : नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जीवन केवल एक क्रांतिकारी नेता का जीवन नहीं था, बल्कि वह एक ऐसे साधक, विचारक और कर्मयोगी की यात्रा थी जिसने अपने भीतर के द्वंद्व, संघर्ष और आत्ममंथन से निकलकर देश की आज़ादी के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया। उनके छात्र जीवन से लेकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में निर्णायक भूमिका तक का सफर प्रेरणा, साहस और त्याग की मिसाल है।

छात्र जीवन में ही दिखने लगा था असाधारण व्यक्तित्व

सुभाष चंद्र बोस के जीवन के शुरुआती वर्षों में ही यह स्पष्ट हो गया था कि वे साधारण राहों पर चलने वाले नहीं हैं। कटक में प्रारंभिक शिक्षा के दौरान उन्हें प्रोटेस्टेंट यूरोपियन स्कूल में दाखिल कराया गया। पढ़ाई में वे अन्य छात्रों से कहीं आगे थे, लेकिन इस स्कूल का वातावरण उन्हें रास नहीं आया। विदेशी सोच, अलगाव और भारतीयता के अभाव ने उनके मन में असंतोष पैदा किया। खेल-कूद में वे कमजोर थे, लेकिन बौद्धिक क्षमता और आत्मसम्मान में वे सबसे आगे थे।
इसके बाद रेवेनशा कॉलेजिएट स्कूल में प्रवेश ने उनके जीवन में बड़ा बदलाव लाया। यहां का भारतीय परिवेश, शिक्षक और विचारधारा ने उनके आत्मविश्वास को नई दिशा दी। हालांकि बचपन में माता-पिता की व्यस्तता और दूरी ने उनके मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा। अपनी आत्मकथा में उन्होंने स्वीकार किया कि वे स्वयं को तुच्छ मानने लगे थे और माता-पिता के स्नेह की आकांक्षा भीतर ही भीतर उन्हें कचोटती रहती थी।

विवेकानंद, रामकृष्ण और अरविंद का गहरा प्रभाव

किशोरावस्था में सुभाष चंद्र बोस के जीवन में निर्णायक मोड़ तब आया जब वे स्वामी विवेकानंद के साहित्य से प्रभावित हुए। विवेकानंद की ओजस्वी वाणी और कर्मयोग की अवधारणा ने उनके भीतर मानसिक क्रांति पैदा कर दी। उन्होंने यह मान लिया कि जीवन का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उन्नति नहीं, बल्कि आत्मोद्धार के साथ मानवता और राष्ट्र की सेवा है।
इसके बाद वे रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाओं की ओर आकर्षित हुए, जिनका मूल संदेश था—आत्मोत्सर्ग के बिना आत्मोद्धार संभव नहीं। यही विचार आगे चलकर नेताजी के जीवन का मूल मंत्र बना। उन्होंने “रामकृष्ण–विवेकानंद युवजन सभा” का गठन किया और युवाओं को आध्यात्मिकता तथा सेवा से जोड़ने का प्रयास किया। परिवार को आशंका होने लगी कि सुभाष पढ़ाई से विमुख हो रहे हैं, लेकिन भीतर ही भीतर उनका व्यक्तित्व और मजबूत हो रहा था।

साधु-संतों और तीर्थ यात्राओं से मोहभंग

साधु-संतों और आध्यात्मिक खोज की लालसा में वे कई बार उनके कार्यक्रमों में शामिल हुए। 1914 की गर्मी की छुट्टियों में बिना परिवार को बताए उत्तर भारत के तीर्थस्थलों की यात्रा भी की। लेकिन इस यात्रा ने उनके भीतर गहरी निराशा पैदा की। उन्हें कई स्थानों पर अंधविश्वास और कर्मकांड का बोलबाला दिखा। यहीं से उनके मन में यह स्पष्ट होने लगा कि केवल वैराग्य या पलायन नहीं, बल्कि सक्रिय कर्म ही सच्चा मार्ग है।

