ध्रुव गुप्त
valentine’s Day : होश संभालने के बाद मेरी पहली वैलेंटाइन रही थी मधुबाला। श्वेत-श्याम सिनेमा के परदे पर उनका स्वप्निल सौन्दर्य, उनकी दिलफ़रेब अदाएं और उन्मुक्त हंसी मुझे किसी तिलिस्म से कम नहीं लगती थी। इस तिलिस्म का असर उम्र बढ़ने के साथ बढ़ता ही चला गया।मैंने शायद ही उनकी कोई फिल्म मिस की हो। फिल्म अच्छी बुरी जैसी हो, परदे पर उनकी उपस्थिति का जादू सिनेमा हॉल तक खींच ले जाता था। बचपन में उनकी जो कुछ फिल्में न देख सका, उन्हें जवानी में देख ली। तब वे मेरे ख्यालों में भी आती थीं और सपनों में भी। दिलीप कुमार के साथ उनके प्रेम और किशोर दा के साथ उनकी शादी से मुझे ईर्ष्या हुई थी। उनकी त्रासद मौत की ख़बर किसी सदमे से कम नहीं थी मेरे लिए। उस उम्र में यह सोचकर बहुत उदास हुआ था कि प्रेम के उत्सव वैलेंटाइन डे को जन्मी मधुबाला मेरे होते हुए भी प्रेम के लिए उम्र भर तरसती रहीं थी। अपनी बेपनाह खूबसूरती, ग्लैमर, दिलफरेब अदाओं और शोहरत के बावजूद मधुबाला का व्यक्तित्व कुछ ऐसा था जो वक़्त की खिड़की पर कुछ चमकीले, उदास धब्बे छोड़कर असमय ही अनुपस्थित हो जाती है।
हिंदी सिनेमा की पहली वैलेंटाइन गर्ल, भारत की वीनस और मेरी पहली क्रश मधुबाला के यौमे विलादत पर उन्हें खिराज। हर साल की तरह इस साल का वैलेंटाइन डे भी उन्हीं के नाम।
