India Economy : सोना गिरवी से ‘स्थिर अर्थव्यवस्था’ तक: 1991 के संकट से आज के भारत तक की कहानी

Siddarth Saurabh
  • चार प्रधानमंत्री के दौर में बढ़ता संकट, लेकिन आज वैश्विक उथल-पुथल के बीच भी भारत की अर्थव्यवस्था क्यों दिख रही स्थिर?

India Economy : भारत की अर्थव्यवस्था ने कई कठिन दौर देखे हैं, लेकिन 1991 का आर्थिक संकट सबसे बड़ा झटका माना जाता है। उस समय हालात इतने खराब हो गए थे कि देश के पास केवल तीन दिन का विदेशी मुद्रा भंडार बचा था। संकट से निकलने के लिए भारत को अपना सोना विदेश में गिरवी रखना पड़ा।

उस समय देश के प्रधानमंत्री थे P. V. Narasimha Rao और वित्त मंत्री थे Manmohan Singh। लेकिन यह संकट अचानक नहीं आया था। इसके पीछे कई वर्षों की आर्थिक कमजोरियां थीं, जिनका असर पहले Rajiv Gandhi, फिर V. P. Singh और उसके बाद Chandra Shekhar के दौर में बढ़ता गया।

तेल की कीमतें बढ़ीं, विदेशी कर्ज बढ़ा और अंततः देश को अपनी स्वर्ण भंडार का हिस्सा विदेश भेजना पड़ा।

तत्कालीन सरकारों की ढुलमुल नीतियों और राजनीतिक अस्थिरता ने देश को उस मोड़ पर खड़ा कर दिया था जहाँ 47 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और यूनियन बैंक ऑफ स्विट्जरलैंड भेजना पड़ा। उस आर्थिक संकट का सबसे बड़ा बोझ आम जनता ने उठाया—महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा के रूप में।

इतिहास में ऐसे कई मौके आए जब वैश्विक घटनाओं ने भारत की अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया। 1950 के दशक में Korean War के दौरान खाद्य महंगाई बढ़ गई थी और उस समय प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru ने खुद स्वीकार किया था कि वैश्विक युद्ध का असर भारत की कीमतों पर पड़ रहा है।

इसी तरह 1990 में Iraq–Kuwait War ने तेल बाजार को हिला दिया और भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा दबाव पड़ा। लेकिन पिछले एक दशक में तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है।

जब गिरवी था देश का स्वाभिमान

​एक दौर वह भी था जब भारत की साख दांव पर थी। विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम था कि केवल 3 हफ्तों के आयात का पैसा बचा था।
​ तत्कालीन सरकारों की ढुलमुल नीतियों और राजनीतिक अस्थिरता ने देश को उस मोड़ पर खड़ा कर दिया था जहाँ 47 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और यूनियन बैंक ऑफ स्विट्जरलैंड भेजना पड़ा।

​वैश्विक संकट और भारत: नेहरू से लेकर राव तक

​इतिहास बताता है कि जब-जब दुनिया में गोलियां चलीं, भारत में चूल्हे ठंडे होने की नौबत आई।

​कोरियाई युद्ध (1950s): वैश्विक अस्थिरता का बहाना देकर महंगाई को ‘नियति’ मान लिया गया।

​खाड़ी युद्ध (1990): तेल की कीमतों ने भारत की कमर तोड़ दी क्योंकि तब हमारे पास न तो रणनीतिक भंडार थे और न ही मोलभाव करने की कूटनीतिक शक्ति।

नया भारत: आपदा में अवसर और अडिग अर्थव्यवस्था

​पिछले 11 वर्षों में दुनिया ने तीन बड़े झटके झेले—COVID-19, रूस-यूक्रेन युद्ध और मिडिल-ईस्ट संकट। लेकिन भारत की कहानी इस बार अलग रही…

​COVID‑19 के दौरान दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं लड़खड़ा गईं। कई देशों में बेरोजगारी और खाद्य संकट बढ़ गया। वहीं भारत में सरकार ने 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन देकर दुनिया का सबसे बड़ा फूड सपोर्ट प्रोग्राम चलाया।

​तेल का खेल: इसके बाद Russia–Ukraine War ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला दिया। यूरोप के कई देशों में गैस संकट और बिजली के बिल कई गुना बढ़ गए। पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद भारत ने अपने राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखा और रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदा। नतीजा? पड़ोसियों के यहाँ पेट्रोल ₹350 पार है, और भारत में स्थिरता बनी हुई है।

किस्मत या कूटनीति? आंकड़ों की जुबानी

​आज अगर सप्लाई चेन सुरक्षित है और महंगाई दर विकसित देशों की तुलना में भी नियंत्रण में है, तो यह ‘तुक्का’ नहीं है।

​रणनीतिक भंडार (Strategic Reserves): भारत ने अब तेल का भारी स्टॉक जमा करने की क्षमता विकसित कर ली है।

आत्मनिर्भरता: डिफेंस से लेकर मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग तक, भारत अब केवल खरीदार नहीं, उत्पादक बन रहा है।

​”संकट वही, लेकिन समाधान नया है। पहले हम दुनिया के डर से कांपते थे, आज दुनिया हमारी स्थिरता को मिसाल मानती है।”

लिहाजा पड़ोसी देशों की स्थिति देखें तो पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमतें ₹300–350 तक पहुंच गईं और ईंधन बचाने के लिए कई जगह स्कूल-कॉलेज तक बंद करने पड़े। जबकि भारत में पेट्रोल की कीमतें लगभग ₹90–100 के आसपास ही बनी रहीं। यही वजह है कि आज वैश्विक संकटों के बीच भी भारत को एक स्थिर अर्थव्यवस्था वाले देश के रूप में देखा जा रहा है।

नीति ही नियति बदलती है

​1991 में हम ‘मांगने’ वाले थे, 2024-26 में हम ‘देने’ वाले (वैक्सीन से लेकर अनाज तक) बन चुके हैं। यह बदलाव किसी चमत्कार से नहीं, बल्कि कड़े फैसलों और ‘नेशन फर्स्ट’ की नीति का परिणाम है। राजनीति अपनी जगह है, लेकिन आर्थिक स्थिरता का श्रेय उस कूटनीति को जाता है जिसने भारत को ग्लोबल तूफान के बीच एक सुरक्षित टापू बना दिया है।

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