Swami Vivekananda :“कपड़े नहीं, चरित्र पहचान है” — स्वामी विवेकानंद की वह सीख जो आज भी प्रासंगिक है

Sushmita Mukherjee
  • वेशभूषा से नहीं, विचार और कर्म से महान बनता है मनुष्य

Swami Vivekananda : मानव समाज में अक्सर किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके पहनावे, रहन-सहन और बाहरी दिखावे के आधार पर कर लिया जाता है। महंगे कपड़े, आधुनिक फैशन और सजी-संवरी वेशभूषा को सफलता और श्रेष्ठता का प्रतीक मान लिया गया है, जबकि साधारण वस्त्र पहनने वाले व्यक्ति को सामान्य या कमतर समझ लिया जाता है। परंतु इतिहास गवाह है कि वास्तविक महानता बाहरी आवरण में नहीं, बल्कि आंतरिक चरित्र, विचार और कर्म में निहित होती है।
इस सत्य को जिस व्यक्ति ने अपने जीवन, विचार और वाणी से विश्व के सामने स्थापित किया, वे थे — स्वामी विवेकानंद।

सादा जीवन, उच्च विचार का प्रतीक

स्वामी विवेकानंद भारतीय सन्यास परंपरा के ऐसे प्रतिनिधि थे, जिन्होंने सादगी को अपनी पहचान बनाया। उनके लिए वस्त्र केवल शरीर ढकने का साधन थे, आत्मा की पहचान नहीं। वे मानते थे कि मनुष्य का मूल्य उसके विचार, चरित्र और कार्य से होता है, न कि उसकी पोशाक से।
उनका जीवन इस सिद्धांत का जीवंत उदाहरण था। साधारण कपड़े, अल्प साधन, लेकिन विचार इतने विराट कि उन्होंने पश्चिमी दुनिया को भी भारतीय दर्शन और संस्कृति के आगे नतमस्तक कर दिया।

अमेरिका की गलियों में भारतीय सन्यासी

जब स्वामी विवेकानंद अमेरिका में थे, तब उनका पहनावा पूरी तरह भारतीय था — पगड़ी, चादर और सादा वेश। एक दिन वे शिकागो की एक गली से गुजर रहे थे। उनकी वेशभूषा पश्चिमी समाज की दृष्टि में असामान्य थी।
उसी समय एक महिला ने उन्हें देखकर अपने मित्र से कहा —
“जरा इन महाशय को देखो, कैसी अनोखी पोशाक है।”
यह टिप्पणी केवल वस्त्रों पर नहीं थी, बल्कि उस मानसिकता को दर्शाती थी, जो बाहरी दिखावे से व्यक्ति का मूल्य तय करती है।

एक वाक्य, जिसने सोच बदल दी

स्वामी विवेकानंद ने उस महिला की हेय दृष्टि को समझ लिया। वे न तो क्रोधित हुए, न ही अपमानित महसूस किया। शांति और आत्मविश्वास के साथ उन्होंने उत्तर दिया —
“बहन! मैं जिस देश से आया हूँ, वहाँ वस्त्र नहीं, चरित्र सज्जनता की कसौटी माना जाता है। आपके यहाँ दर्जी कपड़ा सिलता है और मेरे यहाँ का दर्जी चरित्र सिलता है।”
यह वाक्य केवल एक जवाब नहीं था, बल्कि भारतीय संस्कृति और दर्शन का संपूर्ण सार था।

चरित्र निर्माण की भारतीय परंपरा

भारत की सभ्यता सदियों से चरित्र निर्माण को जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य मानती रही है। यहाँ शिक्षा का अर्थ केवल ज्ञान अर्जन नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों का विकास रहा है। गुरु-शिष्य परंपरा, आश्रम व्यवस्था और जीवन के चार आश्रम — सभी का उद्देश्य मनुष्य को श्रेष्ठ चरित्रवान बनाना था।
स्वामी विवेकानंद उसी परंपरा के प्रतिनिधि थे। उनका यह कथन पश्चिमी समाज के लिए नया था, क्योंकि वहाँ बाहरी सफलता और दिखावा अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता था।

महिला का हतप्रभ होना — विचारों की जीत

स्वामी विवेकानंद के इस उत्तर ने उस महिला को हतप्रभ कर दिया। यह केवल शब्दों की शक्ति नहीं थी, बल्कि आत्मविश्वास और सत्य का प्रभाव था। उस क्षण वस्त्र और संस्कृति का अंतर स्पष्ट हो गया।
एक ओर बाहरी दिखावे से परखने की आदत, और दूसरी ओर आंतरिक मूल्य से पहचानने की परंपरा — यही अंतर स्वामी विवेकानंद ने अपने एक वाक्य में समझा दिया।

आज के समाज में इस प्रसंग की प्रासंगिकता

आज के समय में यह घटना और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। सोशल मीडिया, ब्रांडेड कपड़े, लाइफस्टाइल और आडंबर ने व्यक्ति की पहचान को बाहरी बना दिया है। हम अक्सर भूल जाते हैं कि सच्ची पहचान चरित्र, ईमानदारी और कर्म से बनती है।
स्वामी विवेकानंद का संदेश हमें यह याद दिलाता है कि यदि चरित्र मजबूत हो, तो साधारण वस्त्र भी गौरव का प्रतीक बन जाते हैं।

वेश नहीं, विचार बनाते हैं व्यक्तित्व

इतिहास में जितने भी महापुरुष हुए — महात्मा गांधी, कबीर, बुद्ध, विवेकानंद — सभी ने सादगी को अपनाया। उनका प्रभाव उनके कपड़ों से नहीं, बल्कि उनके विचारों और कर्मों से पड़ा।
स्वामी विवेकानंद ने भारत को आत्मगौरव दिया और दुनिया को यह सिखाया कि सच्चा दर्जी वही है, जो मनुष्य का चरित्र गढ़े।

स्वामी विवेकानंद की यह छोटी-सी घटना हमें जीवन का बड़ा सत्य सिखाती है —
कपड़े समय के साथ बदल जाते हैं, लेकिन चरित्र जीवन भर साथ देता है।
आज आवश्यकता है कि हम भी बाहरी दिखावे से आगे बढ़कर व्यक्ति के विचार, आचरण और कर्म को महत्व दें। यही स्वामी विवेकानंद की सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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