Indian Politics : दल–बदलुओं ने इतिहास ही दोहराया है, नया कुछ नहीं

Nishikant Thakur

Indian Politics : इतिहास गवाह है कि नेताओं को जब अंधकार में विलीन होने का डर सता रहा होता है तो अपना सुख खोजने के लिए वह दल बदल कर सत्ताधीश होने के लिए समाज को भ्रमित करते हैं । दरअसल, हरएक व्यक्ति को और राजनीतिज्ञों को विपक्ष में बैठकर सत्तारूढ़ होने के अरमान हिलोरे मारने लगता है  और वहीं फिर “ऑपरेशन लोटस ” के शिकार होकर सत्ता की  मलाई खाने के लिए तरह तरह के बहाने बनाने लगते हैं । ऐसा इसलिए कि सत्ता की मलाई खाने से पीछे  न रह  सके और समाज सदैव दिग्भ्रमित रहे कि ऐसा क्या हो गया ! यही तो पिछले दिनों राज्यसभा में हुआ जब आम आदमी पार्टी के सात सांसदों ने दल बदलकर भारतीय जनता पार्टी के भगवा रंग से सराबोर हो गए । समाज देखता रह गया और वह दंग रह गया,  समझ नहीं पाया कि आखिर अचानक क्या हो गया । सच तो यह है कि संविधान निर्माताओं का उद्देश्य था कि इस राज्यसभा में देश के चुनिंदा और समाज को नेतृत्व देने वाले अपने विषयों में पारंगत ही सांसद चुनकर आएंगे, इसलिए उसे उच्चसदन ही  कहा गया ।अभी फिलहाल, इस उच्चसदन की गरिमा को जिन लोगों ने तार तार किया है सच में वे जनप्रतिनिधि थे ही नहीं,  वे तो  पार्टी विशेष के द्वारा चुने जाने पर देश के सबसे बड़े लोकतांत्रिक मंच पर बैठने का गौरव पाए हुए व्यक्ति विशेष थे । राजनिति के बहाव में एक बुलबुला उभरा और फूट गया , कौन किसका हिसाब रखे !

भारत में दलबदल की शुरुआत प्रमुख रूप से 1967 में हरियाणा के एक विधायक गया लाल  द्वारा की गई थी। 
गया लाल हसनपुर, हरियाणा से विधायक थे। उन्होंने 1967 के विधानसभा चुनाव जीतने के बाद दो सप्ताह के भीतर तीन बार अपनी पार्टी बदली।  वे पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अलग होकर संयुक्त मोर्चा में शामिल हुए, फिर वापस कांग्रेस में लौटे और फिर 9 घंटे के भीतर वापस संयुक्त मोर्चा में चले गए। इस घटना के बाद ही राजनीति में ‘आया राम, गया राम’ का मुहावरा बहुत प्रचलित हो गया।  इसी क्रम में कांग्रेस नेता राव बीरेंद्र सिंह को जब उन्हें वापस कांग्रेस में शामिल कराया था, तब चंडीगढ़ के एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा था, “गया राम अब आया राम हैं”। इस घटना के बाद 1985 में दलबदल विरोधी कानून लाया गया था। भारत में सांसदों और विधायकों द्वारा दल-बदल का सबसे बड़ा दौर 1967-1972 के बीच था, जब 4,000 में से लगभग 2,000 (50%) विधायकों ने पार्टियां बदलीं, जिससे “आया राम गया राम” मुहावरा बना। राष्ट्रीय स्तर पर, 1979 में 76 सांसदों ने दल-बदल कर मोरारजी देसाई सरकार गिराई थी। हाल ही में, आप (AAP) के 7 राज्यसभा सांसद बीजेपी में शामिल हुए। 1967-1972  चौथे और पांचवें आम चुनावों के बीच, देश के लगभग 50% विधायकों ने दलबदल किया था।1979 में  76 सांसदों ने मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार से समर्थन वापस लिया, जिससे केंद्र सरकार गिर गई।1985 में दलबदल की व्यापक समस्या के कारण ही ‘दल-बदल विरोधी कानून’ (52वां संविधान संशोधन) लाया गया।

