* डॉलर साम्राज्य पर संकट: युद्धों के बीच बदलती विश्व व्यवस्था
* पश्चिम एशिया से यूरोप तक—अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती
Geopolitics : रूस-यूक्रेन युद्ध और इज़रायल-ईरान टकराव ने वैश्विक राजनीति की दिशा बदल दी है। इन संघर्षों ने केवल सैन्य संतुलन ही नहीं, बल्कि आर्थिक और कूटनीतिक समीकरणों को भी हिला दिया है। यूरोप जहां रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका की नीतियों पर सवाल उठे, वहीं पश्चिम एशिया में ईरान के साथ बढ़ते तनाव ने खाड़ी देशों को भी नई रणनीति पर सोचने को मजबूर कर दिया है।
”इतिहास गवाह है, साम्राज्य तलवारों से बनते हैं पर कागजों (मुद्रा) से चलते हैं। जब कागज की साख गिरती है, तो साम्राज्य बिखरने लगते हैं।”
डॉलर का किला क्यों हिल रहा है?
पिछले 50 वर्षों से वैश्विक ऊर्जा व्यापार की रीढ़ पेट्रो-डॉलर सिस्टम रहा है। इसका सरल सा चक्र था….
* तेल-गैस की बिक्री डॉलर में
* तेल उत्पादक देशों के पास डॉलर का भंडार
* वही डॉलर वापस अमेरिकी संपत्तियों और ट्रेज़री में निवेश
इसी व्यवस्था ने अमेरिका को आर्थिक महाशक्ति बनाए रखा। लेकिन अब यह चक्र धीरे-धीरे दरकता दिख रहा है। अगर पेट्रो-डॉलर कमजोर पड़ा, तो अमेरिकी वैश्विक प्रभुत्व की नींव भी हिल सकती है।
1. पेट्रो-डॉलर का अंत: सुरक्षा का वादा और टूटता भरोसा
70 के दशक में निक्सन और सऊदी अरब के बीच हुआ वह समझौता, जिसने डॉलर को दुनिया की ‘अनिवार्य मुद्रा’ बना दिया था, अब दम तोड़ रहा है।
सुरक्षा की ढाल कमजोर: खाड़ी देशों (GCC) को समझ आ गया है कि अमेरिका अब उनकी सुरक्षा का ‘गारंटर’ नहीं रहा।
ईरान-इजरायल युद्ध का असर: इस युद्ध ने अरब देशों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि अमेरिका की नीतियां केवल अपने हित साधने के लिए हैं, न कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए।
2. ‘डीडॉलराइजेशन’ की बढ़ती रफ़्तार: युद्ध बना उत्प्रेरक
रूस-यूक्रेन युद्ध ने दुनिया को दिखा दिया कि अमेरिका डॉलर को एक ‘हथियार’ (Weaponization of Currency) की तरह इस्तेमाल कर सकता है।
* चीन की तैयारी: चीन अपने गोल्ड रिजर्व बढ़ा रहा है ताकि युआन को सोने का समर्थन देकर डॉलर का विकल्प बना सके।
* पावर ऑफ साइबेरिया: पाइपलाइन के जरिए ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित कर चीन ने समुद्री रास्तों (जहाँ अमेरिका का राज है) पर निर्भरता कम कर ली है।
डी-डॉलराइजेशन की रफ्तार तेज
हाल के वर्षों में कई देश डॉलर से दूरी बनाने की कोशिश कर रहे हैं…
* कई देशों ने अमेरिकी ट्रेज़री बॉन्ड में निवेश घटाया
* स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की पहल
* केंद्रीय बैंकों द्वारा सोने का भंडार बढ़ाना
इस रणनीति का नेतृत्व चीन और रूस जैसे देश कर रहे हैं।
डॉलर से दूरी अब राजनीतिक बयान नहीं, आर्थिक रणनीति बनती जा रही है।
3. ‘न्यू वर्ल्ड ऑर्डर’: रूस-चीन-ईरान की तिकड़ी
पश्चिम एशिया में अब अमेरिका की जगह एक नया त्रिकोण उभर रहा है।
रूस (सैन्य शक्ति), चीन (आर्थिक ताकत) और ईरान (क्षेत्रीय प्रभाव) मिलकर एक ऐसा ब्लॉक बना रहे हैं जहाँ व्यापार अपनी स्थानीय मुद्राओं में होगा।
BRICS का उभार: न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) इसी डॉलर मुक्त व्यापार की दिशा में एक बड़ा हथियार है।
नई आर्थिक संरचना की तैयारी
उभरते देशों का समूह BRICS लंबे समय से वैकल्पिक वित्तीय ढांचा बनाने की कोशिश कर रहा है। इस दिशा में दो महत्वपूर्ण संस्थाएं बनाई गईं…
* New Development Bank
* Contingent Reserve Arrangement
इनका उद्देश्य है….
* डॉलर पर निर्भरता कम करना
* स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाना
* विकासशील देशों के लिए वैकल्पिक वित्तीय सुरक्षा तैयार करना
4. भारत के लिए ‘कोर्स करेक्शन’ की चेतावनी
भारत इस समय एक दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ पश्चिम से बढ़ती नजदीकी है, तो दूसरी तरफ BRICS की अध्यक्षता।
कूटनीतिक चूक: यदि भारत केवल अमेरिका-इजरायल धुरी से चिपका रहता है, तो वह ग्लोबल साउथ (Global South) का नेतृत्व खो सकता है।
अवसर: ब्रिक्स के अध्यक्ष के नाते भारत के पास मौका है कि वह स्थानीय मुद्रा में व्यापार (Local Currency Trade) को बढ़ावा देकर खुद को एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में स्थापित करे।
भारत: अवसर या चूक?
भारत के पास इस बदलते दौर में बड़ी भूमिका निभाने का मौका है।
* ऊर्जा आयात में बड़ा खिलाड़ी
* उभरती अर्थव्यवस्था
* BRICS में महत्वपूर्ण सदस्य
लेकिन रणनीतिक संतुलन बनाए रखना भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती है—ताकि वह किसी एक धड़े में फंसने के बजाय बहुध्रुवीय दुनिया में अपनी स्वतंत्र भूमिका निभा सके।
रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया का संकट केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं हैं। वे उस वैश्विक व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं, जो पिछले पांच दशकों से अमेरिकी डॉलर और सैन्य प्रभुत्व पर टिकी थी।
अगर खाड़ी देशों का भरोसा सचमुच बदलता है, तो पेट्रो-डॉलर की नींव हिल सकती है—और उसके साथ ही वैश्विक शक्ति संतुलन भी।
अमेरिका के लिए यह युद्ध केवल सैन्य नुकसान नहीं, बल्कि एक ‘आर्थिक सुनामी’ का संकेत है। यदि खाड़ी देश डॉलर छोड़ते हैं, तो अमेरिका की अर्थव्यवस्था अपनी ही उधारी के बोझ तले दब जाएगी। भारत को अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है।
