ध्रुव गुप्त
(आईपीएस) पटना
Vishwakarma Bhagwan : प्राचीन आर्य संस्कृति के विकास में जिस तरह आर्य ऋषियों की भूमिका रही थी, वैसी ही भूमिका आर्य सभ्यता के निर्माण में उस युग के वास्तुकारों और यंत्र निर्माताओं ने निभाई थी। कई पुराणों ने जिस एक व्यक्ति को इस सभ्यता के विकास का सर्वाधिक श्रेय दिया है, वे हैं विश्वकर्मा। उन्हें जीवन के लिए उपयोगी संरचनाओं – कुआं, बावड़ी, जलयान,कृषि यन्त्र, रथ आभूषण, भोजन-पात्र आदि का अविष्कारक माना जाता है। अस्त्र-शस्त्रों में उन्होंने कर्ण के रक्षा कुंडल, विष्णु के सुदर्शन चक्र, शिव के त्रिशूल, यम के कालदंड का निर्माण किया था। भवन निर्माण के क्षेत्र में उनकी उपलब्धियों में इंद्रपुपुरी, कुबेर पुरी, सुदामापुरी, द्वारिका और हस्तिनापुर नगर हैं। एक प्रश्न अक्सर पूछा जाता है कि विश्वकर्मा की उपस्थिति राम के त्रेता युग से कृष्ण के द्वापर युग तक कैसे संभव है। इसका समाधान यह है कि विश्वकर्मा के बाद उनकी वंश और शिष्य परंपरा इस नाम से युगों तक अनुसंधान और निर्माण कार्य में लगी रहीं। पुराणों में उनके समकक्ष आर्येतर जातियों के एक और महान वास्तुकार मयासुर का नाम आता है।मयासुर और उनकी शिष्य परंपरा ने त्रेता युग में सोने की लंका और द्वापर में पांडवों के वैभवशाली नगर इंद्रप्रस्थ का निर्माण किया था। मय ने त्रिपुर के नाम से प्रसिद्द सोने, चांदी और लोहे के तीन नगर बनाए थे जिन्हें बाद में भगवान शिव द्वारा ध्वस्त किया गया। आर्ये नहीं होने की वज़ह से मयासुर को पुराणकारों द्वारा अपेक्षित यश और सम्मान नहीं दिया गया।
आज विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर प्राचीन भारत के इस महान अभियंता को नमन !
