डॉ प्रशान्त करण
(आईपीएस) रांची
Teachers’ Day : मैं आजन्म छात्र ही बना हुआ हूँ . इसलिए शिक्षक दिवस पर सोशल मिडिया के माध्यम से बधाई देकर हम इससे अपना पल्ला झाड़ लेते हैं . पुराने कोई शिक्षक दूर दिख भी जाएँ तो उनसे बचकर खिसक लेते हैं .मेरा मानना है कि शिक्षक दिवस तो वस्तुतः प्रत्येक दिन हुआ करता है . हम प्रत्येक दिन सभी से कुछ न कुछ सीखते रहते हैं . सभी हमारे गुरु की निकलेंगे .जब स्वतः नहीं सीखना चाहते तब भी कोई न कोई सीखा जाता है . हमें सीख दे जाता है , जिसे न चाहते हुए भी हमें स्वीकार करना ही पड़ता है . तो क्या ऐसी महान आत्माओं को मैं क्यों कर शिक्षक न मानूँ ? मनुष्यों की प्रथम शिक्षिका उसकी माता हुआ करती है . फिर शिक्षा ग्रहण करने के सामाजिक और पारिवारिक दबाब में उसे विद्यालय भेज दिया जाता है . स्वतन्त्रता के बाद मेकौले के पिछलग्गू बनना छोड़ यदि हमारे देशी गुरुकुल पुनर्जीवित होते तो हम आचार्य और आचार्य पत्नी जी को गुरु कहते . लेकिन दशकों तक की सरकारों ने हमें इससे साफ़ बचा लिया . विद्यालयों से लेकर महाविद्यालयों तक हम पढ़ाने वाले शिक्षकों को गुरु कहते रहे , मानते भी रहे . हममें इन गुरुओं ने ऐसे संस्कार भरे कि हमारा ध्यान सिर्फ हमें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया गया . अपने कर्तव्यों के प्रति हम अबोध ही रहे . राष्ट्रभक्ति से अछूते रखे गए . फिर नौकरी में हम अपने वरीयजनों , बॉस को गुरु मानने पर विवश हो गए . हमारी सृजनात्मकता , क्रिएटिविटी की भ्रूण हत्या हो गयी और हमें इसका भान तक न रहा . लेकिन
विवाहित पुरुषों के लिए विवाहोपरांत उसकी एकलौती और सगी धर्मपत्नी ही उसकी शिक्षिका हुआ करती है . वही उसे सिखाती – पढ़ाती है . वह पूर्व के सारे के सारे ज्ञान धरा का धरा जाता है . उसे यह दैविक अनुभूति और दिव्यदृष्टि उसी धर्मपत्नी से तदोपरांत सुलभ हो जाता है कि वह महामूर्ख ही नहीं मूढ़ ही है . और उसे फिर संसार के किसी ज्ञान की आवश्यकता ही नहीं होती . अब उसका सम्पूर्ण जीवन इस गुरु की सेवा में सादर समर्पित हो जाता है .
हमारी पीढ़ी की शिक्षक शब्द सुनते ही सिठ्ठी – पिठ्ठी गुम हो जाती है . क्योंकि हमारी पीढ़ी घर से लेकर विद्यालय तक कूटे जाने की संस्कृति में पाले गए . हमने विकास किया . विकास के साथ आज की पीढ़ी में यह नियति शिक्षकों के पास सुलभ रूप से स्थानांतरित हो गयी है . हो भी क्यों नहीं . सरकारी विद्यालयों में शिक्षक नियुक्ति पर विशेष ध्यान दिया गया और बिरले ही बिना पैरवी , जुगाड़ या धन खर्च कर यह पद पाने लगे . प्रश्रय वास्तविक प्रतिभा – मेधा को पछाड़कर पैरवी , जुगाड़ और धन खर्च की ओर खिसक जो गयी . इस बीच इसी गौरवशाली परम्परा से सरकारी शिक्षकों की एक प्रजाति पारा शिक्षकों की विकसित की गयी . जिनका मुख्य कार्य अपनी खेती अथवा व्यवसाय देखने के अतिरिक्त विद्यालय समिती की नाना प्रकार से उपकृत करना होता चला गया . वे शिक्षण को छोड़ सारे कार्य करने लगे , जिनमें आंदोलनों को प्रमुखता दी जाने का चलन बढ़ चला . उन शिक्षकों की प्रतिभाओं से भी हम व्यावहारिक रूप से सीखते हैं . उन्हें भी बारम्बार नमस्कार है .
विकास की प्रतिस्पर्धा में निजी विद्यालयों में शिक्षकों की प्रतिभा और नई पढ़ी को पढ़ाने के कौशल विकास पर ध्यान दिया जाना प्रारम्भ हुआ . इससे शिक्षक इसके बोझ से आकंठ डूबने लगे . उनके दोहन पर बहुतेरे प्रबंधनों ने अधिक कार्य किया और कई शिक्षकों को आर्थिक रूप से क्षीण रखने की परम्परा चल निकली . प्रबंधनों में विधालय / महाविद्यालय शिक्षा से अधिक लाभकारी व्यवसाय की मान्यता स्वीकार करने में प्रतिस्पर्धा निकल पड़ी . लेकिन योग्य शिक्षकों को अब भी उचित सम्मान और आर्थिक क्षतिपूर्ति हो रही है , सुखद है . इन सभी शिक्षकों को सादर नमस्कार है . अब मैं लेख समाप्त कर अपने
अन्तःपुर में अपनी एकमात्र शिक्षिका की सेवा में समर्पण भाव से लगने जा रहा हूँ . विवाहित पाठकगण अपनी – अपनी सोच लें !