प्रेसिडेंसी कॉलेज और निष्कासन की घटना

कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित प्रेसिडेंसी कॉलेज में प्रवेश के साथ ही सुभाष बाबू एक आदर्शवादी छात्र समूह से जुड़े। यही वह दौर था जब अरविंद घोष का लेखन और विचार युवाओं में जोश भर रहा था। सुभाष बाबू अरविंद के रहस्यवाद से अधिक उनके दर्शन और राष्ट्रवादी विचारों से प्रभावित थे।
1916 में प्रेसिडेंसी कॉलेज में छात्रों की एक ऐतिहासिक हड़ताल हुई। एक अंग्रेज प्रोफेसर ई.एफ. ओटन द्वारा छात्रों की पिटाई से आक्रोश फैल गया। पहली हड़ताल के बाद समझौता हुआ, लेकिन जब प्रोफेसर ने दोबारा एक छात्र पर हाथ उठाया तो छात्रों ने विरोध का तीखा रूप ले लिया। स्थिति बेकाबू हो गई। कॉलेज बंद कर दिया गया। जांच समिति बनी। प्रिंसिपल को सस्पेंड कर दिया गया, लेकिन उससे पहले ही सुभाष चंद्र बोस को “सबसे उपद्रवी छात्र” बताकर कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया।
यह घटना उनके जीवन का बड़ा मोड़ साबित हुई। कलकत्ता के किसी कॉलेज में उन्हें दाखिला नहीं मिला। पढ़ाई छूट गई, लेकिन उनका संघर्ष नहीं। वे सामाजिक कार्यों में और अधिक सक्रिय हो गए।

संघर्ष, असफलताएं और नई शुरुआत

घर वालों ने उन्हें कटक वापस भेज दिया। एक वर्ष बाद वे फिर कलकत्ता लौटे और 49वीं बंगाल रेजिमेंट में भर्ती की कोशिश की, लेकिन आंखों की कमजोरी के कारण असफल रहे। इसी बीच कलकत्ता विश्वविद्यालय ने उन्हें अन्य कॉलेज में दाखिले की अनुमति दी। 1917 में उन्होंने स्कॉटिश चर्च कॉलेज में प्रवेश लिया और दर्शनशास्त्र में प्रथम श्रेणी में ऑनर्स किया।

आईसीएस: सफलता के बाद सबसे कठिन फैसला

पढ़ाई पूरी होने के बाद पिता जानकीनाथ बोस ने उन्हें इंग्लैंड जाकर आईसीएस परीक्षा देने का प्रस्ताव दिया। निर्णय के लिए 24 घंटे का समय मिला। कुछ ही घंटों के भीतर उन्होंने हां कर दी। 15 सितंबर 1919 को वे इंग्लैंड रवाना हो गए।
आईसीएस परीक्षा की तैयारी के लिए उनके पास मात्र आठ महीने थे। जुलाई 1920 में परीक्षा हुई। परिणाम से पहले उन्होंने घर पत्र लिखा कि सफलता की उम्मीद नहीं है। लेकिन सितंबर में जब रिजल्ट आया, तो वे मेरिट में चौथे स्थान पर थे। परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई।
यहीं से उनके जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू हुई—आईसीएस जैसी प्रतिष्ठित और सुविधाजनक नौकरी या फिर देश की आज़ादी के लिए संघर्ष। अगले सात महीने उन्होंने गहरे मानसिक द्वंद्व में बिताए। बड़े भाई शरत चंद्र बोस को लिखे पत्रों में उन्होंने स्पष्ट किया कि वे इस नौकरी को त्यागकर राष्ट्र सेवा करना चाहते हैं।

देश के लिए सब कुछ त्यागने का निर्णय

उन्होंने लिखा कि इंग्लैंड की पढ़ाई पर खर्च हुआ धन भारत माता के चरणों में एक तुच्छ भेंट समझा जाए। देशबंधु चितरंजन दास को भी पत्र लिखकर स्वतंत्रता संग्राम में अपनी सेवाएं देने की इच्छा जताई। अंततः 22 अप्रैल 1921 को उन्होंने सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया को अपने इस्तीफे की सूचना दे दी।
यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन निर्णायक था। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनका जीवन अब पूरी तरह देश की आज़ादी के लिए समर्पित हो चुका था।

इतिहास पुरुष से अमर नेता तक

छात्र जीवन के द्वंद्व, निष्कासन, असफलताओं और आत्ममंथन से गुजरकर सुभाष चंद्र बोस जिस रास्ते पर चले, वही रास्ता उन्हें इतिहास पुरुष बना गया। उन्होंने दिखा दिया कि सच्चा राष्ट्रवाद केवल नारों से नहीं, बल्कि त्याग और संकल्प से जन्म लेता है। आज भी नेताजी का जीवन युवाओं को यह सिखाता है कि कठिन फैसले ही इतिहास रचते हैं—और वही फैसले इंसान को अमर बना देते हैं।
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