WorldPolitics : जब कोई ताक़तवर देश किसी संप्रभु राष्ट्र के मौजूदा राष्ट्रपति को पकड़कर अपनी अदालत में पेश करने की बात करता है, तो मामला सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता—वह पूरी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की नींव को हिला देता है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो पर न्यूयॉर्क में मुक़दमा चलाने की अमेरिकी कोशिश इसी खतरे की ओर इशारा करती है।
अमेरिका मादुरो पर ड्रग तस्करी जैसे गंभीर आरोप लगाता है। संभव है आरोपों में सच्चाई हो, लेकिन सवाल यह नहीं कि आरोप क्या हैं—सवाल यह है कि क्या कोई देश अपने घरेलू कानून को किसी दूसरे संप्रभु देश के राष्ट्रपति पर थोप सकता है? अंतरराष्ट्रीय कानून ‘Sovereign Immunity’ के सिद्धांत को मान्यता देता है, जिसके तहत बिना संयुक्त राष्ट्र या अंतरराष्ट्रीय न्यायिक संस्थाओं की मंज़ूरी ऐसा कदम अवैध माना जाता है।
अगर अमेरिका यह मिसाल कायम करता है, तो कल चीन, रूस या कोई और ताक़तवर देश भी अपने विरोधी नेताओं को “अपराधी” बताकर निशाना बना सकता है। तब दुनिया नियमों से नहीं, ताक़त के हिसाब से चलेगी।
खुद को “Rule of Law” और “Human Rights” का झंडाबरदार बताने वाला अमेरिका जब जज, जूरी और जल्लाद बनता है, तो उसकी नैतिक साख कमजोर होती है। सही रास्ता अंतरराष्ट्रीय मंच, सामूहिक कार्रवाई और कूटनीति था—एकतरफ़ा शक्ति प्रदर्शन नहीं।
WorldPolitics : क्या अमेरिका दुनिया को ‘जंगल का कानून’ पढ़ा रहा है? मादुरो मामला और टूटती अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था
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