गुगल के अनुसार भारत में दलबदल की राजनीति के कारण केंद्र सरकारें मुख्य रूप से गठबंधन युग के दौरान गिरीं, जब किसी एक पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत नहीं था। दलबदलुओं के कारण केंद्र सरकार गिरने के कई प्रमुख उदाहरण हैं जिनमें कुछ इस प्रकार हैं , 17 अप्रैल 1999 अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ।  यह दलबदल और समर्थन वापस लेने का सबसे प्रमुख उदाहरण है। अन्नाद्रमुक  प्रमुख जे. जयललिता द्वारा समर्थन वापस लेने और विपक्ष में जाने के बाद, वाजपेयी सरकार विश्वास मत में सिर्फ एक वोट से हार गई ।ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री गिरधर गमांग ने, जो उस समय लोकसभा सांसद भी थे, कांग्रेस के कहने पर वाजपेयी सरकार के खिलाफ वोट डाला था, जिससे सरकार गिर गई।1996 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार – 13 दिनों की सरकार आई उसमें भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी, लेकिन उसे अन्य दलों से पर्याप्त समर्थन नहीं मिल पाया और दलबदल/गठबंधन न बन पाने के कारण 13 दिन बाद ही सरकार गिर गई। 1979 मोरारजी देसाई सरकार जो जनता पार्टी की थी , सरकार में आंतरिक कलह और दलबदल (चौधरी चरण सिंह का अलग होना) के कारण मोरारजी देसाई को इस्तीफा देना पड़ा था। इसके बाद कांग्रेस के समर्थन से चरण सिंह प्रधानमंत्री बने, लेकिन कांग्रेस ने भी समर्थन वापस ले लिया, जिससे सरकार गिर गई। 1990 में वी.पी. सिंह सरकार जनता दल में दलबदल और आंतरिक गुटबाजी के कारण बहुमत खो दिया और सरकार गिर गई। 1967 और 1971 के आम चुनावों के बाद दलबदल का दौर चरम पर था, जब विधायकों ने अपनी निष्ठा बदली। दलबदल को रोकने के लिए 1985 में 52वां संविधान संशोधन लाया गया, जिसे ‘दल-बदल विरोधी कानून’ कहा जाता है।2003 में 91वें संविधान संशोधन द्वारा इस कानून को और कड़ा किया गया। 

अब अभी के संदर्भ में बात करें तो सात आम आदमी पार्टी के सांसदों ने जो  दल बदल किया है उस पर पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने एक्स पर कहा कि भारतीय जनता पार्टी ने एक बार फिर पंजाबियों के साथ धोखा किया है ।  आम आदमी पार्टी के ही वरिष्ठ सांसद संजय सिंह ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी  का  ऑपरेशन लोटस और घटिया राजनीति शुरू हो गया है । वह पंजाब की भगवंत सिंह सरकार के अच्छे कामों को रोकने की साजिश की है । इन सात नामों को पंजाब की जनता को याद रखना चाहिए । पंजाब की जनता उनलोगों को माफ नहीं करेगी । वहीं पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान  ने कहा कि जो सात संसद भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो रहे हैं वे पंजाब के प्रतिनिधित्व नहीं करते , वे देशद्रोही हैं । सात राज्यसभा सांसदों ने भारतीय जनता पार्टी में अपने विलय के दस्तावेज राज्यसभा चेयरमैन को सौंप दिए हैं। विश्लेषकों की माने तो यह केवल दल बदल नहीं बल्कि एक ऐसी पटकथा है जिसकी तैयारी लंबे समय से पर्दे के पीछे राघव चड्ढा के हाथ थी । विशेषकों को मानना है कि पिछले एक महीने में अलग अलग समय पर एक एक सांसदों की केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के साथ बैठक  हुई थी। इन बैठकों को बेहद गोपनीय रखा गया था ।

दूसरी ओर आम आदमी के वरिष्ठ सांसद संजय सिंह ने रविवार को राज्यसभा सभापति सीपी राधाकृष्ण को एक पत्र भेजकर भारतीय जनत पार्टी में शामिल हुए उच्च सदन के सात सांसदों अयोग्य घोषित करने का अनुरोध किया है । दल बदल जैसे  गंभीर मुद्दों पर सांसदों की अयोग्यता पर फैसला सदन के स्पीकर या चेयरपर्सन ही लेते हैं। यदि किसी सदस्य के खिलाफ शिकायत आती है तो वही तय करते है कि उसने कानून उल्लंघन किया  या नहीं ।  वहीं यह भी कहा गया है कि स्पीकर  का फैसला अंतिम नहीं होता, उसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है । इस कारण से ऐसे मामलों में कानूनी लड़ाई लंबी खिंच जाती है । अगर मामला पार्टी में टूट और असली पार्टी के दावे का हो , तब चुनाव आयोग की भुमिका सामने आती है । चुनाव आयोग यह देखता है किस गुट के पास संगठन निर्वाचित प्रतिनिधियों और पार्टी संविधान के आधार पर असली पार्टी होने का दावा मजबूत है । चुनाव चिन्ह पर  विवाद भी इसी स्तर पर तय होता है ।  अब फिर वही बात घूमकर सामने आती है  कि  आखिर गंभीर पचड़े से आम आदमी पार्टी कैसे निकलती  है और निकट भविष्य में पंजाब में जों चुनाव होने वाला है उसमें इन सातों सांसदों की क्या भूमिका रहेगी । इसलिए अभी तो मामले को ठंडा होने में समय तो लगेगा ही इसलिए  इंतजार करना होगा ।

(लेखक वरिष्ट पत्रकार और स्तंभकार हैं)।

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